बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूर्यरेखा
अंग्रेजी में इस रेखा को 'सन लाइन' एवं हिन्दी में यश रेखा भी कहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की यह सामान्य इच्छा होती है कि वह जीवन में कुछ ऐसा कार्य करे जिससे समाज में उसके कार्यों की सराहना हो । लोग उसके विचारों को आदर दें और उसकी मृत्यु के बाद भी उसकी अक्षय कीर्ति बनी रहे। इन सबके अध्ययन के लिए सूर्य रेखा का सहारा लेना अत्यन्त आवश्यक होता है। यह सूर्य रेखा ही मानव को उसके जीवन में यश, मान, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य, तथा कीर्ति दिलाने में सहायक होती है। यदि किसी व्यक्ति के हाथ में स्वास्थ्य रेखा, हृदय रेखा और जीवन रेखा चाहे कितनी ही अधिक पुष्ट हो परन्तु उसके हाथ में सूर्य रेखा कमजोर होती है तो उस व्यक्ति का जीवन नगण्य-सा होकर रह जाता है। स्पष्ट गहरी और निर्दोष सूर्य रेखा ही मानव को ऊंचा उठाने में सहायक होती है। हस्त रेखा विशेषज्ञ के लिए इस रेखा का सूक्ष्मता से अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है। यद्यपि विद्वानों के अनुसार हथेली में केवल सूर्य रेखा को ही महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए । क्यों कि जब तक हथेली में भाग्य रेखा प्रबल नहीं होती तब तक सूर्य रेखा का प्रभाव विशेष नही मिलता । अतः सूर्य रेखा का अध्ययन करते समय भाग्य रेखा पर भी विचार करना चाहिए । मेरे अनुभव में ऐसा आया है कि सभी व्यक्तियों के हाथों में सूर्य रेखा नहीं होती और यह बात भी सही है कि सूर्य रेखा का उद्गम भी अलग-अलग हाथों में अलग-अलग स्थानों से होता है। इसका प्रभाव इसकी लम्बाई तथा स्पष्टता से ही अनुभव होती है। इसलिये हाथ देखते समय सूर्य रेखा के उद्गम पर भी विशेष ध्यान रखना चाहिए । यह रेखा सूर्य पर्वत के नीचे होती है। इसकी पहचान यह है कि इस रेखा का उद्गम चाहे कही से भी हुआ हो, परन्तु इस रेखा की समाप्ति सूर्य पर्वत पर ही होती है। जो रेखा सूर्य पर्वत तक नहीं पहुंचती वह रेखा सूर्य रेखा नहीं कहला सकती । पाठकों के हित के लिए मैं इस रेखा के उद्गम स्थल स्पष्ट कर रहा हूं : १. कुछ लोगों के हाथो में यह रेखा शुक्र पर्वत से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत तक जाती है । २. कुछ हथेलियों में यह रेखा जीवन रेखा के समाप्ति के स्थान से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत तक जाती है ।