बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३५ ) ४. चतुर्थावस्था :—यह भाग्य रेखा भी शुभ मानी गई है, परन्तु इसका भाग्योदय यौवनावस्था के बाद ही होता है। शिक्षा के क्षेत्र में इसको बार-बार बाधाएं देखनी पड़ती है तथा उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाता। यदि इस प्रकार की भाग्य रेखा के साथ कोई सहायक रेखा न हो तो व्यक्ति जीवन में अपनी ही की हुई गलतियों पर पछताता रहता है। मित्रों का सहयोग उसे नहीं मिल पाता जीवन में उन्नति के लिए उसे कठोर परिश्रम करना पड़ता है। उसका भाग्योदय अत्यधिक विलम्ब से होता है और किसी के सहयोग से ही यह उन्नति कर पाता है ऐसा व्यक्ति पुलिस या मिलिट्री विभाग में विशेष उन्नति कर सकता है। यदि यह रेखा मार्ग में टूट गई हो तो व्यक्ति को अपने जीवन में बार-बार बाधाओं का सामना करना पड़ता है यदि इस रेखा पर द्वीप हो तो ऐसा व्यक्ति भाग्य- हीन होता है। ५. पंचमावस्था :—यह रेखा हथेली में अनुकूल कही जाती है, परन्तु यह यदि मध्यमा उंगली के छोर पर पहुंचने का प्रयत्न करती है तो वह व्यक्ति जीवन में सफलता नहीं प्राप्त कर पाता। यद्यपि यह आगे बढ़ने के लिए बराबर प्रयत्न करता रहेगा परन्तु उसे जीवन में बार-बार असफलता का सामना करना पड़ता है किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के सहयोग से ही यह उन्नति कर सकता है। जीवन के मध्य काल में ये व्यक्ति विकास करते हैं, ऐसे व्यक्ति सफल चित्र- कार अथवा साहित्यकार होते हैं, मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे व्यक्ति किसी एक क्षेत्र में पारंगत होते हैं। यदि ऐसी रेखा जीवन रेखा के आगे बढ़ने पर टूटी हुई हो या लहरदार बन गई हो तो उस व्यक्ति की उन्नति नहीं हो पाती, और निरन्तर अपने भाग्य को कोसता रहता है। यदि ऐसी रेखा को आड़ी या तिरछी रेखाएं काटे तो उस जीवन में बाधाओं का सामना करना पड़ता है, ऐसे व्यक्ति सफल देश भक्त होते हैं तथा इनकी वृद्धावस्था अत्यन्त सुखमय होता है। ६. षष्ठावस्था:—जिसके हाथ में इस प्रकार की भाग्य रेखा होती है वह अत्यन्त सौभाग्यशाली माना जाता है, इस प्रकार के व्यक्ति का भाग्योदय ३६वें वर्ष के बाद से ही होता है जीवन के ३६ से ४२वें वर्ष के बीच आश्चर्यजनक रूप से उन्नति करता है। ऐसे व्यक्ति का प्रारम्भिक जीवन अत्यन्त कष्टदायक होता है, परन्तु उसका यौवनकाल और उसकी वृद्धावस्था अत्यन्त सुखकर मानी जाती है, और अपने जीवन के उत्तरकाल में उसे धन, मान, यश, प्रतिष्ठा, आदि प्राप्त होती हैं। यदि ऐसी रेखा बीच बीच में टूटी हुई हो तो उसके भाग्य में बाधाएं आती हैं और यदि उस रेखा पर वृत्त का चिह्न हो तो ऐसा व्यक्ति भाग्य हीन कहा जाता है यदि भाग्य रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर गुरू पर्वत की ओर जाती हो तो वह