बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१२ ) उभयचरिक योग : **परिभाषा :—**यदि हथेली में सूर्य पर्वत पर वर्ग का चिह्न हो तथा कनिष्ठिका अंगुली का ऊपरी सिरा अनामिका के ऊपरी पोर से आगे बढ़ा हुआ हो तो उसके हाथ में उभयचरिक योग बनता है । **फल:—**जिस व्यक्ति के हाथ में उभयचरिक योग होता है वह व्यक्ति दूरदर्शी होने के साथ-साथ परिस्थितियों को भली प्रकार से समझने वाला होता है । ऐसा व्यक्ति न्यायशील होता है । तथा समाज में वह तटस्थता के कारण सम्मानित होता है । ऐसा व्यक्ति अविचलित पुष्ट, स्वस्थ शरीर तथा अपनी जबान का पक्का होता है और यदि किसी को वचन दे देता है तो उसे यथासंभव पूरा करने का प्रयत्न करता है । टिप्पणी : —उभयचरिक योग में सूर्य पर्वत पर पूर्ण वर्ग का चिह्न होना आव- श्यक होता है । परन्तु यह वर्ग का चिह्न जितना छोटा होता है उतना ही ज्यादा शुभ एवं अनुकूल प्रभाव वाला माना जाता है ।
पर्वत योग : **परिभाषा :—**यदि हथेली में भाग्य रेखा मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर सीधी शनि पर्वत तक पहुंचती हो ; तथा यह रेखा पतली, गहरी, स्पष्ट तथा बिना कटी-फटी हो और अपने उद्गम स्थान पर मछली का आकार बनाती हो तो उसके हाथ में पर्वत योग का निर्माण होता है । **फल :—**जिसके हाथ में पर्वत होता है, वह व्यक्ति अपने भाग्य का स्वयं ही निर्माता होता है । जीवन में वह जिस कार्य में भी हाथ डालता है उसे भाग्य साथ देता है । और वह उन कार्यों में सफलता प्राप्त करता है । शिक्षा के क्षेत्र में इसे पूर्ण सफलता मिलती है, तथा अपने यौवन काल में यह गरीबों, अनाथों एवं पीड़ितों की मदद करता है । मेरे अनुभव में यह आया है कि यह इन सभी गुणों से युक्त होने पर भी भोगी होता है । तथा अपनी पत्नी के अलावा अन्य कई स्त्रियों से उसके पत्नीवत् मधुर सम्बन्ध रहते हैं । समाज में उसकी प्रशंसा होती है, तथा जीवन में उसे किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता ।