बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१६ ) चतुस्सागर योग : परिभाषा : यदि हथेली के सभी पर्वत विकसित हों तथा सभी रेखाएं पुष्ट एवं सीधी, सरल, तथा स्पष्ट हों तो ऐसे व्यक्ति के हाथ में चतुस्सागर योग बनता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति अपने ही कार्यों से प्रसिद्ध होते हैं और अपने प्रयत्नों से समाज का अथवा देश का नेतृत्व करने में सफलता प्राप्त करते हैं । ऐसे व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से पूर्णतः सुखी एवं सफल होते हैं । इनकी वाणी में ओज होता है तथा अपने भाषणों के माध्यम से लोगों को प्रभावित करने की पूरी क्षमता रखते हैं। ये व्यक्ति अपने प्रयत्नों को अपने अनुकूल बनाकर विदेश यात्राएं करते हैं तथा समुद्र पारीय देशों में भी ख्याति लाभ करते हैं। यदि ऐसे व्यक्ति राजकीय सेवा में होते हैं तो उनकी नौकरी ऐसी होती है जिसकी वजह से इनके जीवन में भ्रमण विशेष रूप से रहता है तथा उसमें सफलता प्राप्त कर लेते हैं। पारिवारिक दृष्टि से ये व्यक्ति पूर्णतः सन्तुष्ट होते हैं । [चित्र-शीर्षक: चतुस्सागर] टिप्पणी : इस योग में राहू और केतु पर्वतों पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता, इसके अलावा सभी पर्वत अपने आप में पूर्ण विकसित अवस्था में होने चाहिए और उन पर किसी प्रकार का बिन्दु व जाल नहीं होना चाहिए । पर इसके साथ ही उस व्यक्ति की हथेली लचीली, कोमल तथा गुलाबीपन लिये हुए होनी आवश्यक है । रोग योग : परिभाषा : सामुद्रिक शास्त्र के विद्वानों के अनुसार निम्नलिखित योग यदि हथेली में पाये जाएं तो रोग योग होता है । १. दुर्बल शरीर : यदि नाखून पतले हों तथा जीवन रेखा फीकी हो साथ ही वह जंजीरदार होकर नीचे की ओर झुकी हुई हो । २. अकाल मृत्यु : यदि हृदय रेखा शनि पर्वत को स्पर्श करती हो, साथ ही मस्तिष्क रेखा के बीच में क्रॉस का चिह्न हो तथा जीवन रेखा कटी हुई हो । [चित्र-शीर्षक: रोग योग]