बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
पृष्ठ 228, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ें( २२७ ) वस्तुतः सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार रुचक योग, भद्र योग, हंस योग, मालव्य योग तथा शश योग ये पांचों योग पंचमहापुरुष योग के नाम से जाने जाते हैं। ब्रह्मचर्य योग : परिभाषा : यदि कनिष्ठिका उंगली के पहले पर्व पर क्रॉस का चिन्ह हो तो ब्रह्मचर्य का योग होता है। फल : जिसके हाथ में ब्रह्मचर्य योग होता है वह व्यक्ति जीवन भर स्त्रियों से दूर रहता है। विवाह नहीं करता तथा साधुवत् जीवन ही व्यतीत करने में सफल होता है। सन्तानहीन योग : परिभाषा : यदि हथेली में स्वास्थ्य रेखा पर तारे का चिन्ह हो तो सन्तानहीन योग होता है। इसी प्रकार मध्यमा उंगली के तीसरे पर्व पर भी तारक चिन्ह ऐसा ही योग बनाता है। फल : जिसके हाथ मे यह योग होता है उसे जीवन में सन्तान सुख प्राप्त नहीं होता। यदि पति तथा पत्नी दोनों ही के हाथों में ऐसा योग हो तो निश्चय ही उसको सन्तान सुख का अभाव रहता है। विवाह योग : परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत तथा गुरु पर्वत विकसित हो तो विवाह योग बनता है पर विद्वानो ने इसके अलावा अन्य तथ्य इस प्रकार से स्पष्ट किये हैं : सुखी विवाह : १. यदि हथेली में भाग्य रेखा का उद्गम स्थान चन्द्र पर्वत हो। २. यदि भाग्य रेखा हृदय रेखा पर समाप्त हो। ३. यदि गुरु पर्वत पर क्रास हो। सुखहीन विवाह : १. यदि शुक्र पर्वत कम उभरा हुआ हो।