भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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( २३० ) कारण लोक-लज्जा के भय से माता अपने पुत्र को त्याग देती है । कई बार गरीबी की स्थिति में या कोई अचानक घटना घटित हो जाने के कारण भी नवजात शिशु को त्यागना पड़ता है । ऐसा बालक बिना माता के ही बड़ा होता है । मातृमरण योग : परिभाषा : यदि हथेली में मंगल रेखा आगे बढ़कर चन्द्र पर्वत तथा चन्द्र रेखा को दो भागों में विभाजित करती हो तो उसके हाथ में मातृमरण योग होता है । फल : इस योग में बालक के जन्म लेने के कुछ समय बाद ही उसकी माता की मृत्यु हो जाती है । ऐसा समझना चाहिए । पादजातत्वप्रद योग : मातृमरण परिभाषा : यदि हथेली में राहू पर्वत तथा चन्द्र पर्वत विकसित हों एवं राहू रेखा तथा चन्द्र रेखा का परस्पर सम्बन्ध बन गया हो तो पादजातत्व प्रद योग बनता है । फल : जिसकी हथेली में यह योग होता है वह माता के गर्भ से पैरों द्वारा उत्पन्न होता है । पाद जातत्वप्रद अनूढ़ापत्यत्व साधक योग : परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत एवं चन्द्र पर्वत विकसित हो तथा हथेली के शुक्र पर्वत के ऊपर से कोई रेखा निकलकर चन्द्र पर्वत पर स्थापित चन्द्र रेखा से मिलती हो एवं सूर्य रेखा कमजोर हो तो अनुढापत्यत्व साधक योग होता है । फल : जिसके हाथ में उपर्युक्त योग होता है वह कुमारी लड़की का पुत्र होता है या उसके कुंआरावस्था में अर्थात् अविवाहितावस्था में पुत्र हो जाता है । टिप्पणी : यदि यह योग पुरुष के हाथों में होता है तो वह अपने पिता की संतान नहीं होता, किसी और की सन्तान अनूढापत्यत्व होता है, या वह बालक कुमारी के गर्भ से उत्पन्न तथा त्याज्य होता है । इसी प्रकार यदि यह योग स्त्री के हाथों में हो तो वह परपुरुष से गर्भ धारण करती है अथवा अविवाहिता अवस्था में गर्भ रह जाता है ।