बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २४६ ) जलोदर रोग योग : परिभाषा : यदि चन्द्र पर्वत बहुत अधिक विकसित हो तथा चन्द्र, रेखा सीढ़ीदार होकर प्रथम मणिबन्ध को स्पर्श करती हो तो जलोदर रोग योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसे जलोदर रोग हो जाता है । टिप्पणी : जलोदर रोग में पेट में बहुत अधिक पानी का जमाव हो जाता है और पेट निरन्तर फूलता रहता है । अन्त में इस रोग से उसकी मृत्यु हो जाती है । मुनि योग परिभाषा : यदि हथेली में तर्जनी उंगली अनामिका से लम्बी हो, गुरु पर्वत अपने स्थान पर फूला हुआ हो तथा उस पर स्वस्तिक का चिह्न हो तो मुनि योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह सांसारिक छल प्रपंच से दूर हटकर साधुवत् जीवन व्यतीत करता है । तथा अधिक समय तक मौन ही रहता है । टिप्पणी : यह योग होने पर व्यक्ति पूरी तरह से सामाजिक नहीं रह पाता । और न उसके जीवन में परिवार का सुख भी मिलता है । बचपन से ही उसकी प्रवृत्ति साधु की तरह हो जाती है । वह अधिक से अधिक एकान्त में रहना पसन्द करता है । काहल योग : परिभाषा : यदि मंगल पर्वत विकसित हो तथा उससे रेखाएं निकलकर शनि, सूर्य तथा बुध पर्वत को स्पर्श करती हों तो काहल योग होता है । फल : इस योग में उत्पन्न व्यक्ति बलवान शरीर तथा दृढ़ चरित्र का व्यक्ति होता है । साहसिक कार्यों में उसकी बहुत अधिक रुचि रहती है । ऐसा व्यक्ति पुलिस या सेना में बहुत अधिक ऊंचे पद पर पहुंचता है । भौतिक दृष्टि से इसके जीवन मे कोई अभाव नहीं रहता । परन्तु मेरे अनुभव में यह आया है कि ऐसा व्यक्ति बहुत अधिक बुद्धिमान नहीं होता जिसकी वजह