भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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( २६१ ) राज राजेश्वर योग : परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य पर्वत विकसित हो तथा सूर्य रेखा हथेली के मध्य में आकर शुक्र पर्वत की ओर जाती हो तथा रेखा पर किसी प्रकार की बाधा न हो तो राज राजे- श्वर योग होता है । फल : जिसके हाथ में राज राजेश्वर योग होता है वह व्यक्ति पूर्ण सुखी, सफल, धनवान तथा विविध ऐश्वर्य का भोग करने वाला होता है । टिप्पणी : निम्न योग भी इससे सम्बन्धित हैं : १. यदि हथेली लम्बी हो तथा उंगलियों के बीच में सन्धि न हो । [चित्र : राज राजेश्वर योग] २. यदि अनामिका और कनिष्ठिका उंगलियां बराबर हों । ब्रह्माण्ड योग : परिभाषा : आदर्श हाथ हो तथा हाथ में चन्द्र पर्वत तथा शुक्र पर्वत का दो लम्बी रेखाओं से परस्पर सम्बन्ध हो तो ब्रह्माण्ड योग होता है । फल : जिसके हाथ में ब्रह्माण्ड योग होता है वह व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त सम्पन्न होता है तथा राजा के समान जीवन व्यतीत करता है । टिप्पणी : सामुद्रिक शास्त्र के विद्वानों ने निम्नलिखित योग भी ब्रह्माण्ड योग बताये हैं । १. यदि मध्यमा उंगली के दूसरे पर्व पर तीन या चार [चित्र : ब्रह्माण्ड योग] खड़ी रेखाएं हों । २. यदि हथेली की सभी उंगलियों के नीचे छोटे अर्द्ध चन्द्र हों । ३. यदि अंगूठा लम्बा, पतला और पीछे की तरफ झुका हुआ हो साथ ही शुक्र पर्वत पूर्ण विकसित हो । ४. यदि चन्द्र पर्वत से दो रेखाएं निकलती हों तथा एक रेखा शुक्र पर्वत तथा दूसरी रेखा बुध पर्वत की ओर जाती हो । ५. यदि हाथ में सूर्य रेखा के साथ-साथ सहायक रेखा भी चल रही हो ।