बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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रहते हैं। यद्यपि ये स्वयं कलाकार होते हैं और दूसरे व्यक्तियों को भी उसी रूप में देखते हैं। किसी कारणवश ये स्वयं कलाकार नहीं भी होते तो भी कला के ये जबर- दस्त पारखी होते हैं और इनके धन का अधिकतर हिस्सा कला से सम्बन्धित कार्यों में व्यय हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों का रुझान प्रेम की तरफ विशेष रहता है परन्तु जीवन में अधिक- तर ये प्रेम के मामले में असफल ही रहते हैं। व्यावहारिक दृष्टि से ये व्यक्ति सफल नहीं होते । क्योंकि ये अधिकतर भावना एवं कल्पना में ही खोए हुए रहते हैं। जीवन में आर्थिक चिन्ता इन्हें बराबर बनी रहती है तथा स्वभाव से ये आलसी होते हैं। मेरे अनुभव में यह भी आया है कि यदि कलात्मक हाथ अत्यधिक लचीला न होकर थोड़ा-सा कड़ाई लिये हुए हो तो ऐसे व्यक्ति कला के माध्यम से अर्थ-संचय भी करते हैं तथा प्रसिद्धि भी प्राप्त करने में सफल रहते हैं। ६. आदर्श हाथ : वास्तव में हाथ का यह सर्वोत्तम प्रकार कहा गया है । ऐसा हाथ सामान्यतः सुडौल, मुलायम तथा एक विशेष लचक लिये हुए होता है। ऐसा हाथ न तो अधिक लम्बा होता है और न अधिक चौड़ा। (चित्र पृष्ठ २७ पर देखें।) ऐसे व्यक्ति भावी घटनाओं को बहुत पहले से जान लेते हैं अर्थात् ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में सूक्ष्मदर्शी होते हैं और बाल की खाल तक पहुंचने में विश्वास रखते हैं। जीवन में इनको जरूरत से ज्यादा बाधाओं एवं संघर्षों से सामना करना पड़ता है परन्तु फिर भी इन कठिनाइयों को देखकर ये विचलित नहीं होते अपितु अपने पथ पर बराबर आगे बढ़ते रहते हैं। यद्यपि कई बार समाज से इनको तिरस्कार एवं उपेक्षा भी मिलती है परन्तु इन सब बातों से ये जीवन में निराश नहीं होते । सांसारिक दृष्टि से ये व्यक्ति केवल आदर्शों में ही जीवित रहने वाले होते हैं, जिसकी वजह से ऐसे व्यक्तियों का सामाजिक जीवन प्रायः असफल-सा ही रहता है। लेकिन फिर भी ये व्यक्ति धुन के धनी होते हैं और जिस कार्य में एक बार ये हाथ डाल देते हैं उस कार्य को पूरा करके ही छोड़ते हैं। समाज के लिए इनका योगदान एक प्रकार से वरदान स्वरूप ही होता है। स्वप्न और आदर्शों में विचरण करने वाले ये व्यक्ति सांसारिक कार्यों में अन- फिट होते हैं। पास में द्रव्य न होने पर भी राजसी ठाटबाट से गुजारा करने में विश्वास रखते हैं तथा धन समाप्त हो जाने पर फाकों पर गुजारा करने में भी नहीं हिचकिचाते । इनके जीवन का अन्तिम भाग अत्यन्त दुखद होता है। ७. मिश्रित हाथ : यह हाथ का अन्तिम वर्ग कहा जा सकता है। पहले छः वर्गों में जो हाथ नहीं आता, उस हाथ की गणना इस वर्ग में की जाती है। इस प्रकार के हाथों में एक से अधिक हाथों के गुण मिलते हैं, इसी लिए इसको मिश्रित हाथ कहा जा सकता है। उदाहरण के लिए कर्मठ हाथ और दार्शनिक हाथ का मिला-जुला जो रूप होगा वह इसी वर्ग के अन्तर्गत आएगा । (चित्र पृष्ठ २८ पर देखें।)