भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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( २७० ) देव योग : परिभाषा : यदि हथेली में सात ग्रहों के पर्वतों में से ६ पर्वत दबे हुए या अदृश्य हों तथा इनसे संबंधित रेखाएं भी अदृश्य या टूटी हुई हों तो उसके हाथ में देव योग होता है । फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति सभी सुखों का भोग करता है, उसका जीवन अत्यन्त शान्त एवं सरल होता है तथा अपने विशेष क्षेत्र में वह व्यक्ति प्रसिद्धि प्राप्त करता है । एक प्रकार से इस योग को भी राज योग के समान ही समझना चाहिए । देव योग विक्रम योग : परिभाषा : यदि हथेली में सात ग्रहो के पर्वतों में से पांच पर्वत दबे हुए या अदृश्य हों तथा उनसे संबंधित रेखाएं भी अदृश्य या छिन्न भिन्न हों तो उसके हाथ में विक्रम योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह भौतिक दृष्टि से पूर्ण उन्नति करता है तथा उसके जीवन में किसी प्रकार की कोई न्यूनता नहीं रहती । विक्रम योग सुरपति योग : परिभाषा : यदि हथेली में सात ग्रहो के पर्वतों में से चार पर्वत दबे हुए कमजोर या अदृश्य हों तथा इनसे संबंधित रेखाएं भी अदृश्य या टूटी हुई हों तो सुरपति योग होता है । फल: जिसके हाथ में सुरपति योग होता है वह व्यक्ति अपने परिश्रम में धन एकत्र करता है तथा समाज में सम्मान- नीय जीवन व्यतीत करने में समर्थ होता है । उसके जीवन में भौतिक दृष्टि से कोई न्यूनता नहीं रहती । सुरपति योग