भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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( २७१ ) गजपति योग : परिभाषा : यदि हाथ में सात ग्रहों के पर्वतों में से तीन पर्वत अत्यन्त दबे हुए कमजोर या अदृश्य हों तथा इनसे सम्बन्धित रेखाएं भी अदृश्य या छिन्न-भिन्न हों तो गजपति योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह परिश्रमी और हमेशा उन्नति की ओर अग्रसर होने वाला व्यक्ति होता है । वह जीवन में कुछ करके दिखाना चाहता है । जीवन के ३२ वें वर्ष से उसका भाग्योदय होता है और उसके बाद से जीवन पर्यन्त वह सभी दृष्टियों से पूर्ण सुख भोग करता है । [चित्र: गजपति योग] मन्महेन्द्र योग : परिभाषा : यदि हथेली में प्रजापति, वरुण, हर्षल, प्लूटो नेपच्यूने तथा पर्वत बलवान हों तथा राहू एवं केतु के पर्वतों का रेखा के द्वारा सम्बन्ध हो तो मन्महेन्द्र योग होता है । फल : मन्महेन्द्र योग मे जन्म लेने वाला व्यक्ति बल- वान, गुणवान तथा पूज्यनीय होता है । किसी एक क्षेत्र में वह अत्यन्त प्रसिद्धि प्राप्त करता है । अथवा उच्च शासकीय पद प्राप्त कर अपने जीवन को आनन्दमय बनाने में समर्थ होता है । [चित्र: मन्महेन्द्र योग] हरिहरब्रह्म योग : परिभाषा : यदि दाहिने हाथ में बुध, चन्द्र, शुक्र, तथा सूर्य पर्वतों का परस्पर रेखाओं के द्वारा सम्बन्ध होता हो और ये रेखाए आपस मे कहीं पर भी न कटती हों तो हरि- हरब्रह्म योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ मे हरिहरब्रह्म योग होता है वह व्यक्ति शुद्ध सांस्कृतिक जीवन व्यतीत करने वाला एवं सत्य बोलने वाला, वेद तथा संस्कृति को जानने वाला, एवं देवपूजक होता है । ऐसे व्यक्ति का समाज में विशेष सम्मान होता है । [चित्र: हरिहर ब्रह्म योग]