भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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( २७५ ) ज्योतिर्विद योग : [चित्र: ज्योतिर्विद योग] परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत पर किसी प्रकार की बाधक रेखाएं न हों तथा यह पर्वत अपने आप में पुष्ट हो तो ज्योतिर्विद योग होता है । फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति सफल भविष्य वक्ता होता है । भूमि योग : परिभाषा : यदि मंगल तथा शुक्र पर्वत के बीच पर- स्पर रेखा संबन्ध हो तथा शुक्र पर्वत पर भाग्य रेखा की कोई सहायक रेखा आकर मिलती हो तो भूमि योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह भूमि सम्बन्धी कार्यों से विशेष लाभ उठाता है तथा अपने आप में भूमिपति होता है । [चित्र: भूमि योग] पुत्रतः धनाप्ति योग : [चित्र: पुत्रतः धनाप्ति योग] परिभाषा : यदि गुरु पर्वत से कोई पतली रेखा शुक्र पर्वत तक जाती हो तथा तर्जनी और मध्यमा के बीच तिल चिह्न हो तो यह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसे जीवन भर पुत्र से धन प्राप्ति होती रहती है तथा सन्तान सुख मिलता है ।