भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 350 में से

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उपसंहार प्रत्येक मनुष्य या सही शब्दों में कहा जाय तो प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का अंश विद्यमान है और इसीलिए हम ईश्वर पुत्र कहे जाते हैं। ईश्वर से यहाँ सारा कार्य व्यवस्थित है, सोच समझ कर किया हुआ है, यदि आप का निर्माण हुआ है तो उसके पीछे कोई बहुत बड़ा रहस्य है कोई बहुत बड़ी आवश्यकता है। हकीकत में देखा जाय तो इस पूरे संसार में जिस रूप में आपका निर्माण और प्रादुर्भाव हुआ है वह केवल आपका ही हुआ है। आपके समान केवल इस पूरे विश्व में आप ही हैं। यह हो सकता है कि विश्व में कुछ आपसे घटकर हो सकते हैं या कुछ आपसे बढ़ कर हो सकते हैं परन्तु जिन तत्वों के अनुपात से आपका निर्माण हुआ है वह अपने आप में अन्यतम है। इसीलिये यह कहा जाता है कि ये आपके हाथ में जो रेखाएं हैं वे केवल आपके हाथ ही में है। संसार में किसी भी दो व्यक्तियों के हाथों में एक सी रेखाएं मिल ही नहीं सकतीं और इसी वजह से हर व्यक्ति का व्यक्तित्व अपने आप में अलग हो जाता है। आपके सामने प्रभु ने पूरा संसार फैलाकर रखा है। अब यह आप पर निर्भर है कि इस विश्व में आप अपना क्या स्थान बनायें, किस प्रकार से स्थान बनायें, और इसके लिए यह देखना आवश्यक है कि आप अपने जीवन के क्षणों का किस प्रकार से उपयोग करते हैं। एक-एक क्षण प्रभु की तरफ से आपको वरदान स्वरूप है जो क्षण बीत गया है वह क्षण वापस आ ही नहीं सकता। चाहे हम उस क्षण को प्राप्त करने के लिए लाखों करोड़ों रुपये व्यय कर दें। जब एक क्षण लाखों करोड़ों रुपयों से भी कीमती है तो आपको यह कोई अधिकार नहीं है कि आप उस क्षण का लापरवाही के साथ उपयोग करें। व्यर्थ के वाद-विवाद में या व्यर्थ की क्रिया कलापों में उस क्षण का उपयोग करें। आपको सोचना चाहिए कि आप के जीवन के प्रत्येक क्षण का उपयोग है और आपको प्रत्येक क्षण का उपयोग सही-सही रूप में करना है। यह आप पर निर्भर है कि आप उन क्षणों का अपने साथ और अपने आपका विश्व के साथ किस प्रकार से सामंजस्य करते हैं। यह विश्व निरन्तर गतिशील है और यदि आप भी उसी के साथ-साथ गतिशील हैं तो निश्चय ही आपका विकास है। परन्तु यदि आपकी गति उससे कम हुई तो आप पिछड़ जायेंगे, पीछे रह जायेंगे और यह विश्व आपसे बहुत अधिक आगे बढ़ जायेगा। इसके बाद आप भले ही कितना ही प्रयत्न करें, विश्व की गति के साथ-साथ आप अपनी गति का सामंजस्य नहीं कर पा सकेंगे। यह पूरा जीवन आपका स्वयं का है। ये पूरे जीवन के क्षण आपके सामने खुले हुए पड़े हैं। आपको चाहिए कि आप एक-एक क्षण का उपयोग करें। प्रत्येक