बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअंगूठा और उंगलियां अंगूठा एक प्रकार से पूरे हाथ का प्रतिनिधित्व करता है। हाथ की रेखाओं का जितना महत्त्व होता है, उससे भी ज्यादा महत्त्व अंगूठे का माना गया है। जिस प्रकार मनुष्य का चेहरा उसके जीवन का प्रतिबिम्ब होता है, ठीक उसी प्रकार उसके हाथ का अंगूठा भी उसके पूरे व्यक्तित्व को हस्तरेखाविद् के सामने साकार कर देता है। पूरे हाथ का मूल, अंगूठे को ही माना गया है क्योंकि बिना अंगूठे के उंगलियों का महत्त्व एक प्रकार से नगण्य-सा हो जाता है। अंगूठा ही पूरे हाथ की शक्ति को अपने हाथ में संचित रखता है और कार्य करने की क्षमता प्रदान करता है। बच्चे के जन्म के समय भी उसका अंगूठा चारों उंगलियों से ढका हुआ सा रहता है, अतः हस्तरेखा विज्ञान में अंगूठे का महत्त्व सर्वोपरि माना गया है। 1 2 3 4 5 अंगूठे के विभिन्न प्रकार अंगूठा इच्छा-शक्ति का केन्द्र माना जाता है जोकि तीन हड्डियों से मिलकर निर्मित होता है। हथेली से आगे निकले हुए दो भाग स्पष्ट दिखाई देते हैं। तीसरे भाग से हथेली की आन्तरिक रचना होती है जोकि शुक्र पर्वत कहा जाता है और यह भाग प्रेम तथा वासना का केन्द्र माना गया है। इससे ऊपर का भाग तर्क एवं नाखून से जुड़े हुए भाग को इच्छा-शक्ति का द्योतक कहा जाता है। अंगूठा मानव की आन्तरिक क्रियाशीलता को स्पष्ट करता है और इसका सीधा संबंध मस्तिष्क से होता है। चूंकि मानव शरीर में उसका मस्तिष्क सर्वोपरि माना