भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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को व्यवस्थित कर सकते हैं, तथा संघर्षों, खतरों, घात-प्रतिघातों से अपने-आप को बचाते हुए जल्दी से जल्दी अपने लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं, वांछित कार्य को सम्पन्न कर अपने व्यक्तित्व का विस्तार कर सकते हैं। आज सारे विश्व की आँखें इससे संबंधित ज्ञान के लिए भारत की ओर लगी हैं, और इस समय में भारत का यह कर्तव्य है कि वह आगे बढ़कर इस क्षेत्र में नेतृत्व करे, विश्व को दिशा निर्देश दे और नवीनतम सूत्रों से परिचित कराए। काफी समय से इस बात की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी कि सामुद्रिक शास्त्र पर एक ऐसा सांगोपांग ग्रन्थ लिखा जाये, जिसमें हस्तरेखा से संबंधित सभी अंगों-उपांगों का सचित्र विवरण वर्णन हो तथा सरलतम भाषा में उच्चतम ज्ञान दिया जा सके। मुझे विश्वास है कि यह ग्रंथ इस उद्देश्य की पूर्ति में सहायक हो सकेगा। इस ग्रन्थ में मैंने भारतीय एवं पाश्चात्य सामुद्रिक ग्रंथों का निचोड़ दिया है, साथ ही यह भी बताया है कि दोनों पद्धतियों में मूलतः क्या अन्तर है ? यह अन्तर क्यों है ? सही पद्धति कौन-सी है ? तथा किन सूत्रों के माध्यम से सही-सही भविष्य- कथन किया जा सकता है ? इस पुस्तक में पहली बार इन तथ्यों का समावेश हुआ है, साथ ही हाथ की रेखाओं के बारे में, उंगलियों व उनके जोड़ों के बारे में, तथा मानव के अन्य चिह्नों के बारे में विस्तार से विवरण संगृहीत हुआ है, इन सबके पीछे है, मेरा अध्ययन, अध्ययन से भी बढ़ कर है विषय प्रतिपादन—और विषय प्रतिपादन से भी बढ़कर है मेरा इस क्षेत्र में वर्षों का अनुभव। भारत ही नहीं, विश्व के सामुद्रिक ग्रन्थों में भी ज्योतिष योगों का पूर्ण विवरण-वर्णन नहीं है, क्योंकि यह विषय दुरूह है, दुर्गम है, अप्राप्य है। इस पुस्तक में पहली बार दो सौ चालीस से भी अधिक हस्तरेखा योगों का सांगोपांग अध्ययन स्पष्ट हुआ है, यह इस पुस्तक की विशेषता है। इसके अतिरिक्त मैंने शरीर, अंग लक्षण, हस्त लक्षण आदि भी विस्तार से स्पष्ट किए हैं, साथ ही व्यावहारिक अनुभव के लिए हस्त चित्र के माध्यम से सम्पूर्ण भूत, भविष्य-कथन कर पुस्तक को प्रामाणिकता प्रदान की है। मुझे विश्वास है, मेरे पाठकों को व ज्योतिष के विद्वानों को मेरा यह परिश्रम सार्थक लगेगा, और मुझे यह भी विश्वास है कि वे इस पुस्तक से निश्चय ही लाभान्वित होंगे।

सी. एफ. 14, हाईकोर्ट कालोनी, —नारायणदत्त श्रीमाली जोधपुर (राजस्थान) फोन नं० 22209