बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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को व्यवस्थित कर सकते हैं, तथा संघर्षों, खतरों, घात-प्रतिघातों से अपने-आप को बचाते हुए जल्दी से जल्दी अपने लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं, वांछित कार्य को सम्पन्न कर अपने व्यक्तित्व का विस्तार कर सकते हैं। आज सारे विश्व की आँखें इससे संबंधित ज्ञान के लिए भारत की ओर लगी हैं, और इस समय में भारत का यह कर्तव्य है कि वह आगे बढ़कर इस क्षेत्र में नेतृत्व करे, विश्व को दिशा निर्देश दे और नवीनतम सूत्रों से परिचित कराए। काफी समय से इस बात की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी कि सामुद्रिक शास्त्र पर एक ऐसा सांगोपांग ग्रन्थ लिखा जाये, जिसमें हस्तरेखा से संबंधित सभी अंगों-उपांगों का सचित्र विवरण वर्णन हो तथा सरलतम भाषा में उच्चतम ज्ञान दिया जा सके। मुझे विश्वास है कि यह ग्रंथ इस उद्देश्य की पूर्ति में सहायक हो सकेगा। इस ग्रन्थ में मैंने भारतीय एवं पाश्चात्य सामुद्रिक ग्रंथों का निचोड़ दिया है, साथ ही यह भी बताया है कि दोनों पद्धतियों में मूलतः क्या अन्तर है ? यह अन्तर क्यों है ? सही पद्धति कौन-सी है ? तथा किन सूत्रों के माध्यम से सही-सही भविष्य- कथन किया जा सकता है ? इस पुस्तक में पहली बार इन तथ्यों का समावेश हुआ है, साथ ही हाथ की रेखाओं के बारे में, उंगलियों व उनके जोड़ों के बारे में, तथा मानव के अन्य चिह्नों के बारे में विस्तार से विवरण संगृहीत हुआ है, इन सबके पीछे है, मेरा अध्ययन, अध्ययन से भी बढ़ कर है विषय प्रतिपादन—और विषय प्रतिपादन से भी बढ़कर है मेरा इस क्षेत्र में वर्षों का अनुभव। भारत ही नहीं, विश्व के सामुद्रिक ग्रन्थों में भी ज्योतिष योगों का पूर्ण विवरण-वर्णन नहीं है, क्योंकि यह विषय दुरूह है, दुर्गम है, अप्राप्य है। इस पुस्तक में पहली बार दो सौ चालीस से भी अधिक हस्तरेखा योगों का सांगोपांग अध्ययन स्पष्ट हुआ है, यह इस पुस्तक की विशेषता है। इसके अतिरिक्त मैंने शरीर, अंग लक्षण, हस्त लक्षण आदि भी विस्तार से स्पष्ट किए हैं, साथ ही व्यावहारिक अनुभव के लिए हस्त चित्र के माध्यम से सम्पूर्ण भूत, भविष्य-कथन कर पुस्तक को प्रामाणिकता प्रदान की है। मुझे विश्वास है, मेरे पाठकों को व ज्योतिष के विद्वानों को मेरा यह परिश्रम सार्थक लगेगा, और मुझे यह भी विश्वास है कि वे इस पुस्तक से निश्चय ही लाभान्वित होंगे।
सी. एफ. 14, हाईकोर्ट कालोनी, —नारायणदत्त श्रीमाली जोधपुर (राजस्थान) फोन नं० 22209
विषय-सूची
- प्रवेश 9-15 | 10. दरिद्र योग 206-207
- हाथ देखने की विधि 15-16 | 11. दुरधरा योग 207
- हाथ : एक परिचय 17-28 | 12. केमद्रुम योग 208
- हाथ-हथेली-उंगलियां 29-39 | 13. अनफा योग 209-210
- अंगूठा और उंगलियां 40-59 | 14. सुनफा योग 210-211
- पर्वत 60-75 | 15. अशुभ योग 211
- पर्वत युग्म एवं हस्तचिन्ह 76-87 | 16. शुभकर्तरी योग 211
- रेखाएं 88-102 | 17. पापकर्तरी योग 211
- जीवन-रेखा 103-106 | 18. उभयचरिक योग 212
- मस्तिष्क-रेखा 107-115 | 19. पर्वत योग 212-213
- हृदय-रेखा 116-123 | 20. वासी योग 213
- सूर्य-रेखा 124-130 | 21. वेशि योग 213-214
- भाग्य-रेखा 131-140 | 22. भास्कर योग 214
- स्वास्थ्य-रेखा 141-146 | 23. गंधर्व योग 214-215
- विवाह-रेखा 147-151 | 24. वसुमति योग 215
- गौण रेखाएं 152-164 | 25. शरच्चतुत्सागर योग 215
- हस्त-चिन्ह 165-178 | 26. चतुत्सागर योग 216
- काल-निर्धारण 179-180 | 27. रोग योग 216-220
- हस्त-चित्र लेने की रीति 181-184 | 28. नपुंसक योग 220
- पंचांगुली देवी 185-192 | 29. चन्द्रमंगल योग 220
- हस्त-परिचय 193-201 | 30. सती योग 221
- हस्त-रेखा योग 202-304 | 31. कुलटा योग 221-223
- गजलक्ष्मी योग 202 | 32. अखण्ड साम्राज्यपति
- अमला योग 202-203 | योग 223
- शुभ योग 203 | 33. शश योग 223-224
- बुध योग 203-204 | 34. मालव्य योग 224-225
- इन्द्र योग 204 | 35. हंस योग 225
- महत योग 204-205 | 36. रुचक योग 225-226
- लग्नाधि योग 205 | 37. भद्र योग 226-227
- अधियोग 205-206 | 38. ब्रह्मचर्य योग 227
- शकट योग 206 | 39. सन्तानहीन योग 227
(6) 40. विवाह योग 227-228 | 76. कूबड़ांग योग 244 41. क्लीव योग 228-229 | 77. एकपाद योग 244 42. दत्तक पुत्र योग 229 | 78. जड़ योग 244 43. मातृत्युक्त योग 229-230 | 79. नेत्रनाश योग 245 44. मातृमरण योग 230 | 80. अंध योग 245 45. पादजातत्वप्रद योग 230 | 81. शीतला योग 246 46. अनूढापत्यत्व साधक योग 230 | 82. सर्पभय योग 246 47. बंचना चोरभेती योग 231 | 83. ग्रहण योग 246 48. राज्यलक्ष्मी योग 231 | 84. चांडाल योग 247 49. गुरुकृतारिष्ट भंग योग 232 | 85. व्रण योग 247 50. राहुकृतारिष्ट भंग योग 232 | 86. गल रोग योग 247 51. अशुभकृतारिष्ट भंग योग 232 | 87. लिंगच्छेदन योग 247 52. शुभकृतारिष्ट भंग योग 233 | 88. कलह योग 248 53. कला योग 233 | 89. उन्माद योग 248 54. व्यापार योग 233 | 90. कुष्ठ रोग योग 248 55. रसायन शास्त्र योग 234 | 91. जलोदर रोग योग 249 56. धार्मिक योग 234 | 92. मुनि योग 249 57. अन्तर्दृष्टि योग 234 | 93. काहल योग 249-250 58. राजनीतिज्ञ योग 235 | 94. बुध आदित्य योग 250 59. अन्वेषण योग 235 | 95. दिवालिया योग 250 60. कानून योग 235 | 96. जुआ योग 250 61. चिकित्सक योग 236 | 97. लोभ योग 251 62. सैनिक योग 236 | 98. चोरी योग 251 63. साहित्यिक योग 236-237 | 99. चाप योग 251 64. भाग्य योग 237 | 100. छाप योग 252 65. भाग्योदय योग 238 | 101. भेरी योग 252 66. पूर्ण आयु योग 238 | 102. मृदंग योग 252 67. शताधिक आयु योग 239 | 103. श्रीनाथ योग 253 68. अमितायु योग 239 | 104. विदेश यात्रा योग 253-254 69. महाभाग्य योग 239-240 | 105. पुष्कल योग 254 70. मोक्ष प्राप्ति योग 240 | 106. चामर योग 255 71. अस्वाभाविक मृत्यु | 107. मालिका योग 255-256 योग 240-242 | 108. शंख योग 256 72. सर्पदंश योग 242 | 109. वीर योग 257 73. दुर्मरण योग 242-243 | 110. प्रेष्य योग 257 74. क्षयरोग योग 243 | 111. भिक्षुक योग 257-258 75. अंगहीन योग 243 | 112. दरिद्र योग 258 | 113. रेखा योग 258-259 | 114. राजभंग योग 259-260
(7) 115. राज राजेश्वर योग 261 | 148. देवेन्द्र योग 274 116. ब्रह्माण्ड योग 261 | 149. संग योग 274 117. लक्ष्मी योग 262 | 150. नवलक्ष्मी योग 274 118. महालक्ष्मी योग 262 | 151. ज्योतिर्विद योग 275 119. भारती योग 262-263 | 152. भूमि योग 275 120. अरविन्द योग 263 | 153. पुत्रतः धनाप्ति योग 275 121. तड़ित योग 263-264 | 154. कोटीश योग 276 122. सरस्वती योग 264 | 155. अरिष्ट योग 276 123. कैलाश योग 264 | 156. कलह योग 276 124. रश्मि योग 265 | 157. उन्माद योग 277 125. दिव्य योग 265 | 158. विष योग 277 126. महाराजाधिराज योग 266 | 159. श्वान योग 277 127. देवांश योग 266 | 160. बृहद् बीज योग 278 128. पारावत योग 267 | 161. विमल योग 278 129. नृप योग 267 | 162. सरल योग 278 130. गौरी योग 267 | 163. हर्ष योग 279 131. राज योग 268 | 164. प्रव्रज्या योग 279 132. राज्य योग 268 | 165. शुक्र योग 279 133. महेन्द्र योग 269 | 166. दुर्योग 280 134. रुद्र योग 269 | 167. गोल योग 280 135. मृगेन्द्र योग 269 | 168. युग योग 280 136. देव योग 270 | 169. शूल योग 281 137. विक्रम योग 270 | 170. केदार योग 281 138. सुरपति योग 270 | 171. पाश योग 281 139. गजपति योग 271 | 172. दामिनी योग 282 140. मन्महेन्द्र योग 271 | 173. मुकुट योग 282 141. हरिहरब्रह्म योग 271 | 174. ऋण योग 282 142. कुसुम योग 272 | 175. कारक योग 283 143. अग्निकाण्ड योग 272 | 176. वल्लकी योग 283 144. मत्स्य योग 272 | 177. शारदा योग 283 145. अग्रजघातक योग 273 | 178. समुद्र योग 284 146. कूर्म योग 273 | 179. अर्द्ध चन्द्र योग 284 147. आत्मघात योग 273 | 180. छत्र योग 284
(8) 181. कूट योग 285 | 220. अंशावतार योग 298 182. इषु योग 285 | 221. सार्वभौम योग 298 183. दिग्बल योग 285 | 222. व्याघ्रहन्ता योग 299 184. नीच भंग राज योग 286 | 223. दृढ़ योग 299 185. चण्डिका योग 286 | 224. भाग्यवान योग 299 186. नाभस योग 287 | 225. कुलवर्धन योग 300 187. जय योग 287 | 226. विहग योग 300 188. विद्युत योग 287 | 227. शृंगाटक योग 300 189. शिव योग 288 | 228. हल योग 301 190. विष्णु योग 288 | 229. कमल योग 301 191. बह्मा योग 288 | 230. वापी योग 301 192. हरि योग 289 | 231. मरूत्वेग योग 302 193. हर योग 289 | 232. वायु योग 302 194. ब्रह्मा योग 289 | 233. प्रभन्जन योग 302 195. रवि योग 290 | 234. पारिजात योग 303 196. पति त्याग योग 290 | 235. गज योग 303 197. गर्भपात योग 290 | 236. नवेश योग 303 198. ग्रूप योग 291 | 237. कालनिधि योग 304 199. नव योग 291 | 238. अष्टलक्ष्मी योग 304 200. दण्ड योग 291 | 23. ललाट रेखाएं 305-315 201. शक्ति योग 292 | 1. ललाट पर राशियों के 202. श्रीमहालक्ष्मी योग 292 | चिह्न तथा स्थान 306-307 203. धनवृद्धि योग 292 | 2. ललाट पर ग्रहों के चिह्न 204. अकस्मात धन प्राप्ति योग 293 | तथा स्थान 307 205. ऋषि योग 293 | 3. ललाट रेखा फल 308-312 206. दुर्धर्ष योग 293 | 4. ललाट पर तिल व 207. गरुड़ योग 294 | उनका फल 312-315 208. रज्जु योग 294 | 24. शरीर लक्षण 316-327 209. मूसल योग 294 | 1. शरीर लक्षण (पुरुष) 316-323 210. नल योग 295 | 2. शरीर लक्षण (स्त्री) 323-327 211. गौ योग 295 | 25. स्त्री की इक्कीस 212. गाल योग 295 | जातियां 327-330 213. संन्यास योग 296 | 26. हस्तरेखा व्यावहारिक 214. पद्म योग 296 | ज्ञान 331-346 215. नागेन्द्र योग 296 | 27. उपसंहार 347-348 216. त्रिलोचन योग 297 | 217. चन्द्र योग 297 | 218. चक्र योग 297 | 219. चतुर्मुख योग 298 |
प्रवेश परमात्मा ने मानव-जीवन की और विशेषकर मनुष्य की संरचना कुछ इस प्रकार से की है कि आज तक संसार के सारे वैज्ञानिक इस जटिल प्रक्रिया को सुल- झाने का जी-तोड़ प्रयत्न करने पर भी अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो पा रहे हैं। वे जितना ही ज्यादा इस प्रक्रिया को समझने का यत्न करते हैं, उतने ही ज्यादा उल- झते चले जा रहे हैं। इस विश्व में जितना भी ज्ञान और विज्ञान है उन सभी का ध्येय मानव और मानव के व्यवहार को समझना एवं उसे सुख पहुंचाना है, परन्तु यह सुख उसे तभी मिल सकता है जबकि वह मनुष्य के उन गोपन रहस्यों को पहले से ही जान ले, जोकि अचानक अनिश्चय के रूप में प्रकट होकर उसके सारे किये-कराये पर पानी फेर देता है। यह 'भविष्य' एक ऐसा शब्द है जो अपनेआप में अत्यन्त गोप- नीय, जरूरत से ज्यादा जटिल तथा दुर्बोध है। विज्ञान के समस्त प्रकार इस भविष्य में होने वाली घटनाओं को समझने और सुलझाने का प्रयत्न कर रहे हैं परन्तु अभी तक वे अपने उद्देश्य में पूर्णतया सफल नहीं हो सके हैं। यदि इस 'रहस्य' पर कोई रोशनी डाल सकता है या उसे समझने में सहायक हो सकता है तो वह केवल 'सामुद्रिक-शास्त्र' है, इसे सभी विद्वानों ने एक स्वर से स्वीकार किया है। मनुष्य सदा से भविष्य को जानने के लिए प्रयत्नशील रहा है। उसके दिमाग में अज्ञात भविष्य के प्रति बराबर आशंका बनी रहती है। वह यह सोचता है कि मैं जो वर्तमान में कार्य कर रहा हूं, और जिस पर अपने सारे जीवन का श्रम, बुद्धि और धन लगा रहा हूं, कहीं ऐसा न हो जाए कि भविष्य में मैं अपने प्रयत्नों में सफल न हो सकूं और ऐसा सोच-सोचकर वह एक अज्ञात आशंका से डरा-डरा सा रहता है। कभी-कभी ईश्वर पर आश्चर्य और इसके ठीक बाद उसकी महानता के सामने मेरा सिर श्रद्धा से झुक जाता है कि वह कितना कुशल कारीगर है जिसने भविष्य की सैकड़ों, लाखों घटनाओं को टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों के माध्यम से मनुष्य के हाथों में अंकित कर दिया है, और श्रद्धा होती है उन ऋषियों पर जिन्होंने अपनी तपस्या और दिव्य दृष्टि के माध्यम से इन रेखाओं के रहस्य को समझा है, और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस ज्ञान को सुलभ किया है। हाथ का अध्ययन करने के लिए कई तथ्य ध्यान में रहने आवश्यक हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि किसी भी व्यक्ति के हाथ की केवल एक रेखा देखकर ही
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उस पर अपना विचार दृढ़ नहीं बना देना चाहिए । क्योंकि केवल एक रेखा ही उससे सम्बन्धित तथ्य को स्पष्ट नहीं कर सकती, अपितु उसकी सहायक रेखाएं भी उस तथ्य को स्पष्ट करने में सहायक होती हैं। जिस प्रकार रेल के एक इंजन में सैकड़ों छोटे-मोटे-कल-पुर्जों होते हैं और उन सभी कल-पुर्जों का अपने-अपने स्थान पर महत्व है। यदि उन पुर्जों में से एक भी पुर्जा रुक जाए तो एक प्रकार से पूरा इंजन ही रुक जाएगा, ठीक यही स्थिति हाथ में रेखाओं की है। यदि इन रेखाओं को देखने के साथ- साथ उनकी सहायक रेखाएं भली प्रकार से न देखें या उन सहायक रेखाओं का महत्व न समझें तो परिणाम में भयंकर गलती होने की संभावना हो जाती है। अतः एक कुशल हस्तरेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह हथेली पर पाई जाने वाली प्रत्येक रेखा को अपनी आंख से ओझल न होने दे, अपितु छोटी से छोटी रेखा को उतना ही महत्व दे जितना कि बड़ी और प्रमुख रेखा का महत्व होता है।
ईश्वर ने हाथ में जो रेखाएं अंकित की हैं वे बहुत सोच-समझकर अंकित की हैं। हाथ में पाई जाने वाली प्रत्येक रेखा का अपना महत्व है और किसी भी एक रेखा का सम्बन्ध दूसरी रेखा से होता है। यदि हम एक रेखा को ध्यान में रखकर अपना निर्णय सुना दें तो उसमें गलती होने की संभावना हो जाती है, इसलिए प्रमुख रेखा और उसकी सहायक रेखाओं का भली भांति अध्ययन करना चाहिए और उसके बाद ही उससे सम्बन्धित भविष्य-कथन स्पष्ट करना चाहिए। कई लोगों की यह सहज जिज्ञासा होती है कि दाहिने हाथ को महत्व देना चाहिए अथवा बायें हाथ को ? अलग-अलग लोगों का इस सम्बन्ध में अलग-अलग मत है। कुछ लोग दाहिने हाथ को ही महत्व देते हैं। उनकी दृष्टि में बायें हाथ का कोई महत्व नहीं है, जबकि कुछ लोग बायें हाथ को ही प्रधानता देते हैं। उनका कहना है कि दाहिना हाथ सक्रिय होने के कारण उसमें बहुत जल्दी-जल्दी रेखाएं बदल जाती हैं जबकि बायें हाथ में रेखाएं ज्यादा समय तक टिकी रहती हैं। कुछ लोगों का यह भी मत है कि दोनों ही हाथों का बराबर अध्ययन करना चाहिए, परन्तु मैं ऐसा समझता हूं कि ये सभी मत एक प्रकार से अपूर्ण हैं। इन विद्वानों ने जो मत निर्धारित किये हैं वे केवल सुनी-सुनाई बातों पर अथवा अपने अधकचरे ज्ञान के आधार पर ही स्थिर किये हैं। वास्तव में इस सम्बन्ध में 'हस्तरेखा-संजीवनी' नामक ग्रन्थ में प्रामाणिक विवरण मिलता है।
हस्तरेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह दाहिने हाथ को ही विशेष रूप से महत्व दे, क्योंकि हम अपने जीवन में अधिकतर कार्य दाहिने हाथ से करते हैं, अतः हमारी सक्रियता दाहिने हाथ से झांकी जा सकती है। यहां यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि जो व्यक्ति बायें हाथ से लिखते हैं या जीवन का अधिकतर कार्य बायें हाथ से करते हैं उनका हाथ देखते समय उनके बायें हाथ को महत्व देना चाहिए । इसी प्रकार जो महिलाएं स्वयं अपने पैरों पर खड़ी हैं या नौकरी कर रही हैं अथवा अपनी बुद्धि से,
( ११ ) अपने विचारों से तथा अपने हाथों से धनोपार्जन में सक्रिय हैं, उनका भी दाहिना हाथ ही देखना चाहिए । यहां यह प्रश्न उठता है कि जब जीवन में दाहिने हाथ का ही महत्त्व है तो बायें हाथ की क्या उपयोगिता है ? मैंने ऊपर ही यह बात स्पष्ट कर दी है कि जो व्यक्ति बायें हाथ से ही लिखते हैं या जिनका बायां हाथ ज्यादा सक्रिय है, उनके बायें हाथ को ही महत्व देना चाहिए । साथ ही साथ उन स्त्रियों का भी बायां हाथ ही देखना चाहिए जो पराश्रयी हैं या जो अपने पति पर अथवा अपने पिता पर आश्रित हैं । इसी प्रकार जो पुरुष बेकार हैं या स्वयं धनोपार्जन में सक्षम नहीं हैं उनका भी भविष्य स्पष्ट करते समय बायें हाथ को ही महत्व देना चाहिए । इसके साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि जब हम किसी पुरुष के दाहिने हाथ को महत्व दें और उस हाथ में कोई बात स्पष्ट दिखाई न दे तो उसकी स्पष्टता के लिए दूसरे हाथ का अर्थात् बायें हाथ का आश्रय लेना चाहिए । इस प्रकार यदि कोई तथ्य या घटना दोनों ही हाथों से दिखाई दे तो उस घटना को प्रामाणिक मानना चाहिए । इसी प्रकार जो महिलाएं राजकीय सेवा में हैं अथवा स्वतंत्र व्यवसाय में संलग्न हैं उनका दाहिना हाथ देखना चाहिए, पर इसके साथ ही साथ यदि कोई बात पूर्णतः स्पष्ट नहीं होती है तो उसकी स्पष्टता बायें हाथ को देख- कर ज्ञात कर लेनी चाहिए । प्रश्न उठता है कि क्या हाथ की रेखाओं के माध्यम से सही और सफल भविष्य- फल स्पष्ट किया जा सकता है ? कई लोग इस मामले में सन्देह करते हैं । अधिकतर लोग इस तथ्य को मेरे सामने व्यक्त करते हैं कि जब हाथ की रेखाएं बराबर बदलती रहती हैं तो फिर उससे भविष्यफल कैसे ज्ञात किया जा सकता है ? कुछ लोगों ने यह भी प्रश्न किया कि विद्वानों के अनुसार सात वर्षों में पूरे हाथ की रेखाएं बिल्कुल बदल जाती हैं तब फिर अगले दस वर्षों का भविष्य या बीस वर्षों का भविष्यफल ज्ञात करना असम्भव सा ही है । परन्तु जैसा कि मैं पीछे स्पष्ट कर चुका हूं कि ये बातें उन लोगों ने फैलाई हैं जिन्हें हस्तरेखा का पूर्ण ज्ञान नहीं है या जिनका ज्ञान केवल किताबी ज्ञान है । वास्तविकता यह है कि हाथ की रेखाएं बदलती नहीं हैं । हाथ में जो मूल रेखाएं हैं वे ज्यों की त्यों विद्यमान रहती हैं । इनकी.सहायक रेखाएं कुछ समय के लिए बनती हैं और भावी तथ्यों का संकेत देती हुई मिट जाती हैं । इनके साथ ही साथ हाथ पर पाये जाने वाले कुछ ऐसे चिह्न अवश्य होते हैं जो कुछ समय के लिए बनते हैं और मिट जाते हैं । उन चिह्नों का बनना विशेष घटनाओं का प्रतीक है । इसी प्रकार उन चिह्नों का मिट जाना भी अपनेआप में आने वाले भविष्य का संकेत है । अतः ये चिह्न बनकर अथवा मिटकर आने वाले समय के तथ्यों का निरूपण ही करते हैं ।
( १५ ) इसके साथ ही साथ यह बात भी स्पष्ट है कि वे चिह्न मिट भले ही जाते हैं परन्तु अपना स्मृति-चिह्न अंकित करके ही जाते हैं और वे स्मृति-चिह्न बराबर कायम रहते हैं। अतः यह कहना कि कोई चिह्न हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है प्रामाणिक नहीं है। उन स्मृति-चिह्नों के माध्यम से हस्तरेखा विशेषज्ञ आने वाली घटनाओं का वर्णन कर लेता है। मैंने हस्तरेखा की प्रामाणिकता के लिए अनुभव जन्य परीक्षण किए। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि विशेष तथ्य के लिए एक विशेष चिह्न होता है, और उस विशेष चिह्न के माध्यम से उस व्यक्ति के व्यक्तित्व को समझा जा सकता है। जिस प्रकार जन्मकुण्डली को समझने के लिए और उसके माध्यम से सही भविष्य स्पष्ट करने के लिए इस बात का ज्ञान जिस ज्योतिषी को हो कि इस जन्मकुण्डली का मूल कौन-सा ग्रह है, जिसने इसके सारे व्यक्तित्व को प्रभावित कर रखा है। जब उस ग्रह की पकड़ आ जाती है या उस ग्रह को समझ लिया जाता है तब उस व्यक्ति का व्यक्तित्व पूरी तरह से हमारे सामने साकार हो जाता है। इसी प्रकार पूरे हाथ को देखने से पहले यह जानकारी प्राप्त कर लेनी ज्यादा उचित रहती है कि इस हाथ में वह कौन-सा चिह्न है जिसके माध्यम से इसके पूरे व्यक्तित्व को समझा जा सके। मैंने परीक्षण के लिए लगभग चार हजार हत्यारों के हाथ देखे और मैंने उन हत्यारों के भी हाथ देखे हैं जिन्होंने अपने ही हाथों से जीवन में किसी का खून किया है, या किसी व्यक्ति के प्राण लिए हैं। उन सभी हाथों में एक चिह्न समान था, वह यह कि हत्यारे का अंगूठा छोटा तथा अंगूठे का ऊपरी सिरा चपटा होता है। साथ ही साथ अंगूठे का नाखून छोटा और लगभग गोल सा होता है। यह चिह्न अपने आप में एक विशेष चिह्न है और इस परीक्षण के माध्यम से यह बात स्पष्ट हो गई कि जिस व्यक्ति का अंगूठा सामान्यतः उसकी अंगुलियों के अनुपात से छोटा तथा भारीपन लिये हुए होगा तथा जिसके अंगूठे का सिरा मोटा थुलथुला होने के साथ-साथ उस पर अंकित नाखून गोल-सा होगा वह व्यक्ति निश्चय ही अपने जीवन में हत्यारा होगा और किसी की हत्या करने के कारण जेल-जीवन व्यतीत करेगा । एक बार इससे संबंधित घटना भी स्पष्ट हो गई। एक मिल में काम करने वाला एक अपरिचित मजदूर एक दिन मेरे सामने आया और उसने अपना भविष्य जानने के लिए अपना हाथ मेरे सामने फैला दिया। उस पूरे हाथ में अंगूठा अपने आप में अलग सा ही था और ऊपर मैंने जो तथ्य अंकित किये हैं, वे सारे ही तथ्य उस अंगूठे में दिखाई दे रहे थे। मेरे दिमाग में सबसे पहले यही बात कौंधी कि यह व्यक्ति हत्यारा होना चाहिए, और इसके हाथ खून से रंगे होने चाहिए। अब यह प्रश्न उठता है कि वह हत्या किस उम्र में करेगा या उसका समय कौन-सा होगा। इसके लिए शनि पर्वत तथा शनि रेखा का आश्रय लेना पड़ेगा। जिस
( १३ )
स्थान पर शनि रेखा चलते-चलते टूट गई हो और, यदि वहां से एक सीधी रेखा आयु रेखा की ओर खींचें तो जिस बिन्दु पर वह रेखा मिलेगी उस बिन्दु के अनुसार अर्थात् उस रेखा के उस बिन्दु तक जितनी आयु का अनुपात होगा उसी आयु में वह इस प्रकार का जघन्य कार्य करेगा । यह तथ्य अनुभव के बाद ही आ सकता है । जब उस मजदूर ने अपना हाथ मेरे सामने फैलाया, उस समय उसकी आयु ४५ वर्ष के लगभग थी और इस बिन्दु से जब मैंने अनुमान लगाया तो यह कार्य लगभग ४० साल के आसपास होना चाहिए था । मैंने उसकी आंखों में आंखें डालकर दो क्षण तक घूरा और उसके बाद सबसे पहला मेरा कथन था कि तुम चाहे कितने ही बचते रहो या कानून की आंखों में धूल झोंकते रहो, तुम कानून के पंजे से बच नहीं सकते । शीघ्र ही तुम्हें जेल जाना पड़ेगा, क्योंकि तुम अपने जीवन में किसी व्यक्ति की हत्या कर चुके हो । उसकी आंखे फटी की फटी रह गई । उसने अपने मन में सोचा होगा कि आज तक जिस पुलिस को मैं गच्चा दे रहा था और अभी तक मैं कानून की सीमाओं से बहुत अधिक परे था, उस तथ्य को इस सामने वाले व्यक्ति ने कैसे जान लिया ? उसने अपना हाथ समेट लिया और बिना एक क्षण भी गंवाये तीर की तरह मेरे कमरे से बाहर निकल गया । उसका इस प्रकार जाना ही मेरे कथन की प्रामाणिकता थी । उसके बाद से आज तक मैंने उसको नहीं देखा । यह तथ्य सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा है। बारहवीं शताब्दी में लिखी हुई एक हस्तलिखित पुस्तक मेरे सामने आई थी, जिसमें यह स्पष्ट किया था कि जिस व्यक्ति का अंगूठा छोटा, फैला हुआ तथा चपटा हो एवं उसका नाखून लगभग गोल सा हो, साथ ही मंगल पर्वत पर क्रास का चिह्न हो, वह व्यक्ति निश्चय ही हत्यारा होगा । उसने यह बात अपने अनुभव से लिखी थी और उसका अनुभव आगे की पीढ़ियों को मिलता रहा । उसने इस सम्बन्ध में और परीक्षण किये और यह पाया कि वास्तव में जिस व्यक्ति के हाथ में यह चिह्न होता है वह हत्यारा ही होता है । इसके बाद १६वीं शताब्दी में एक और ग्रन्थ निकला, जिसका नाम था 'हस्तरेखाएं' । उस पर भी यह तथ्य अंकित था और वही ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी चलता हुआ मुझ तक आया है और यही ज्ञान आगे की पीढ़ियों तक मिलता रहेगा, और इस ज्ञान में निरन्तर विकास होता रहेगा । परन्तु इस घटना से यह तो भली-भांति स्पष्ट हो गया कि हाथ की रेखाएं जो भी कहती हैं सत्य कहती हैं । ये बिना लागे-लपेट के कहती हैं और आपकी रेखाओं में जो भी रहस्य छिपा हुआ होता है, वह अपने आप में पूर्णतः प्रामाणिक होता है । आवश्यकता है ऐसे व्यक्ति की जो उस रहस्य को समझ सके, हाथ की रेखाओं को पढ़ सके ।
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एक और उदाहरण से मैं इस बात को प्रामाणिक कर देना चाहता हूँ कि हाथ की रेखाएं जो भी कहती हैं, वह अपने आप में पूर्ण सत्य होती हैं। मृत्यु का समय तथा मृत्यु की तारीख हाथ की रेखाएं काफी समय पहले स्पष्ट कर देती हैं। मृत्यु से ६ माह पूर्व मध्यमा उंगली के नाखूनों पर आड़ी-तिरछी रेखाओं का जाल-सा बन जाता है। जब ऐसा जाल दिखाई देने लग जाए तब यह समझ लेना चाहिए कि यह व्यक्ति अब छः महीनों से ज्यादा जीवित नहीं रह सकेगा। मैंने अपने जीवन में लगभग १५-२० व्यक्तियों के हाथों में जिस समय ये चिह्न देखे, उस समय वे पूर्णतः स्वस्थ थे परन्तु उनकी मृत्यु की सूचना अगले पांच-छः महीनों में ही मिल गई। ठीक इसी प्रकार मृत्यु से सम्बन्धित रेखाएं तीन प्रकार की होती हैं। १. जीवन रेखा चलते-चलते जहां एकदम रुक जाती है और जहां यह रेखा रुकती है, उसके आगे ही काला धब्बा या क्रास का चिह्न बन जाए और उस क्रास के चिह्न से यदि जीवन रेखा की ओर सीधी रेखा खींचें तब उससे जो समय स्पष्ट होता है, वही उस व्यक्ति की आयु होती है। २. हृदय रेखा मार्ग में लोप हो गई हो और शनि पर्वत के नीचे सहसा ही दिखाई दे जाए तो समझ लेना चाहिए कि इस व्यक्ति की मृत्यु बीच रास्ते में ही हो जाएगी या यह व्यक्ति पूरी आयु नहीं भोग सकेगा। ३. यदि हृदय रेखा मस्तिष्क रेखा से शनि पर्वत के नीचे या गुरु पर्वत के नीचे मिले और दूसरे हाथ में भी ऐसा ही योग दिखाई दे तो वह व्यक्ति पूरी आयु नहीं भोगता है। पूरी आयु से मेरा मतलब उस देश के व्यक्तियों की सामान्य औसत आयु से है। भारतवर्ष में पूर्ण आयु लगभग ६० वर्ष से ७० वर्ष के बीच मानी जाती है। यदि कोई व्यक्ति ४० या ४५ वर्ष की आयु में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो ऐसी मृत्यु पूर्ण आयु नहीं कहलाती। ये तथ्य अपूर्ण आयु के सूचक हैं। अब यह ज्ञात करने के लिए कि वास्तविक आयु कितनी होगी तो जब ऐसा चिह्न दिखाई दे जाए तब सबसे पहले यह बात तो स्पष्ट हो ही जाती है कि इस व्यक्ति की अपूर्ण आयु है और जब यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है तो उस चिह्न से आयु रेखा तक रेखा खींचकर या अनुमान लगाकर आप उसकी वास्तविक आयु ज्ञात कर सकते हैं। मैं ऊपर की पंक्तियों में यह स्पष्ट कर रहा था कि हस्तरेखा मज़ाक की वस्तु नहीं है या इस पर अविश्वास करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि ये रेखाएं पूर्ण सत्य को स्पष्ट करने में सहायक हैं, साथ ही साथ भविष्य से सम्बन्धित तथ्य को जितनी स्पष्टता के साथ ये रेखाएं स्पष्ट करती हैं, उतना अन्य कोई विज्ञान नहीं। हस्तरेखा के अध्ययन के लिए कई बातें ध्यान में रखनी चाहिए। इनमें से कुछ तथ्य अग्रिलिखित हैं :-
( १५ ) १. जब भी आपके पास कोई व्यक्ति अपना हाथ दिखाने के लिए आये तो आपको चाहिए कि आप उसके हाथ का स्पर्श न करें क्योंकि आपके स्पर्श करने से आपके शरीर की विद्युत धारा से उसकी विद्युत धारा का सम्पर्क हो जाएगा और उस व्यक्ति के हाथ की मौलिकता समाप्त हो जाएगी। इसलिए हाथ को देखते समय आप अपने हाथ समेटे रहें। २. सबसे पहले उस व्यक्ति के दोनों हाथों को उल्टा करके देखना चाहिए क्योंकि हाथ को उल्टा करने से अर्थात् हथेलियां जमीन की ओर रहने से आप उसके हाथ के आकार को भली प्रकार से समझ सकेंगे कि यह हाथ वर्गाकार है अथवा चौकोर है अथवा किस प्रकार का हाथ मेरे सामने प्रस्तुत हुआ है। ३. जब हाथ का प्रकार ज्ञात हो जाए तो उसे दोनों हाथ सीधे करने के लिए कहिये और दोनों हाथ सीधे होने पर उसके मणिबन्ध से देखते-देखते ऊपर की ओर आना चाहिए। ४. इसके बाद पर्वत, पर्वत के उभार, पर्वत से जुड़ी हुई उंगलियां और अंगूठे को देखना चाहिए। अन्त में उसकी उंगलियों के अग्र भाग और नाखूनों का निरीक्षण करना चाहिए। ५. इस प्रकार हाथ का अध्ययन बिना स्पर्श किये ही कर लेने के बाद उसके हाथ को छूना चाहिए और पूरे हाथ के जोड़ों को ध्यान में रखना चाहिए। हाथ के जोड़ अर्थात् हथेली के जोड़ों से ग्रहों के भागों का भली भांति अध्ययन हो जाता है। उंगलियों के जोड़ों से भी कई तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं। हाथ का स्पर्श आपको इस बात का भी आभास दे देगा कि वह हाथ नरम है या कठोर, लचीला है अथवा सख्त। हाथ की कोमलता और कठोरता भी हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिए अत्यधिक महत्व रखती है। ६. मणिबन्ध की रेखाओं का भी हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिए महत्व होता है और उनका भी अध्ययन कर लेना चाहिए। ७. इसके बाद हथेली पर पाये जाने वाले पर्वत, पर्वतों के उभार, व दबाव साथ ही पर्वतों से जुड़ी हुई रेखाएं, दो पर्वतों की संधियां तथा उन पर पाये जाने वाले सूक्ष्म चिह्नों का भी अध्ययन करना चाहिए। ८. अन्त में उंगलियों के सिरों पर शंख, चक्र आदि दिखाई देते हैं, वे भी अपने आप में बहुत अधिक महत्व रखते हैं। अतः उनका भी अध्ययन आवश्यक है। हाथ देखने की विधि १. यों तो हाथ किसी भी समय देखा जा सकता है परन्तु इसके लिए सर्वोत्तम समय प्रातःकाल का होता है जबकि दिखाने वाले ने भोजन या नाश्ता न किया हो।
( १६ ) मेरा ऐसा अनुभव है कि भोजन करने पर रक्त का भ्रमण तेज हो जाता है, जिसकी वजह से उसके हाथ की महीन रेखाएं अदृश्य सी हो जाती हैं । ऐसी स्थिति आने पर सूक्ष्मदर्शक यंत्र का प्रयोग अवश्य ही करना चाहिए । २. हाथ दिखाने से पूर्व हाथ दिखाने वाला पृच्छक स्नान किया हुआ हो, नींद से उठा हुआ, गन्दा या आलस्य से भरा हुआ शरीर, वातावरण को बोझिल बना देता है और इससे भविष्य कथन में बाधा आती है । ३. अत्यधिक भोजन करने के बाद या व्यायाम करने के बाद भी हाथ नहीं दिखाना चाहिए । लगातार कार्य करते-करते एकदम से उठकर भी हाथ दिखाना ज्यादा उचित एवं अनुकूल नहीं कहा जा सकता । ४. अत्यधिक गर्मी में या अत्यधिक सर्दी में भी हाथ नहीं दिखाना चाहिए क्योंकि ज्यादा गर्मी पड़ने से हथेली जरूरत से ज्यादा लाल रहती है और उससे उसका वास्तविक रंग अनुभव नहीं होता । ५. शराब पीया हुआ, नशा किया हुआ या असहजावस्था में भी हस्तरेखा विशेषज्ञ के पास नहीं जाना चाहिए । जहां हाथ दिखाने वाले के लिए कुछ नियम आवश्यक हैं, उसी प्रकार हाथ देखने वाले के लिए भी नीचे लिखे कुछ नियमों का पालन आवश्यक है :— १. जिस समय क्रोध की अवस्था हो या किसी वजह से परेशानी हो उस समय हाथ नहीं देखना चाहिए । यदि कोई हाथ दिखाने के लिए आ ही जाए तो नम्रता- पूर्वक उसे मना कर देना चाहिए । २. हाथ देखते ही उसके सम्बन्ध में अच्छी या बुरी बात अथवा भविष्यफल स्पष्ट नहीं कर देना चाहिए । इससे कई प्रकार की समस्याएं पैदा हो जाती हैं । उदाहरणार्थ यदि किसी की मृत्यु एक महीने बाद ही दिखाई देती हो तो यह बात अप्रत्याशित रूप से सामने वाले को कह देना किसी प्रकार से अनुकूल नहीं है । ३. सामने वाले व्यक्ति के प्रति तटस्थ भाव रखकर के ही हाथ देखना चाहिए । अत्यधिक प्रिय या शत्रु होने पर हाथ देखने वाला तटस्थ नहीं रह पाता और इससे उसके फल-कथन में अस्वाभाविकता आ जाती है । ४. हाथ देखकर जब पूरी तरह से सन्तुष्ट हो जाए और दूसरे हाथ से भी उसकी प्रामाणिकता स्पष्ट हो जाए तभी उसको फल-कथन करना चाहिए । यदि ऊपर के तथ्य ध्यान में रखते हुए हस्तरेखा विशेषज्ञ किसी भी व्यक्ति के हाथ का अध्ययन करे तो वह निस्सन्देह सही भविष्य कथन कर सकता है और जिस प्रकार व्यक्ति स्वच्छ दर्पण में अपनी परछाई देख सकता है, उसी प्रकार उसके हाथ के माध्यम से उसका भविष्य जान सकता है ।
हाथ : एक परिचय
मणिबन्ध वह भाग है, जो भुजा को हाथ से जोड़ने में एक कड़ी के रूप में कार्य करता है । मणिबन्ध के आगे का सम्पूर्ण भाग हथेली कहलाता है और इस हथेली पर पाये जाने वाले चिह्न हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिए अत्यन्त आवश्यक होते हैं । हाथ अथवा हथेली छोटी-छोटी हड्डियों से बनी हुई होती है । उस हथेली में लगभग १४ प्रकार की हड्डियां आपस में जुड़ी हुई होती हैं, जिनसे हथेली के आकार का निर्माण होता है। इन १४ हड्डियों के आगे के भाग में तीन-तीन हड्डियों से उंगली तथा दो हड्डियों से अंगूठे का निर्माण होता है । इन हड्डियों के ऊपरी सिरे नाखूनों से सुरक्षित रहते हैं । मणिबन्ध से मध्यमा उंगली के अन्तिम सिरे तक के भाग को हाथ कहते हैं । हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार ये हाथ पांच प्रकार के होते हैं :-- १. अत्यन्त छोटा हाथ । २. छोटा हाथ । ३. सामान्य हाथ । ४. लम्बा हाथ । ५. अत्यन्त लम्बा हाथ । मैंने पीछे ही यह बात स्पष्ट कर दी है कि हाथ की बनावट को देखने के लिए हाथ को उल्टा करके देखना चाहिए । इस प्रकार देखने से यह ज्ञात हो जाता है कि सामने वाले व्यक्ति का हाथ किस प्रकार का है। इस प्रकार के हाथ के भेद से भी व्यक्ति के बारे में बहुत कुछ जानने को मिल जाता है । १. अत्यन्त छोटा हाथ :—इस प्रकार के व्यक्ति अत्यन्त संकीर्ण विचारों वाले तथा सन्देह की प्रवृत्ति के होते हैं । ये अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए झगड़ते रहते हैं । जीवन में अपने ही स्वार्थ को सर्वोपरि महत्व देते हैं और सही रूप में कहा जाए तो धोखा, चालाकी और अवसरवादिता इनके रक्त में मिली हुई होती है । दूसरे की बुराई करना, दूसरे को नीचा दिखाने की भावना तथा दूसरों के प्रति शत्रुवत् व्यवहार करना इनके लिए सहज स्वाभाविक है । समाज की दृष्टि से अथवा देश की दृष्टि से इन व्यक्तियों का कोई बहुत बड़ा मूल्य अथवा योगदान नहीं होता ।
( १८ ) २. छोटा हाथ :—एक प्रकार से ऐसे व्यक्तियों को आलसी कहा जाता है । यद्यपि ये व्यक्ति बढ़-चढ़ कर कल्पनाएं करते हैं और अपनी कल्पना के बल पर सब कुछ करने के लिए तैयार हो जाते हैं परन्तु इनके जीवन में आलस्य जरूरत से ज्यादा होता है, जिसकी वजह से ये अपनी किसी भी योजना को सही रूप से कार्यान्वित नहीं कर सकते । इनको बढ़-चढ़कर बातें करना, डींगें हांकना, अपने चारों ओर आडम्बरपूर्ण वातावरण बनाये रखना इनको प्रिय लगता है, और ये कार्य भी इस प्रकार से करते हैं जिससे चारों ओर इनके भ्रम की सृष्टि अथवा सन्देह का वातावरण बना रह सके । यद्यपि यह बात सही है कि ये तीव्र मस्तिष्क वाले होते हैं परन्तु अवसर का सदुपयोग करना ये नहीं जानते । जब समय बीत जाता है तब ये पछताते रहते हैं । ऐसे व्यक्ति योग्य एवं समर्थ होते हुए भी अपने जीवन में पूर्ण सफल नहीं हो पाते । ३. सामान्य हाथ :—ऐसे व्यक्ति व्यावहारिक बुद्धि से सम्पन्न होते हैं । इनको इस बात का एहसास रहता है कि किससे कब क्या बात की जाए और किसके साथ किस प्रकार से व्यवहार किया जाए । ये सारी बातें इनके दिमाग में होती हैं इस लिए इनको व्यवहार-कुशल कहा जाता है । समाज में ये सम्मान प्राप्त करते हैं तथा किसी भी कार्य को प्रारंभ करने से पूर्व उसके बारे में काफी समय तक सोचते-विचारते रहते हैं । इनके जीवन में बराबर संघर्ष बना रहता है और संघर्ष के बल पर ही ये व्यक्ति अपने जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं तथा सुविधाओं को जुटा पाते हैं । सामान्यतः इनका स्वास्थ्य ठीक रहता है और सबसे बड़ी बात इनमें यह पाई जाती है कि ये परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढाल लेने की क्षमता रखते हैं । ४. लम्बा हाथ :—ऐसे व्यक्ति समाज के लिए सामान्यतः उपयोगी होते हैं । इनको जीवन में एक रस देखा जा सकता है । ये न तो बहुत अधिक प्रसन्न रहते हैं और न चिन्तायुक्त । जीवन में ये अत्यधिक व्यवहार-कुशल, होशियार तथा मेधावी होते हैं । इनके सामने किसी भी प्रकार की कोई भी बात हो, उस बात की तह तक ये बहुत जल्दी पहुंच जाते हैं और उस कार्य के बारे में अथवा उस कार्य के परिणाम के बारे में ये जो धारणा बनाते हैं, वह धारणा आगे चलकर पूर्णतः सही होती है । अपरिचित से अपरिचित व्यक्ति को देखकर उसके बारे में, उसके चरित्र के बारे में, उसकी कार्यकुशलता के बारे में ये व्यक्ति जो धारणा बनाते हैं, वह आगे चलकर पूर्णतः सही होती है । ऐसे व्यक्ति समाज के लिए ज्यादा उपयोगी कहे जा सकते हैं । ५. अत्यन्त लम्बा हाथ :—समाज की दृष्टि से इन व्यक्तियों का कोई विशेष उपयोग नहीं होता । ऐसे व्यक्ति जरूरत से ज्यादा भावुक तथा कल्पना की दुनिया में ही जीवित रहने वाले होते हैं । जब जीवन का संघर्ष इनके सामने उपस्थित होता है तो ये विचलित हो जाते हैं और उन परिस्थितियों को झेलने की तथा उन संघर्षों का
( १६ ) सामना करने की इनमें क्षमता नहीं रहती। परिस्थितियों को चुनौती देना इनके वश की बात नहीं है। हाथ के प्रकार जान लेने के साथ ही साथ कुछ और तथ्य भी जान लेने चाहिए। हाथ चौड़ा या तंग हो सकता है। नरम अथवा सख्त अनुभव हो सकता है। इसी प्रकार जब हम किसी का हाथ अपने हाथ में लेते हैं तो वह खुश्क अथवा नम अनुभव हो सकता है। ये सारे तथ्य एक हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिए समझ लेने आवश्यक होते हैं। हाथ देखते समय यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि उंगलियों के सिरे नुकीले हैं या वर्गाकार हैं अथवा चपटाकार हैं। एक पर्व और दूसरे पर्व के बीच में जो गांठें होती हैं, उनका भी अध्ययन किया जाना चाहिए। ये गांठें मोटी अथवा पतली हो सकती हैं। इसी प्रकार प्रत्येक उंगली की लम्बाई भी अपने आप में महत्व रखती है। यह बात अनुभव से सिद्ध हुई है कि जिस व्यक्ति की कनिष्ठिका अर्थात् सबसे छोटी उंगली का ऊपरी सिरा यदि अनामिका उंगली के तीसरे पर्व से आगे की ओर बढ़ा हुआ हो तो वह व्यक्ति विशेष बुद्धिमान, प्रतिभावान तथा ऊंचे पद पर पहुंचने वाला होता है। जिन व्यक्तियों के हाथों में सबसे छोटी उंगली को लंबा पाया जाता है, वे व्यक्ति वास्तव में ही अपने जीवन में सफल होते देखे गए हैं। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि हमको हाथ का अध्ययन करते समय उंगलियों की लम्बाई पर भी ध्यान रखना चाहिए। उंगलियों के नाम प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में चार उंगलियां तथा एक अंगूठा होता है। अंगूठे को अंगुष्ठ भी कहा जाता है तथा इसके दो भाग होते हैं :— १. तर्जनी :— यह उंगली अंगूठे के पास वाली होती है, इसको तर्जनी उंगली कहा जाता है। इसके तीन पर्व होते हैं। इस उंगली का अध्ययन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि इसका सिरा किस प्रकार का है तथा उसका झुकाव किस तरफ है। झुकाव तीन प्रकार के होते हैं। कुछ उंगलिया बिल्कुल सीधी होती हैं जबकि कुछ उंगलियां अंगूठे की तरफ झुकी हुई होती हैं। इसी प्रकार कुछ उंगलियां मध्यमा की तरफ झुकी हुई हो सकती हैं।
१. प्रथम खण्ड: कर-लक्षण, हस्त-स्वरूप, उंगली एवं अंगुष्ठ विज्ञान
( २० ) २. मध्यमा :—यह हाथ में सबसे बड़ी उंगली होती है, तथा इसको संस्कृत में मध्यमा उंगली कहा जाता है। इसके बारे में अध्ययन करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि इसके पवों के बीच जो गांठें हैं वे गांठें बहुत ज्यादा फूली हुई हैं अथवा मामूली हैं। ऐसे बहुत कम हाथ देखे जाते हैं जिनमें तर्जनी तथा मध्यमा उंगली बराबर हो। परन्तु जिस हाथ में भी तर्जनी तथा मध्यमा उंगली बराबर हों वह व्यक्ति आत्म-हत्या करता है या उसकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से नहीं होती। ३. अनामिका :—मध्यमा के पास वाली उंगली को अनामिका उंगली कहते हैं। सामान्यतः यह उंगली मध्यमा उंगली से छोटी होती है तथा लगभग तर्जनी उंगली के बराबर लम्बी होती है इस उंगली के झुकाव का विशेष अध्ययन करना चाहिए। यदि उस अंगुली का झुकाव मध्यमा की तरफ हो तो वह ज्यादा अच्छी तथा श्रेष्ठ कही जाती है। विपरीत दिशा में झुकाव होने से ऐसा प्रतीत होता है कि उस व्यक्ति का गृहस्थ जीवन ज्यादा सुखमय नहीं रह सकेगा। ४. कनिष्ठिका :—यह हाथ की सबसे छोटी उंगली होती है तथा सामान्यतः इसका अंतिम सिरा अनामिका के ऊपरी सिरे तक अर्थात् ऊपरी जोड़ तक पहुंचता है
( २१ ) परन्तु जिस व्यक्ति के हाथ में यह उंगली जरूरत से ज्यादा लम्बी होती है, वह व्यक्ति निश्चय ही सौभाग्यशाली होता है और अपने प्रयत्नों से वह उच्चस्तरीय सम्मान प्राप्त करता है। [चित्र विवरण: कनिष्ठा, बुधकी ऊँगली, ७६५] हाथ की बनावट हड्डियों के पतले तथा भारी होने से हाथों के प्रकार में अन्तर आ जाता है। इस प्रकार से हम हाथों को सात वर्गों में बांट सकते हैं जो कि निम्नलिखित हैं : १. प्रारम्भिक प्रकार २. वर्गाकार हाथ ३. कर्मठ हाथ ४. दार्शनिक हाथ ५. कलात्मक हाथ ६. आदर्श हाथ ७. मिश्रित हाथ आगे की पंक्तियों में इन हाथों की विशेषताओं को मैं स्पष्ट कर रहा हूं :— १. प्रारम्भिक प्रकार :—सामान्यतः ऐसा हाथ खुरदरा, भारी तथा मोटा-सा होता है। इस हाथ की बनावट बेडौल तथा असुन्दर होती है एवं इसकी उंगलियां असमान-सी अनुभव होती हैं। सही रूप में देखा जाए तो ऐसे व्यक्ति पूर्ण सभ्य नहीं कहे जा सकते। नकल करने की प्रवृत्ति इनमें विशेष रूप से होती है। ये सभ्य हो सकते हैं परन्तु संस्कृति के जो गुण होने चाहिए वे इन व्यक्तियों में नहीं पाये जा सकते ।
( २२ ) एक प्रकार से ये व्यक्ति पूर्णतः भौतिकवादी होते हैं। इनके जीवन का परम उद्देश्य भोजन, वस्त्र और आवास ही होता है। इसके आगे जीवन के मूल्यों को न तो ये समझते हैं और न समझने का प्रयत्न ही करते हैं। एक प्रकार से आदर्श एवं जीवन मूल्यों की दृष्टि से ये सर्वथा कोरे होते हैं। यद्यपि यह बात सही है कि ये व्यक्ति परिश्रमी होते हैं और जो कुछ भी जीवन में उपार्जित करते हैं वह सब परिश्रम के बल पर ही संभव है। छोटी-छोटी बातों पर क्रोधित हो जाना या उफन जाना इनका स्वभाव होता है। कानून तोड़ना इनके लिए बायें हाथ का खेल होता है। सामाजिक एवं नैतिक दृष्टि से ये व्यक्ति अपराधी वर्ग के अन्तर्गत आते हैं। २. वर्गाकार हाथ :— यदि हाथ को उल्टा करके देखें तो ऐसा हाथ तुरन्त पहचानने में आ जाता है। इस प्रकार के हाथों में ग्रन्थियां विशेष रूप से होती हैं तथा
५x 'वर्गाकार' हाथ
( २३ ) अस्थि प्रधान बेडौल हाथ ही इस वर्ग में आता है परन्तु प्रारम्भिक प्रकार के हाथ और इस हाथ में यह अन्तर होता है कि इस प्रकार के हाथ की उंगलियों में एक विशेष प्रकार की लचक होती है, जिससे इस हाथ को आसानी से पहचाना जा सकता है। ऐसे हाथ प्रारम्भिक प्रकार के हाथों की अपेक्षा पतले और कम खुरदरे होते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रतिभा सम्पन्न एवं बुद्धिजीवी होते हैं। समाज को इनका योगदान बराबर रहता है। ऐसे व्यक्ति ही समाज का नेतृत्व करने में सक्षम होते हैं तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ विशेष धरोहर देकर जाते हैं। ऐसे हाथ वाले व्यक्ति दार्शनिक, कलाकार, चित्रकार, साहित्यकार, मनोवैज्ञानिक आदि होते हैं। यद्यपि यह बात सही है कि इस प्रकार के व्यक्तियों के पास धन का अभाव होता है परन्तु ये अपने जीवन में धन को इतना अधिक महत्व नहीं देते जितना कि अपनी प्रतिष्ठा को, सम्मान को और कीर्ति को देते हैं। ३. कर्मठ हाथ : यह हाथ चौड़ाई की अपेक्षा लम्बाई लिए हुए होता है। हाथ का प्रारम्भ कुछ थुलथुला-सा तथा आगे का भाग उसकी अपेक्षा कुछ हल्का होता है। हथेली पर पाये जाने वाले पर्वत मांसल और कठोर होते हैं तथा अधिकतर पर्वत दबे हुए एवं भारी होते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में बराबर सक्रिय बने रहते हैं और कोई न कोई काम करते ही रहते हैं। खाली बैठना इनको अपने जीवन में अच्छा नहीं लगता। अत्यन्त साधारण श्रेणी में जन्म लेकर भी ये अपने परिश्रम से अपनी स्थिति को अनुकूल बना लेते हैं और जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त कर लेते हैं। इनके कार्यों में विचार, भावना एवं पुरुषार्थ का प्रबल सामंजस्य रहता है। 'कर्मठ' हाथ ऐसे व्यक्ति भावनाओं द्वारा अपने कार्य का संचालन नहीं करते अपितु इनके जीवन में भावना तथा व्यावहारिकता का पूर्ण समन्वय होता है। जीवन में नये-नये कार्यों की तरफ अग्रसर होना, नई से नई वस्तु की खोज करना तथा कुछ न कुछ नया करते रहना इनका स्वभाव होता है। सफल व्यक्तित्व इस प्रकार से इनकी विशेषता कही जा सकती है। ४. दार्शनिक हाथ : ऐसा हाथ फूला हुआ, गठीले जोड़ों से युक्त तथा सामा- न्तया गुदगुदा-सा होता है। यह हाथ न तो विशेष कठोर होता है और न विशेष कोमल। हाथ में लेते ही यह ऐसा प्रतीत होता है कि मानो इस हाथ में एक विशेष प्रकार की लचक और लय हो। ये अपेक्षाकृत पतले, कोमल और मृदुल हाथ होते हैं।