भारतकोश
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बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

२. द्वितीय खण्ड: प्रधान रेखाएं (जीवन, शीर्ष, हृदय, भाग्य व सूर्य रेखा)

( ८५ ) कई रेखाएं : बार-बार विदेश यात्राएं । आपस में : वायुयान दुर्घटना में मृत्यु । कटती हुई रेखाएं बिन्दु : उच्चस्तरीय प्रसिद्धि । क्रॉस : विदेश में रहने को बाध्य होना । नक्षत्र : विदेशों में ख्याति । वर्ग : वैज्ञानिक कार्यों में रुचि । वृत्त : विशेष धन प्राप्ति । त्रिकोण : इंजीनियरिंग कार्यों में रुचि । जाली : आकस्मिक दुर्घटना से मृत्यु । सूर्य का चिह्न : विश्व प्रसिद्ध सम्मान । चन्द्र का चिह्न : जीवन में विशेष सफलता । मंगल का चिह्न : सेना में उच्च पद प्राप्ति । बुध का चिह्न : आयात-निर्यात का व्यापार करने वाला । गुरु का चिन्ह : धार्मिक काव्य की रचना करने वाला । शुक्र का चिन्ह : उच्च कोटि का प्रेम । शनि का चिन्ह : सफल राजनीतिज्ञ । १०. नेपच्यून : एक रेखा : समाज में सफलता ! कई रेखाएं : सामाजिक कार्यों के करने से सम्मान प्राप्ति । आपस में कटती हुई रेखाएं : हर कार्य में निराशा । बिन्दु : न्यायप्रियता । क्रॉस : हत्या करने की भावना का विकास । नक्षत्र : जल यात्रा । वर्ग : राष्ट्रस्तरीय सम्मान । वृत्त : मानसिक कमजोरी । त्रिकोण : विदेश में विवाह । जाली : जल से मृत्यु ।

( ८६ ) सूर्य का चिन्ह : विशेष सफलता । चन्द्र का चिन्ह : तटवर्ती स्थानों पर व्यापार से लाभ । मंगल का चिन्ह : युद्ध शस्त्र, के व्यापार से सफलता । बुध का चिन्ह : अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारी । गुरु का चिन्ह : सफल सामाजिक भावना का विकास । शुक्र का चिन्ह : सो से अधिक स्त्रियों से रमण । शनि का चिन्ह : नपुंसकता । ११. प्लूटो : एक रेखा : जीवन में पूर्ण उन्नति । कई रेखाएं : समाज में विशेष सम्मान । आपस में कटती हुई रेखाएं : सन्यास भावना का विकास । बिन्दु : हर कार्य में असफलता । क्रॉस : आत्महत्या नक्षत्र : धार्मिक कार्यों में रुचि । वर्ग : मूर्खता । वृत्त : शुभ कार्यों में रुचि । त्रिकोण : कई कलाओं में सफलता । जाली : असफल जीवन । सूर्य का चिन्ह : विशेष सम्मान । चन्द्र का चिन्ह : जल में डूबने से मृत्यु । मंगल का चिन्ह : धर्मान्धता । बुध का चिन्ह : व्यापारिक कार्यों में विशेष सफलता । गुरु का चिन्ह : समाज में सम्मानीय स्थान प्राप्त होना । शुक्र का चिन्ह : सात्विक प्रेम । शनि का चिन्ह : तंत्र विद्याओं में रुचि । संक्षेप में आगे की पंक्तियों में ऋणात्मक और घनात्मक पर्वत का विवेचन कर रहा हूं । जिन तारीखो में जन्म होता है उन तारीखों के अनुसार उसके पर्वत का फल उसके जीवन में रहता है । घनात्मक पर्वत होने पर उस पर्वत की विशेषताएं तथा ऋणात्मक पर्वत होने पर उस पर्वत से सम्बन्धित ग्रह की न्यूनताएं मिलती हैं ।

( ८७ ) जन्म तारीख                 ग्रह (धनात्मक) २० अप्रैल से २० मई            शुक्र २१ मार्च से २१ अप्रैल           मंगल २१ नवम्बर से ३० दिसम्बर         गुरु २१ दिसम्बर से २० जनवरी         शनि २१ जुलाई से २० अगस्त          सूर्य २१ मई से २० जून            बुध २१ जुलाई से २० अगस्त          चन्द्र इसके साथ ही मैं ऋणात्मक पर्वत विकास को भी स्पष्ट कर रहा हूं। इस समय में जन्म लेने वाले व्यक्तियों को सम्बन्धित ग्रह पर्वत फल न्यूनतम मिलता है। ऋणात्मक पर्वत : निम्न तारीखों में जन्म लेने वाले सम्बन्धित ग्रह का ऋणा- त्मक विकास रखते हैं। जन्म तारीख                 ग्रह (ऋणात्मक) २१ सितम्बर से २० अक्टूबर         शुक्र २१ अक्टूबर से २० नवम्बर         मंगल १६ फरवरी से २० मार्च           गुरु २१ जनवरी से १८ फरवरी         शनि २१ मार्च से २० अप्रैल           सूर्य २१ अगस्त से २० सितम्बर         बुध २१ जुलाई से २० अगस्त          चन्द्र वस्तुतः हथेली का अध्ययन करना अपने आप में अत्यन्त कठिन है परन्तु यदि धैर्य परिश्रम तथा लगन से हस्तरेखा ज्ञान का अध्ययन करे तो वह निश्चय ही अपने जीवन में पूर्ण एवं श्रेष्ठ सफलता प्राप्त कर सकता है ।

रेखाएं जीवन शक्ति का स्फूर्तिमय वेग हथेली के माध्यम से ही सम्पन्न होता है । और यह वेग हथेली के माध्यम से रेखाओं और पर्वतों को एक ही सूत्र में ग्रंथित करता है। जैसा कि मैं पीछे कह चुका हूं कि हथेली पर अंकित कोई भी रेखा व्यर्थ नहीं होती क्योंकि हथेली पर छोटी या बड़ी, स्थूल या सूक्ष्म जो भी रेखा होती है वह इस जीवन शक्ति के वेग को प्रवाहित करने में सहायक होती है इसलिये हस्तरेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह हथेली पर पाई जाने वाली प्रत्येक रेखा का सूक्ष्म अध्ययन करे । हथेली पर जो रेखाएं स्पष्ट गहरी एवं लंबी होती हैं वे सफलता की सूचक होती हैं इसके विपरीत टूटी हुई विरल और अस्पष्ट रेखाएं जीवनशक्ति में बाधक समझनी चाहिए। अतः स्पष्ट रेखाओं का प्रभाव ही मानव जीवन पर सही रूप में अंकित होता है। हस्तरेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह सामने वाले व्यक्ति के दोनों हाथों का सूक्ष्मतापूर्वक अध्ययन करे। साथ ही वह छोटी से छोटी रेखा का भी अवलोकन करे, क्योंकि हाथ में पाई जाने वाली प्रत्येक रेखा का अपना महत्त्व होता है और वह रेखा किसी न किसी घटना को स्पष्ट करती ही है। रेखाओं द्वारा घटनाओं का समय भी ज्ञात किया जा सकता है। जितना ही ज्यादा व्यक्ति का अभ्यास होगा उतना ही ज्यादा वह उस समय को सही रूप में अंकित कर सकता है। हाथ का अध्ययन करने से पूर्व रेखाओं का सही सही परिचय ज्ञात कर लेना आवश्यक है । प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में सात मुख्य रेखाएं होती हैं तथा बारह गौण रेखाएं या सहायक रेखाएं अथवा प्रवाहित रेखाएं होती हैं। सात मुख्य रेखाएं निम्न- लिखित हैं — मुख्य रेखाएं : १. जीवन रेखा । २. मस्तिष्क रेखा । ३. हृदय रेखा । ४. सूर्य रेखा । ५. भाग्य रेखा ।

(१८६) ६. स्वास्थ्य रेखा। ७. विवाह रेखा । इनके अतिरिक्त बारह गौण रेखाएं होती है। यद्यपि ये गौण रेखाएं कहलाती हैं परन्तु हथेली में इनका महत्त्व स्वतंत्र होता है और वह जीवन में बहुत अधिक महत्त्व रखने वाली होती हैं। गौण रेखाएं : १. गुरु वलय २. मंगल रेखा ३. शनि वलय ४. रवि वलय ५. शुक्र वलय ६. चन्द्र रेखा ७. प्रतिभा प्रभावक रेखा ८. यात्रा रेखा ९. सन्तति रेखा १०. मणिबन्ध रेखाएं ११. आकस्मिक रेखाएं १२. उच्च पद रेखाएं इन रेखाओं का अध्ययन सावधानी के साथ करना चाहिए। परन्तु रेखाओं का अध्ययन करने से पूर्व रेखा के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर लेनी उचित रहेगी। मुख्यतः चार प्रकार की रेखाएं होती हैं : १. मोटी रेखा : ये वे रेखाएं होती हैं जो अपने आप में गहरी, स्पष्ट और सामान्यतः चौड़ाई लिये हुए होती हैं। ऐसी रेखाएं धुंधल में भी स्पष्ट देखी जा सकती हैं। २. पतली रेखाएं: ये रेखाएं प्रारम्भ से लेकर अन्त तक पतली परन्तु स्पष्ट होती हैं। ऐसी रेखाएं ज्यादा प्रभावपूर्ण कही जाती हैं। ३. गहरी रेखा : ये रेखाएं सामान्यतः पतली तो होती हैं परन्तु साथ ही साथ गहरी भी होती हैं, और ऐसा प्रतीत होता है जैसे हथेली के मांस में धंसी हुई सी हों। ४. ढलवा रेखा :- ये रेखाएं प्रारम्भ में तो मोटी होती हैं परन्तु ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती है त्यों-त्यों अपेक्षाकृत पतली होती जाती हैं।

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इन रेखाओं की जानकारी के साथ-ही-साथ निम्न प्रकार की जानकारी भी पाठकों के लिए आवश्यक कही जाती है । १. रेखाएं स्पष्ट सुन्दर लालिमा लिये हुए तथा साफ-सुथरी होनी चाहिए । इनके मार्ग में न तो किसी प्रकार का चिह्न होना चाहिए, और न किसी प्रकार का द्वीप होना चाहिए । साथ ही ये रेखाएं टूटी हुई भी नहीं होनी चाहिए । २. यदि हथेली में रेखाएं किंचित् पीलापन लिये हुए हों तो ऐसी रेखाएं स्वास्थ्य में कमी और रक्त दूषितता को स्पष्ट करती है । ऐसी रेखाएं निराशावादी भावना को भी बताती हैं । ३. रक्तिम रेखाएं व्यक्ति की प्रसन्नता और स्वस्थ मनोवृत्ति को स्पष्ट करती है । इससे ऐसा ज्ञात होता है कि व्यक्ति प्रसन्नचित्त स्वस्थ और स्पष्ट वक्ता है । ४. हथेली पर काली रेखाएं पाया जाना निराशा तथा कमजोरी को सूचित करती हैं । ५. मुर्झाई हुई या कमजोर रेखाएं : भविष्य में आने वाली बाधाओ की सूचक कही जाती हैं । ६. यदि किसी रेखा के साथ-साथ कोई और रेखा आगे बढ़ती हो तो उस रेखा को विशेष बल मिलता है और उस रेखा का प्रभाव विशेष समझना चाहिए । ७. यदि किसी टूटी हुई रेखा के साथ साथ सहायक रेखा चलती हुई दिखाई दे तो उस भग्न रेखा का विपरीत फल न्यूनतम होता है । ८. जीवन रेखा के अलावा यदि कोई रेखा अपने अन्तिम सिरे पर जाकर दो भागों में विभक्त हो जाती है तो ऐसी रेखा अत्यन्त श्रेष्ठ एवं प्रभावपूर्ण मानी जाती है परन्तु यदि हृदय रेखा अन्त में जाकर दो भागों में विभक्त होती है तो ऐसे व्यक्ति की मृत्यु कम आयु में ही हार्ट एटेक से हो जाती है । ६. यदि कोई रेखा अपने अन्तिम सिरे पर जाकर कई भागों में बंट जाय तो उस रेखा का फल विपरीत समझना चाहिए । १०. यदि किसी रेखा में से कोई नई रेखा निकल कर ऊपर की ओर बढ़ती हो तो उस रेखा के फल में वृद्धि होती है । ११. यदि किसी रेखा में से कोई रेखा निकल कर नीचे की ओर झुक रही हो या नीचे के माग की ओर गतिशील हो तो उसका विपरीत फल मिलता है । १२. भोग रेखा या प्रणय रेखा में से कोई रेखा निकल कर ऊपर की ओर बढ़ रही हो तो सुन्दर पति मिलने का योग बनता है इसके विपरीत यदि उसमें से कोई रेखा निकलकर नीचे की ओर बढ़ रही हो तो उस व्यक्ति की पत्नी की मृत्यु शीघ्र ही हो जाती है ।

( ११ ) १३. यदि मस्तिष्क रेखा में से कोई रेखा ऊपर की ओर बढ़ रही हो तो वह व्यक्ति विशेष यश प्राप्त करता है। १४. जंजीरदार रेखा अशुभ मानी गई है। १५. यदि विवाह रेखा जंजीरदार हो तो उसको प्रेम में असफलता मिलती है। १६. यदि मस्तिष्क रेखा जंजीरदार दिखाई दे तो वह व्यक्ति पागल बन जाता है। १७. हथेली में लहरियादार रेखा शुभ फल देने वाली नहीं होती। १८. टूटी हुई रेखाएं अशुभ फल ही देती है। १९. यदि कोई रेखा बहुत अधिक सूक्ष्म और कमजोर हो तो उसका प्रभाव नहीं के बराबर होता है। २०. यदि किसी रेखा के मार्ग में वह द्वीप या कोई चिन्ह हो तो उसे शुभ नहीं समझना चाहिए। २१. यदि रेखा के मार्ग में वर्ग हो तो इससे उस रेखा को बल मिलता है तथा उस रेखा का शुभ फल प्राप्त होता है। २२. यदि रेखा पर कोई बिन्दु हो तो इससे उस रेखा से संबंधित कार्य की हानी होती है। २३. यदि किसी रेखा पर त्रिकोण का चिह्न दिखाई दे तो उस रेखा से संबंधित कार्य शीघ्र ही होना समझना चाहिए। २४. रेखाओं पर तिरछी रेखाएं हानिकारक मानी गई हैं। २५. यदि रेखाओं पर नक्षत्र दिखाई दे तो इससे कार्य सफलता शीघ्र प्राप्त होती है। २६. मोटी रेखाएं व्यक्ति की दुर्बलता को स्पष्ट करती है। २७. पतली रेखाएं व्यक्ति के जीवन में श्रेष्ठ फल देने में समर्थ मानी गई हैं। २८. ढ़लवा रेखाएं व्यक्ति के परिश्रम को तो स्पष्ट करती हैं परन्तु उससे श्रेष्ठ फल मिलने का योग नहीं बनता। २९. यदि कोई गहरी रेखा चलते-चलते बीच में ही रुक जाय या कमजोर पड़ जाय तो ऐसी रेखा दुर्घटना की परिचायक होती है। ३०. रेखा यदि कहीं पर पतली और कहीं पर मोटी हो तो वह शुभ नहीं है और ऐसा व्यक्ति जीवन में कई बार धोखा खायेगा ऐसा समझना चाहिए। ३१. रेखाओं के बारे में सावधानी के साथ विचार करना चाहिए और यदि कोई चिह्न दोनों ही हाथों में दिखाई दे तभी उससे संबंधित भविष्य कथन करना चाहिए।

( ६२ ) रेखाओं के उद्गम स्थान : पीछे की पंक्तियों में मैंने रेखाओं के बारे में साधारण जानकारी दी है परन्तु हमें यह भी ज्ञात करना चाहिए कि इन रेखाओं का वास्तविक उद्गम स्थान कौन-सा होता है। १. जीवन रेखा :—इसे अंग्रेजी में 'लाइफ लाइन' कहते हैं हिन्दी में कुछ विद्वान इसे पितृ रेखा या आयु रेखा के नाम से भी सम्बोधित करते हैं पूरी हथेली में इस रेखा का महत्त्व सबसे अधिक है, क्योंकि यदि जीवन है तो सब कुछ है जिस दिन जीवन ही समाप्त हो जायगा उस दिन बाकी रेखाओं का प्रभाव भी व्यर्थ हो जायगा। जीवन रेखा जीवन रेखा जीवन रेखा बृहस्पति पर्वत के नीचे हथेली की बगल से उठ कर तर्जनी और अंगूठे के बीच में से प्रारंभ होकर शुक्र पर्वत को घेरती हुई मणिबन्ध पर जाकर विश्राम करती है संसार में जितने भी प्राणी हैं उन सब के हाथों में यह रेखा यहीं पर दिखाई देती हैं इसी रेखा से व्यक्ति की आयु, स्वास्थ्य, बीमारी, स्वस्थता आदि की जानकारी अथवा ज्ञान प्राप्त होता है। सभी व्यक्तियों के हाथों में यह रेखा एक-सी दिखाई नहीं देती कुछ लोगों के हाथों में यह रेखा गहरी और लम्बी होती है तो कुछ रेखाएं व्यक्ति के शुक्र पर्वत को बहुत संकीर्ण बना लेती हैं किसी-किसी व्यक्ति के हाथ में यह रेखा शुक्र पर्वत के पास में जाकर टूट-सी जाती है ऐसे व्यक्ति निश्चय ही कम आयु के होते हैं तथा उनकी मृत्यु दुर्घटना से होती है। इस रेखा से व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन के बारे में साधारणतः जाना जा सकता है।

( १३ ) २. मस्तिष्क रेखा:—अंग्रेजी में इस रेखा को 'हैड-लाइन' हिन्दी में इसको बुद्धि रेखा शीश रेखा, प्रज्ञा रेखा अथवा मातृ रेखा, के नाम से पुकारते हैं।

[चित्र १ (बायाँ):] मस्तिष्क रेखा

[चित्र २ (दायाँ):] मस्तिष्क रेखा

[चित्र ३ (हस्त-रेखा चित्र):] विवाह रेखा सूर्य रेखा भाग्य रेखा हृदय रेखा मस्तिष्क रेखा स्वास्थ्य रेखा जीवन रेखा मंगल रेखा मणिबन्ध रेखाएँ ६२

( १४ ) [•••••] का प्रारंभ वृहस्पति पर्वत के पास से या वृहस्पति पर्वत के ऊपर से होता है। अधिकांश हाथों में मैंने जीवन रेखा और मस्तिष्क रेखा का उद्गम एक ही स्थान पर देखा है। परन्तु कई हाथों में यह उद्गम एक ही न होकर पास-पास होता देखा गया है। यह रेखा हथेली को दो भागों में बांटती हुई राहू और हर्षल क्षेत्रों को अलग-अलग करती हुई बुध क्षेत्र के नीचे तक चली जाती है, इस पूरी रेखा को मस्तिष्क रेखा कहते हैं। इस रेखा की स्थिति अलग-अलग हाथों में अलग-अलग प्रकार से देखी जाती है। जिन व्यक्तियों का मस्तिष्क पैना, उर्वर, तथा क्रियाशील होता है या जो व्यक्ति मुख्यतः बुद्धिजीवी होते हैं उन व्यक्तियों के हाथों में यह रेखा लम्बी गहरी और स्पष्ट होती है। इसके विपरीत जो शारीरिक श्रम करने वाले होते हैं या जिनका मस्तिष्क कमजोर होता है अथवा जो श्रमजीवी होते हैं उनके हाथों में या तो यह रेखा धूमिल और अस्पष्ट-सी होती है अथवा यह रेखा बीच-बीच में कई स्थान पर टूटी हुई-सी दिखाई देती है। इस रेखा से मानव के मस्तिष्क का भलीभांति अध्ययन किया जा सकता है। ३. हृदय रेखा :—इस रेखा को अंग्रेजी में 'हार्ट लाइन' और भारत में इस रेखा को विचार रेखा कहते हैं। यह रेखा बुध पर्वत के नीचे से प्रारंभ होकर बुध तथा प्रजापति के क्षेत्रों को अलग-अलग करती हुई तर्जनी के नीचे या गुरु पर्वत के नीचे तक पहुंच जाती है। सामान्यतः यह रेखा सभी व्यक्तियों के हाथों में दिखाई देती है क्योंकि इस रेखा का सीधा सम्बन्ध हृदय से होता है, परन्तु मैंने कुछ डाकुओं एव हृदयहीन व्यक्तियों के हाथों में इस रेखा का सर्वथा अभाव ही देखा है। जिन व्यक्तियों के हाथों में यह रेखा कमजोर होती है वस्तुतः वे व्यक्ति अमानवीय एवं क्रूर होते हैं।

हृदय रेखा             हृदय रेखा

( ९५ ) अलग-अलग हाथों में यह रेखा अलग-अलग लम्बाई लिये हुई होती है। किसी हाथ में यह रेखा तर्जनी तक किसी हाथ में मध्यमा तक तो किसी हाथ में अनामिका तक ही जाकर समाप्त हो जाती है परन्तु मैंने कुछ हाथों में यह रेखा गुरु क्षेत्र को पार कर हथेली के दूसरे छोर तक पहुंचती हुई भी देखी है, परन्तु ऐसी लम्बी रेखा बहुत कम लोगों के हाथों में ही होती है । ४. सूर्य रेखा :—अंग्रेजी में इसे 'अपोलो लाइन' या 'सन लाइन' अथवा 'लाइन आफ सक्सेस' भी कहते हैं। हिन्दी में इस रेखा को सूर्य रेखा, रवि रेखा अथवा प्रतिभा रेखा कहते हैं। इस रेखा का उद्गम विभिन्न व्यक्तियों के हाथों में विभिन्न स्थानों से देखा गया है, परन्तु एक बात सभी व्यक्तियों के हाथों में समान होती है वह यह कि इस रेखा की समाप्ति सूर्य पर्वत पर जाकर होती है। मैंने लगभग इस रेखा का प्रारम्भ तीस स्थानों से देखा है। अतः रवि रेखा या सूर्य रेखा उसी रेखा को माननी चाहिए जिसकी समाप्ति सूर्य पर्वत पर होती हो । सूर्य रेखा ५. भाग्य रेखा :—इसे अंग्रेजी में 'फेट लाइन' कहते हैं। हिन्दी में इसे भाग्य रेखा ऊर्ध्व रेखा अथवा प्रारब्ध रेखा भी कहते हैं । भाग्य रेखा भाग्य रेखा यह रेखा सभी व्यक्तियों के हाथों में दिखाई नहीं देती। साथ ही इस रेखा के उद्गम भी कई होते हैं परन्तु एक बात भली प्रकार से समझ लेनी चाहिए कि जिस रेखा की समाप्ति शनि पर्वत पर होती है वही रेखा भाग्य रेखा कहला सकती है।

(२६) जब तक यह शनि पर्वत पर नहीं पहुंच जाती तब तक इस रेखा को भाग्य रेखा कहना उचित नहीं । कई हाथों में यह रेखा बुध पर्वत पर भी पहुंच जाती है परन्तु वास्तव में यह रेखा भाग्य रेखा न होकर कोई अन्य रेखा ही होती है। इस रेखा का विकास हथेली में नीचे से ऊपर की ओर होता है। कुछ हाथों में यह रेखा शुक्र पर्वत से प्रारंभ होती है तो कुछ हाथों में यह रेखा मणिबन्ध से प्रारंभ होकर ऊपर की ओर उठती हुई दिखाई देती है। कुछ हाथों में यह रेखा सूर्य पर्वत के पास से भी निकल कर शनि पर्वत पर पहुंच जाती है। अतः जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि इस रेखा का उद्गम अलग-अलग होता है अतः इसकी समाप्ति के स्थान से इसके उद्गम का पता लगाना चाहिए। संसार में आधे से अधिक लोगों के हाथों में यह रेखा नहीं पाई जाती । ६. स्वास्थ्य रेखा :-अंग्रेजी में इस रेखा को 'हेल्थ लाइन' कहते हैं । इस रेखा का सम्बन्ध स्वास्थ्य से होता है परन्तु इस रेखा के उद्गम का कोई निश्चित स्थान नहीं है। यह हथेली में मंगल पर्वत से, जीवन रेखा से, हथेली के बीच में से, या कहीं से भी प्रारम्भ हो सकती है, परन्तु यहां यह बात स्मरण रखनी चाहिए कि इस रेखा की समाप्ति बुध पर्वत पर ही होती है, और जो रेखा बुध पर्वत तक पहुंचती है वास्तव में वही रेखा स्वास्थ्य रेखा कहला सकती है। कुछ हाथों में यह रेखा बहुत स्वास्थ्य रेखा स्वास्थ्य रेखा मोटी होती है, तो कुछ हाथों में यह रेखा बाल से भी पतली देखी जा सकती है। इस रेखा का अध्ययन अत्यन्त सावधानी के साथ किया जाना चाहिए । इसके माध्यम से स्वास्थ्य, तन्दुरुस्ती, बीमारी आदि का अध्ययन होता है। ७. विवाह रेखा :-इसे अंग्रेजी में 'लव लाइन' या 'मैरिज लाइन' कहते हैं। यह बुध पर्वत पर होती है। हथेली के बाहरी भाग से बुध पर्वत की ओर अन्दर की

( ५७ ) तरफ आती हुई जो रेखा होती है वही विवाह रेखा कहलाती है। कुछ लोगों के हाथों में ऐसी तीन चार रेखाएं होती हैं, परन्तु इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उस विवाह रेखा विवाह रेखा व्यक्ति का विवाह तीन चार स्त्रियों से होगा, परन्तु इसका अर्थ यह होता है कि उसका सम्बन्ध तीन चार प्राणियों से अवश्य ही रहेगा। इन तीन चार रेखाओं में से जो रेखा गहरी और स्पष्ट होती है वास्तव में वही रेखा विवाह रेखा कहलाती है। कई बार यह भी देखने में आया है कि व्यक्ति के हाथ में विवाह रेखा होते हुए भी वह आजीवन कुंआरा रहता है। इसका कारण यह है कि जब विवाह रेखा पर किसी प्रकार का कोई क्रॉस बना हुआ हो तो यह समझ लेना चाहिए कि इस व्यक्ति के सम्बन्ध बन कर समाप्त हो जायेंगे। जीवन में विवाह नहीं हो सकेगा। यदि विवाह रेखा के साथ में चलने वाली किसी रेखा पर छोटे-छोटे चिह्न हों तो उस व्यक्ति के जीवन में अनैतिक सम्बन्ध बने रहते हैं। ऊपर मैंने सात प्रमुख रेखाओं की विवेचना की है अब आगे मैं गौण रेखाओं के बारे में जानकारी प्रस्तुत कर रहा हूं। १. बृहस्पति वलय :—इसे अंग्रेजी में 'रिंग आफ जुपिटर' कहते हैं। हिन्दी में इसको गुरुमुद्रा या गुरु रेखा भी कहते हैं। यह तर्जनी उंगली से नीचे बृहस्पति पर्वत पर तर्जनी उंगली के नीचे अर्द्ध चन्द्राकार बनाती हुई उसके पूरे क्षेत्र को घेर लेती है जो कि अंगूठी के समान दिखाई देती है इसी को गुरुवलय या वृहस्पति मुद्रा कहते हैं। बृहस्पतिवलय

( ६८ ) २. मंगल रेखा :—इसे अंग्रेजी में 'लाइन आफ मार्स' कहते हैं। यह रेखा अंगूठे के पास जीवन रेखा के मूल उद्गम से निकल कर मंगल क्षेत्र पर होती हुई शुक्र पर्वत की ओर जाती है इसे मंगल रेखा कहते हैं परन्तु इसका उद्गम स्थान निश्चित नहीं होता । कुछ लोगों के हाथों में यह जीवन रेखा के बीच में से, तो कुछ हाथों में मंगल रेखा मंगल रेखा यह रेखा जीवन रेखा के बराबर चलती हुई भी दिखाई देती है। शुक्र क्षेत्र की ओर जब यह रेखा बढ़ती है तो वह जीवन रेखा से दूर हटती जाती है। हथेली में इस रेखा का महत्त्व बहुत अधिक माना गया है। ३. शनिवलय : इसे 'रिंग आफ सेटर्न' कहते हैं तथा हिन्दी में शनि मुद्रा या शनि रेखा या शनि वलय कहते हैं । यह रेखा मध्यमा उंगली के मूल में शनि पर्वत को घेरती हुई अपना एक छोर तर्जनी और मध्यमा के बीच में तो दूसरा छोर मध्यमा और अनामिका के बीच में रख देती है। इस प्रकार से यह शनि पर्वत को अंगूठी की तरह घेर लेती है। यह वलय हाथ में बहुत महत्व रखता है। शनिवलय

( ९६ ) रविवलय ४. रविवलय : इसे “रिंग आफ सन” कहते हैं तथा हिन्दी में इसको सूर्य मुद्रा या सूर्य वलय भी कहा जाता है। यह अनामिका उंगली के मूल में अंगूठी की तरह सूर्य पर्वत को घेर लेती है। इस रेखा का एक छोर मध्यमा अनामिका के बीच में होता है तथा दूसरा छोर अनामिका कनिष्ठिका के बीच में पाया जाता है जिस किसी हाथ में यह वलय देखा जाता है वह इसी रूप में होता है।

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( १०० ) ५. शुक्रवलय : इसे अंग्रेजी में "गर्डल आफ वीनस" कहते हैं तथा संस्कृत में इसको भृगु रेखा, शुक्र रेखा या शुक्र वलय कहा जाता है। यह वलय तर्जनी और मध्यमा के बीच में से प्रारम्भ होकर अनामिका और कनिष्ठिका के बीच में जाकर समाप्त होता है। इस प्रकार यह रेखा शनि और सूर्य दोनों पर्वतों को घेर लेता है। कई हाथों में यह वलय दोहरी रेखाओं से बनता है। यद्यपि इसका नाम शुक्र वलय होता है परन्तु इसका शुक्र पर्वत से किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं होता। यह वलय व्यक्ति के हाथों में बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण कहा जाता है। शुक्रवलय

६. चन्द्र रेखा : यह धनुष के आकार की रेखा होती है तथा यह चन्द्र क्षेत्र से प्रारम्भ होकर वरुण तथा प्रजापति क्षेत्रों के ऊपर से चलती हुई बुध पर्वत तक जाकर रुकती है, बहुत ही कम लोगों के हाथों में यह रेखा देखने को मिलती है। चन्द्र रेखा

७. प्रभावक रेखा : अंग्रेजी में इस रेखा को "लाइन ऑफ इन्फ्लुएन्स" कहते हैं। तथा यह जिस रेखा के साथ में भी होता है उस रेखा के प्रभाव को बढ़ा देती है। यह रेखा चन्द्र क्षेत्र तथा वरुण क्षेत्र के ऊपर से चलकर भाग्य रेखा तक पहुँचती है। कुछ लोगों के हाथों में यह रेखा दुहरी तथा कुछ लोगों के हाथों में यह तिहरी दिखाई पड़ती है। इसका प्रारम्भ शुक्र पर्वत से भी देखा जा सकता है परन्तु इस प्रकार का प्रारम्भ बहुत कम हाथों में अनुभव हुआ है। प्रभावक रेखा

( १०१ ) ८. यात्रा रेखा : अंग्रेजी भाषा में इसको 'ट्रेवलिंग लाइन' कहा जाता है । यह यात्रा वायुयान यात्रा, जल यात्रा या पैदल यात्रा किसी भी प्रकार की यात्रा को स्पष्ट करती है । परन्तु सूक्ष्मता से देखने पर ज्ञात होता है कि इस रेखा पर अलग-अलग प्रकार के चिह्न होते हैं जिनमें यात्राओं का भेद ज्ञात किया जा सकता है यह रेखा चन्द्र रेखा पर या शुक्र क्षेत्र से, मंगल क्षेत्र की ओर जाती हुई राहू क्षेत्र को पार कर चन्द्र पर्वत की ओर जाती हुई दिखाई देती है । ऐसी रेखाएं मोटी और पतली दोनों ही प्रकार की दिखाई देती हैं । यात्रा रेखा

९. सन्तति रेखा : इन रेखाओं को 'लाइन्स आफ चिल्ड्रन' भी कहते हैं। ये रेखाएं बुध पर्वत के पास में विवाह- रेखा पर खड़ी लकीरों के रूप में दिखाई देती है । वास्तव में ये रेखाएं बाल के समान पतली होती है जिनको नंगी आंखों से देखना सम्भव नहीं रहता । सन्तति रेखा

१०. मणिबन्ध रेखा : ये रेखाएं कलाई पर पाई जाती हैं परन्तु इनकी संख्या अलग-अलग हाथों में अलग-अलग होती है। किसी व्यक्ति के हाथ में एक मणिबन्ध रेखा किसी में दो तीन या चार मणिबन्ध रेखाएं भी देखने को मिल जाती है । मणिबन्ध रेखा

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आकस्मिक रेखाएं ११. आकस्मिक रेखाएं : ये रेखाएं समय-समय पर बनती रहती हैं तथा अच्छे और बुरे समय को प्रदर्शित करती रहती हैं। ये रेखाएं स्थायी नहीं होती वरन् इनका क्षणिक प्रभाव समाप्त हो जाता है तो ये रेखाएं मिट जाती हैं। ये रेखाएं हथेली पर कहीं पर भी बन सकती हैं और बनकर मिट सकती हैं।

१२. उच्च पद रेखा : यह रेखा मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर केतु क्षेत्र की ओर जाती दिखाई देती है। यदि यह रेखा गहरी और स्पष्ट हो तो व्यक्ति निश्चय ही उच्च पद प्राप्त करता है। उच्च पद रेखा

ऊपर मैंने प्रधान तथा गौण रेखाओं का स्थान तथा उनका संक्षिप्त परिचय दिया है। अब आगे के पृष्ठों में मैं इनसे सम्बन्धित कुछ और तथ्य स्पष्ट कर रहा हूं :

जीवन रेखा जीवन रेखा ही हथेली में एक ऐसी रेखा है जो प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में पाई जाती है। यदि किसी के हाथ में यह रेखा न देखने को मिले तो यह समझना चाहिए कि ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व शून्यवत् है और उस व्यक्ति का जीवन शक्ति का सर्वथा लोप हो गया है। ऐसे व्यक्ति का जीवन किसी भी समय समाप्त हो सकता है, कई बार मंगल रेखा चल कर इस रेखा को बल देती है, कभी-कभी शनि रेखा भी इस रेखा को बल देती हुई दिखाई दी है परन्तु फिर भी जो जीवन रेखा अपने आप में निर्दोष और स्पष्ट होती है वास्तव में वही रेखा मानव के लिये कल्याणकारी मानी जाती है। इसी रेखा से व्यक्ति की आयु का पता चलता है तथा इस रेखा के माध्यम से यह ज्ञात किया जा सकता है कि जीवन में कौन-कौन सी दुर्घटनाएं किस-किस समय घटिया होंगी तथा मृत्यु का कारण और मृत्यु का समय भी इसी रेखा से ज्ञात होता है। यह रेखा बृहस्पति पर्वत के नीचे से निकलती है पर कई बार यह रेखा बृहस्पति पर्वत के ऊपर से भी निकलती हुई दिखाई दी है। इस रेखा के बारे में यह ध्यान रखना अत्यन्त जरूरी है कि यह रेखा शुक्र पर्वत को जितने ही बड़े रूप में घेरती है उतनी ही यह रेखा ज्यादा श्रेष्ठ मानी जाती है। यद्यपि कई बार यह रेखा शुक्र पर्वत को अत्यन्त संकीर्ण बना देती है जब ऐसा तथ्य हथेली में दिखाई दे तब यह समझ लेना चाहिए कि इस व्यक्ति की प्रगति जीवन में कठिन ही होगी, साथ ही साथ इस व्यक्ति को जीवन में प्रेम भोग सुख आदि सांसारिक गुणों की न्यूनता ही रहेगी । अंगूठे के पास में से होकर यदि यह रेखा निकले तो उस व्यक्ति की आयु बहुत कम होती है। जीवन रेखा जितनी ही ज्यादा गहरी स्पष्ट और बिना टूटी हुई होती है उतनी ही वह ज्यादा अच्छी कहलाती है। ऐसे व्यक्ति का स्वास्थ्य उन्नत होगा, उसके हृदय में प्रेम और सौन्दर्य की भावना विकसित रहेगी परन्तु जिसके हाथ में यह रेखा कटी-फटी या टूटी हुई अथवा अस्पष्ट दिखाई दे तो उसका जीवन दुखमय भावनाशून्य एवं दुर्घटनाओं से युक्त रहता है। ऐसे व्यक्ति तुनक मिजाज चिड़चिड़े तथा बात-बात पर क्रोधित होने वाले होते हैं।

( १०४ ) यदि गुरु पर्वत के नीचे जीवन रेखा और मस्तिष्क रेखा का पूर्ण मिलन होता है तो यह शुभ माना जाता है। ऐसा व्यक्ति परिश्रमी सतर्क और योजनाबद्ध तरीके से काम करने वाला होता है। परन्तु यदि इन दोनों रेखाओं का उद्गम अलग-अलग होता है तो व्यक्ति उन्मुख विचारों वाला तथा अपनी ही धुन से कार्य करने वाला होता है। परन्तु यदि किसी के हाथ में जीवन रेखा, मस्तिष्क रेखा, और हृदय रेखा तीनों ही एक ही स्थान से निकले तो यह एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रतीक होता है ऐसे व्यक्ति की निःसंदेह हत्या हो जाती है। जीवन रेखा पर यदि आड़ी-तिरछी लकीरें दिखाई दें तो उस व्यक्ति का स्वास्थ्य कमजोर समझना चाहिए। यदि हृदय रेखा और जीवन रेखा के बीच में त्रिभुज बन जाय तो ऐसा व्यक्ति दमे का रोगी होता है। यदि जीवन रेखा से कोई पतली रेखा निकल कर गुरु पर्वत की ओर जाती दिखाई दे तो उस व्यक्ति में इच्छाएं, भावनाएं और महत्त्वाकांक्षाएं जरूरत से ज्यादा होती हैं और वह उन इच्छाओं को पूरी करने का भगीरथ प्रयत्न करता है। यदि इस रेखा पर कोई रेखाएं उठती हुई दिखाई दें तो वह व्यक्ति परिश्रमी और कर्मष्ठ होता है तथा अपने प्रयत्नों से भाग्य का निर्माण करता है। यदि जीवन रेखा के प्रारम्भ से ही उसके साथ-साथ सहायक रेखा चल रही हो तो ऐसा व्यक्ति सोच-समझ कर कार्य करने वाला विवेकपूर्ण योजनाएं बनाने वाला चतुर तथा महत्त्वाकांक्षी होता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में कुछ भी असम्भव नहीं होता। यदि जीवन रेखा चलती-चलती अचानक बीच में समाप्त हो जाती है तो यह आकस्मिक मृत्यु की ओर संकेत करती है। यदि जीवन रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर चन्द्र पर्वत की ओर जाती हुई दिखाई दे तो वह व्यक्ति वृद्धावस्था में पागल होता है, यदि इस रेखा में शनि रेखा आकर मिल जाए तो वह व्यक्ति प्रति- भावान और तेजस्वी होता है। जीवन रेखा के अंत में यदि किसी प्रकार का कोई बिंदु या क्रॉस दिखाई दे तो उस व्यक्ति की मृत्यु अचानक होती है। यदि जीवन रेखा अन्त में जाकर कई भागों में बंट जाए तो ऐसे व्यक्ति को बुढ़ापे में निश्चय ही क्षय रोग होगा। इससे सम्बन्धित कुछ अन्य तथ्य भी नीचे स्पष्ट किये जा रहे हैं :— १. छोटी रेखा—कम आयु। २. पीली और चौड़ी रेखा—बीमारी और विवादास्पद चरित्र। ३. लाल रेखा—हिंसा की भावना। ४. पतली रेखा—आकस्मिक मृत्यु।