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बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

४. चतुर्थ खण्ड: विशेष चिह्न, आयु-गणना, लक्षण-फल एवं उपसंहार

( २६० ) १९. यदि हाथ में बुध पर्वत पर जाली का चिन्ह हो तथा उसके प्रथम पर्व पर बिन्दु हो। २० यदि शनि पर्वत पर एक दूसरे को काटती हुई अस्त-व्यस्त रेखाएं हों। २१. यदि चन्द्र पर्वत पर शनि का चिन्ह हो । २२. यदि सूर्य पर्वत तथा बुध पर्वत का हाथ में अभाव हो । २३. यदि बुध पर्वत पर वृत्त का चिन्ह हो । २४. यदि ऊर्ध्व मंगल पर क्रॉस धब्बा या जाली हो । २५. यदि जीवन रेखा बीच में कटी हुई हो तथा उसके साथ ही साथ वह मोटी और लाल रंग की हो। २६. यदि मस्तिष्क रेखा जंजीरदार हो । २७. यदि जीवन रेखा के प्रारंभ में कई शाखाएं निकलती हों । २८. जीवन रेखा से एक रेखा फुन्दनेदार होकर चन्द्र पर्वत को जा रही हो । २९. यदि हृदय रेखा दो तीन जगहों से टूटी हुई हो । ३०. यदि वृहस्पति और शनि के बीच में चक्र का चिह्न हो । ३१. यदि मस्तिष्क रेखा पीली तथा कमजोर हो । ३२. यदि हृदय रेखा तथा जीवन रेखा के बीच क्रॉस का चिह्न हों । ३३. यदि मस्तिष्क रेखा कमजोर तंग-सी होकर हथेली के पार जा रही हो । ३४. यदि जीवन रेखा चन्द्र पर्वत की ओर झुक रही हो तथा तर्जनी पर तारे का चिह्न हो । ३५. यदि दोनों हाथों में मस्तिष्क रेखा जरूरत से ज्यादा कमजोर तथा टूटी हुई हो । ३६. यदि मस्तिष्क रेखा पर सफेद धब्बे हों । फल : हाथ मे चाहे कितने ही अच्छे योग हों परन्तु यदि उसके हाथ मे राज- भंग योग भी हो तो वह जातक दुखी, परेशान, चिन्तित, तथा दरिद्र जीवन व्यतीत करने वाला होता है ।

( २६१ ) राज राजेश्वर योग : परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य पर्वत विकसित हो तथा सूर्य रेखा हथेली के मध्य में आकर शुक्र पर्वत की ओर जाती हो तथा रेखा पर किसी प्रकार की बाधा न हो तो राज राजे- श्वर योग होता है । फल : जिसके हाथ में राज राजेश्वर योग होता है वह व्यक्ति पूर्ण सुखी, सफल, धनवान तथा विविध ऐश्वर्य का भोग करने वाला होता है । टिप्पणी : निम्न योग भी इससे सम्बन्धित हैं : १. यदि हथेली लम्बी हो तथा उंगलियों के बीच में सन्धि न हो । [चित्र : राज राजेश्वर योग] २. यदि अनामिका और कनिष्ठिका उंगलियां बराबर हों । ब्रह्माण्ड योग : परिभाषा : आदर्श हाथ हो तथा हाथ में चन्द्र पर्वत तथा शुक्र पर्वत का दो लम्बी रेखाओं से परस्पर सम्बन्ध हो तो ब्रह्माण्ड योग होता है । फल : जिसके हाथ में ब्रह्माण्ड योग होता है वह व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त सम्पन्न होता है तथा राजा के समान जीवन व्यतीत करता है । टिप्पणी : सामुद्रिक शास्त्र के विद्वानों ने निम्नलिखित योग भी ब्रह्माण्ड योग बताये हैं । १. यदि मध्यमा उंगली के दूसरे पर्व पर तीन या चार [चित्र : ब्रह्माण्ड योग] खड़ी रेखाएं हों । २. यदि हथेली की सभी उंगलियों के नीचे छोटे अर्द्ध चन्द्र हों । ३. यदि अंगूठा लम्बा, पतला और पीछे की तरफ झुका हुआ हो साथ ही शुक्र पर्वत पूर्ण विकसित हो । ४. यदि चन्द्र पर्वत से दो रेखाएं निकलती हों तथा एक रेखा शुक्र पर्वत तथा दूसरी रेखा बुध पर्वत की ओर जाती हो । ५. यदि हाथ में सूर्य रेखा के साथ-साथ सहायक रेखा भी चल रही हो ।

( २६२ ) लक्ष्मी योग : परिभाषा : यदि शनिवलय तथा बुध वलय हो और किसी एक रेखा से इन दोनों रेखाओं का आपस में सम्बन्ध होता हो तो लक्ष्मी योग माना जाता है । फल : अपने हाथ में लक्ष्मी योग रखने वाला व्यक्ति समाज में प्रशंसा प्राप्त करने वाला तथा आर्थिक दृष्टि से पूर्ण सम्पन्न होता है । ऐसे व्यक्ति में भाषण देने की अद्भुत कला होती है तथा वह शब्दों के माध्यम से लोगों को अपने पक्ष में करने की कला जानता है । ऐसा व्यक्ति गुणी, चतुर, तथा ख्याति प्राप्त करने वाला होता है । महालक्ष्मी योग : परिभाषा : यदि हाथ में भाग्य रेखा अत्यन्त सीधी, स्पष्ट, पूरी लम्बाई लिए हुए तथा मणिबन्ध से निकलने वाली हो और शनि पर्वत पर जाकर उसके मध्य बिन्दु को स्पर्श करती हो तथा सूर्य रेखा चन्द्र पर्वत से प्रारंभ होकर सूर्य पर्वत के मध्य बिन्दु तक पहुंचती हो तो हाथ में महालक्ष्मी योग होता है । फल : महालक्ष्मी योग रखने वाला व्यक्ति अतुल धन सम्पत्ति का मालिक होता है । उसके जीवन में आर्थिक दृष्टि से कोई कमी नहीं रहती । तथा वह पूर्ण रूप से भौतिक सुख प्राप्त करने मे सफल होता है । भारती योग : परिभाषा : यदि बुध पर्वत तथा गुरु पर्वत विकसित हो तथा हाथ में बुध रेखा और गुरु रेखा सीढ़ीदार हो तो भारती योग होता है । फल : जिसके हाथ में भारती योग होता है वह सुन्दर, सजीला तथा आकर्षक व्यक्तित्व का धनी होता है । ऐसा व्यक्ति स्वयं कलाकार होता है तथा कलाकारों को सहायता देकर उन्हें लाभ पहुंचाता है । ऐसा व्यक्ति गुणवान चतुर विद्या- वान तथा संगीत आदि कलाओं में प्रसिद्ध होता है । टिप्पणी : यह योग देखते समय जहां गुरु और बुध पर्वत देखे जाते हैं वहा साथ ही साथ इस बात का भी ध्यान

( २६३ ) रखना चाहिए कि उसकी हाथ की अंगुलियां पतली, लम्बा, बिना गांठ की सुन्दर हों । अरविन्द योग : परिभाषा : यदि हाथ में सभी पर्वत पुष्ट एवं उभरे हुए हों तथा जीवन रेखा के साथ में कोई सहायक रेखा साथ- साथ चल रही हो एवं गुरु पर्वत पर क्रॉस का चिह्न हो तथा स्वास्थ्य एवं भाग्य रेखा बलवान हो तो अरविन्द योग होता है । फल : अरविन्द योग रखने वाला व्यक्ति राजा के समान जीवन व्यतीत करने वाला होता है। समाज में उसका पूर्ण सम्मान होता है तथा वह अपने कार्य से समाज व देश को नेतृत्व देने में सक्षम होता है । आर्थिक दृष्टि से इसके जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती । [चित्र: अरविन्द योग] टिप्पणी : विद्वानों ने निम्नलिखित योग भी अरविन्द योग माना है। १. यदि जीवन रेखा के बीच में से भाग्य रेखा प्रारंभ होकर शनि पर्वत की ओर जाती हो । २. यदि जीवन रेखा से दो शाखाएं निकलकर सूर्य पर्वत तथा बुध पर्वत की ओर जाती हो । ३. यदि तर्जनी उंगली मध्यमा की ओर झुकी हुई हो तथा हथेली में तर्जनी ओर अनामिका लम्बाई में बराबर हो । तड़ित योग : परिभाषा : यदि चन्द्र पर्वत से कोई पतली रेखा गुरु पर्वत की तरफ जाती हो तथा कनिष्ठिका अनामिका के लग- भग बराबर हो तो तड़ित योग होता है । फल : जिसके हाथ में तड़ित योग देखा जाता है वह व्यक्ति अपने जीवन मे राजा के समान जीवन व्यतीत करने वाला होता है । समाज से उसे पूरा-पूरा यश सम्मान मिलता है है। तथा पूर्ण आर्थिक सुख उसके जीवन में रहता है । फल : हस्त रेखा के विद्वानों ने निम्नलिखित योग भी तड़ित योग माने हैं। १. यदि पतली और लम्बी उंगलियां हों तथा तर्जनी [चित्र: तड़ित योग] उंगली के तीसरे पर्व पर तिल का चिन्ह हो । २. यदि सीढ़ीदार सूर्य रेखा बनी हो तथा उसमें स्वास्थ्य रेखा से संबंध स्थापित किया है ।

( २६४ ) ३. यदि कनिष्ठिका का झुकाव अनामिका की तरफ हो तथा सभी पर्वत अपने आप में विकसित हों । सरस्वती योग परिभाषा : यदि कोई एक रेखा वृहस्पति पर्वत से प्रारंभ होकर चन्द्र पर्वत तक पहुंचती हो और एक रेखा चन्द्र पर्वत से प्रारंभ होकर गुरु पर्वत तक पहुंचती हो तथा साथ में ये दोनों ही पूर्ण विकसित हो तो सरस्वती योग होता है । फल : सरस्वती योग जिसके हाथ में होता है वह व्यक्ति अत्यन्त प्रसिद्ध होता है तथा उस पर सरस्वती की विशेष कृपा मानी जाती है । काव्य संगीत, नृत्य आदि के क्षेत्र में वह पारंगत होता है तथा किसी एक काल में वह विशेष निपुणता प्राप्त करता है । अपनी कला के माध्यम से वह अपने देश में (चित्र: सरस्वती योग) तथा विदेश में पूर्ण सम्मान तथा ख्याति अर्जित करता है । इस प्रकार के व्यक्ति के जीवन में सरस्वती और लक्ष्मी दोनों की विशेष कृपा रहती है । ऐसा व्यक्ति मन से भावुक तथा सहृदय होता है और गरीबों दुखियों तथा निर्धनों की सेवा करने के लिए तैयार रहता है । कैलाश योग : परिभाषा : यदि हाथ में बुध पर्वत और सूर्य पर्वत से रेखाएं निकल कर स्वास्थ्य रेखा से नीचे जाकर परस्पर मिलती हों और इस प्रकार मे एक त्रिकोण का सा चिह्न बनता हो तो कैलाश योग होता है । फल : जिसके हाथ मे यह योग होता है वह व्यक्ति राजा के समान जीवन व्यतीत करने वाला होता है तथा भौतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से जीवन मे पूर्ण आनन्द लाभ करने मे समर्थ होता है । टिप्पणी : विद्वानों ने निम्नलिखित योग भी कैलाश योग माने हैं · (चित्र: कैलाश योग) १. यदि पहले मणिबन्ध के ऊपर मत्स्य का आकार हो तथा उस पर से एक रेखा चन्द्र पर्वत की ओर जा रही हो । २. यदि हाथ में दो जीवन रेखाएं हों । ३. यदि हाथ में दो भाग्य रेखाएं स्पष्ट दिखाई देती हों ।

( २६५ ) रश्मि योग : परिभाषा : यदि मणिबन्ध से कोई रेखा शुक्र पर्वत पर पहुँचती हो तथा शुक्र पर्वत अत्यन्त अधिक पुष्ट उठा हुआ सुन्दर गम्भीर तथा लालिमा लिए हुए हो तो रश्मि योग होता है। फल : इस योग में जन्म लेने वाले व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता और वह अपने परि- श्रम से पूर्ण बाहन सुख, धन, यश तथा सम्मान अर्जित करता है। टिप्पणी : विद्वानों ने निम्नलिखित योग भी रश्मि [चित्र: रश्मि योग] योग माने हैं । १. यदि हाथ में कहीं पर भी स्वस्तिक का चिन्ह हो । २. हाथ में चन्द्र पर्वत पर एक खड़ी और एक आड़ी रेखा हो तथा उसके नीचे क्रॉस न हो। ३. हाथ में दो स्वास्थ्य रेखाएं हों । दिव्य योग : परिभाषा : जिसके दाहिने हाथ में गुरु रेखा शुक्र पर्वत पर पहुँचती हो तथा शुक्र पर्वत से एक रेखा गुरु पर्वत पर पहुँचती हो पर सूर्य रेखा तथा बुध रेखा अपने आप में बलवान हो तो दिव्य योग होता है । फल : दिव्य योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति पूर्ण आनन्द उपयोग करता है। यद्यपि वह परिश्रम पूर्वक धन इकट्ठा करता है, परन्तु फिर भी समाज मे उसका सम्मान होता है तथ। आर्थिक दृष्टि से पूर्ण सम्पन्न एवं सुखी रहता है। टिप्पणी : सामुद्रिक शास्त्र के विद्वानों ने निम्न योग [चित्र: दिव्य योग] भी दिव्य योग माने हैं । १. यदि हाथ में मंगल पर्वत से सूर्य पर्वत तक रेखा जाती हो और सूर्य पर्वत में मगल पर्वत तक कोई रेखा जाती हो । २. यदि हाथ में चन्द्रमा का पर्वत अत्यन्त पुष्ट और बलवान हो तथा उसका संबंध भाग्य रेखा से होता हो । ३. यदि हाथ में बुध और चन्द्रमा का परस्पर रेखा संबंध हो गया हो । ४. यदि हाथ में दो मस्तिष्क रेखाएं हों पर आपस में कहीं पर भी मिलती न हों।

( २६६ ) महाराजाधिराज योग : परिभाषा : यदि हाथ मे सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध गुरु, शुक्र तथा शनि के पर्वत पूर्णतः विकसित हों और इन से संबंधित सभी रेखाएं पुष्ट, बलवान, पतली, सीधी और स्पष्ट हों तो महाराजाधिराज योग होता है फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति अत्यन्त भाग्यवान माना जाता है तथा वह आर्थिक व्यापारिक तथा शारीरिक रूप से दृढ़ एवं बलवान होता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में समस्त प्रकार के ऐश्वर्य का भोग करता है साथ ही साथ यह महाराजाधिराज योग अपने जीवन में तीर्थं यात्राएं करता है। दान देता है, तथा धार्मिक कार्यों मे बढ़-चढ़ कर भाग लेता है। सभी दृष्टियों से इसका जीवन पूर्ण माना जा सकता है । टिप्पणी . निम्नलिखित योग भी महाराजाधिराज योग माना जाता है । १. यदि भाग्य रेखा दोहरी हो तथा अत्यन्त पतली हो इसके साथ ही साथ जीवन रेखा, स्वास्थ्य रेखा तथा मस्तिष्क रेखा भी दोहरी हों। परन्तु ये रेखाएं आपस में नही टकराती हों । देवांश योग . परिभाषा यदि हाथ मे सात ग्रहों के पर्वतों में से पांच पर्वत विकसित हों एवं पुष्ट हों तथा उनसे संबंधित रेखाएं भी स्पष्ट एवं निर्दोष हों तो देवांश योग होता है । फल जिसके हाथ में देवांश योग होता है वह व्यक्ति राजा के समान अपना जीवन व्यतीत करता है । उसके जीवन में भी समस्त प्रकार के ऐश्वर्य एवं भोग बने रहते हैं । देवांश योग

( २६७ ) पारावत योग : परिभाषा: हथेली में सात ग्रहों में से चार ग्रहों के पर्वत विकसित हों बलवान और पुष्ट हों तथा उनसे संबंधित रेखाएं सरल, सीधी तथा निर्दोष हों तो वह पारावत योग होता है। फल : जिस व्यक्ति की हथेली में पारावत योग होता है वह आर्थिक दृष्टि से पूर्ण सम्पन्न होता है तथा उसके जीवन में सुख उपभोग की कोई कमी नहीं रहती । पारावत योग नृप योग : परिभाषा · यदि हथेली में सात ग्रहों में से तीन ग्रहों के पर्वत बलवान, पुष्ट तथा लालिमा युक्त हों तथा साथ ही उनसे संबंधित रेखाए भी स्पष्ट हों तो नृप योग होता है। फल : जिसके हाथ में नृप योग होता है वह आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होता है तथा वाहन, भूमि, मकान, परिवार, आदि सभी दृष्टियों में पूर्ण सुख का उपभोग करता है। नृप योग गौरी योग : परिभाषा यदि हथेली में सात ग्रहों के पर्वतों में से दो ग्रह पर्वत बलवान और पुष्ट हो तथा उनसे संबंधित रेखाएं भी स्पष्ट हो तो हाथ में गौरी योग होता है। फल : जिसके हाथ में गौरी योग होता है वह भूमि- पति होता है। कृषि कार्यों में उसकी विशेष रुचि होती है तथा परिवार के सभी सदस्यों को वह अत्यधिक स्नेह से रखता है। ऐसा व्यक्ति धार्मिक भावनाओं को मानने वाला तथा देवताओं की पूजा करने वाला होता है। इसके पुत्र भी योग्य, गुणवान तथा उच्च कोटि के होते हैं। गौरी योग

( २६८ ) राज योग : परिभाषा : यदि हथेली में सात ग्रहों में से कोई एक ग्रह का पर्वत बलवान पुष्ट तथा लालिमा युक्त हो तथा उससे संबंधित रेखा भी सीधी सरल और स्पष्ट हो तो राज योग होता है। फल : जिसके हाथ में राज योग होता है वह अपने परिश्रम से ऊंचा उठकर अपने जीवन को सुखमय बनाता है। तथा यदि अन्य रेखाएं अच्छी हों तो गजेटेड अधिकारी बनता है ऐसा व्यक्ति परिश्रम पूर्वक धन संचय करता है तथा उसका पूरा आनन्द उठाता है। राज योग राज्य योग : परिभाषा : जिसके हाथ में सूर्य रेखा बलवान हो और गुरु पर्वत श्रेष्ठ हो तो राज्य योग होता है। फल : राज्य योग में जन्म लेने वाले व्यक्ति सभी सुख-सुविधाओं में पूर्ण जीवन व्यतीत करने का प्रयत्न करते हैं। परन्तु जीवन के अन्तिम समय में और विशेषकर ४२वें साल के बाद से उसका भाग्योदय होता है तथा उसे भूमि, मकान तथा वाहन सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति चतुर, विपत्ति में भी धैर्य रखने वाला तथा योग्य होता है। राज्य योग टिप्पणी : निम्नलिखित योग भी राज्य योग कहलाते हैं । १. हाथ में गुरु पर्वत श्रेष्ठ तथा सभी उंगलिया लम्बी और पतली हों । २. यदि कनिष्ठिका उंगली जरूरत से ज्यादा लम्बी हो । ३. यदि शुक्र पर्वत के नीचे स्वस्तिक का चिह्न हो । ४. यदि गुरु पर्वत बडा हो तथा उस पर से रेखा सूर्य पर्वत की ओर जा रही हो । ५. यदि मणिबन्ध से भाग्य रेखा का प्रारंभ हो । ६. यदि गुरु पर्वत हथेली के बाहर न निकला हुआ हो तथा अपने आप में श्रेष्ठ हो ।

( २६६ ) महेन्द्र योग : परिभाषा : यदि दोनों हाथों में भाग्य रेखा तथा सूर्य रेखा का प्रारंभ मणिबन्ध से दिखाई दे तथा चन्द्र पर्वत पूर्णतः विकसित हो तो महेन्द्र योग होता है । फल : जिसके हाथ में महेन्द्र योग होता है वह आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होता है। राजा के समान जीवन व्यतीत करता है । उसके जीवन काल में ही उसकी समस्त इच्छाएं पूरी हो जाती हैं । विद्वानों ने निम्नलिखित योग भी महेन्द्र योग माने हैं । १. यदि चन्द्र पर्वत बलवान हो तथा उस पर स्वस्तिक का चिह्न हो । २. यदि शुक्र पर्वत बलवान हो तथा जीवन रेखा की ओर बढ़ा हुआ हो, साथ ही उस पर स्वास्तिक का चिन्ह बना हो । रुद्र योग : परिभाषा : यदि हथेली में गुरु मुद्रा तथा शनि मुद्रा हो साथ ही सूर्य से कोई रेखा निकल कर इन दोनों मुद्राओं को स्पर्श करती हो तो रुद्र योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में रुद्र योग होता है वह मस्त तबियत का आदमी होता है। यद्यपि यह जीवन में धन उपार्जित करता है, परन्तु साथ ही यह दोनों हाथों से खर्च करना भी जानता है। शान-शौकत, वैभव प्रदर्शन आदि में इसका विश्वास ज्यादा होता है । मृगेन्द्र योग : परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, तथा शनि इन सातों ही ग्रहों के पर्वत दबे हुए हों तथा इनसे संबंधित सभी रेखाएं कमजोर हों या उनमें से कई रेखाएं दिखाई ही नहीं देती हों तो मृगेन्द्र योग होता है । फल : मृगेन्द्र योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति राजा के समान जीवन व्यतीत करने वाला तथा आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त उच्च कोटि का होता है। भौतिक दृष्टि से उसके जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती ।

( २७० ) देव योग : परिभाषा : यदि हथेली में सात ग्रहों के पर्वतों में से ६ पर्वत दबे हुए या अदृश्य हों तथा इनसे संबंधित रेखाएं भी अदृश्य या टूटी हुई हों तो उसके हाथ में देव योग होता है । फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति सभी सुखों का भोग करता है, उसका जीवन अत्यन्त शान्त एवं सरल होता है तथा अपने विशेष क्षेत्र में वह व्यक्ति प्रसिद्धि प्राप्त करता है । एक प्रकार से इस योग को भी राज योग के समान ही समझना चाहिए । देव योग विक्रम योग : परिभाषा : यदि हथेली में सात ग्रहो के पर्वतों में से पांच पर्वत दबे हुए या अदृश्य हों तथा उनसे संबंधित रेखाएं भी अदृश्य या छिन्न भिन्न हों तो उसके हाथ में विक्रम योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह भौतिक दृष्टि से पूर्ण उन्नति करता है तथा उसके जीवन में किसी प्रकार की कोई न्यूनता नहीं रहती । विक्रम योग सुरपति योग : परिभाषा : यदि हथेली में सात ग्रहो के पर्वतों में से चार पर्वत दबे हुए कमजोर या अदृश्य हों तथा इनसे संबंधित रेखाएं भी अदृश्य या टूटी हुई हों तो सुरपति योग होता है । फल: जिसके हाथ में सुरपति योग होता है वह व्यक्ति अपने परिश्रम में धन एकत्र करता है तथा समाज में सम्मान- नीय जीवन व्यतीत करने में समर्थ होता है । उसके जीवन में भौतिक दृष्टि से कोई न्यूनता नहीं रहती । सुरपति योग

( २७१ ) गजपति योग : परिभाषा : यदि हाथ में सात ग्रहों के पर्वतों में से तीन पर्वत अत्यन्त दबे हुए कमजोर या अदृश्य हों तथा इनसे सम्बन्धित रेखाएं भी अदृश्य या छिन्न-भिन्न हों तो गजपति योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह परिश्रमी और हमेशा उन्नति की ओर अग्रसर होने वाला व्यक्ति होता है । वह जीवन में कुछ करके दिखाना चाहता है । जीवन के ३२ वें वर्ष से उसका भाग्योदय होता है और उसके बाद से जीवन पर्यन्त वह सभी दृष्टियों से पूर्ण सुख भोग करता है । [चित्र: गजपति योग] मन्महेन्द्र योग : परिभाषा : यदि हथेली में प्रजापति, वरुण, हर्षल, प्लूटो नेपच्यूने तथा पर्वत बलवान हों तथा राहू एवं केतु के पर्वतों का रेखा के द्वारा सम्बन्ध हो तो मन्महेन्द्र योग होता है । फल : मन्महेन्द्र योग मे जन्म लेने वाला व्यक्ति बल- वान, गुणवान तथा पूज्यनीय होता है । किसी एक क्षेत्र में वह अत्यन्त प्रसिद्धि प्राप्त करता है । अथवा उच्च शासकीय पद प्राप्त कर अपने जीवन को आनन्दमय बनाने में समर्थ होता है । [चित्र: मन्महेन्द्र योग] हरिहरब्रह्म योग : परिभाषा : यदि दाहिने हाथ में बुध, चन्द्र, शुक्र, तथा सूर्य पर्वतों का परस्पर रेखाओं के द्वारा सम्बन्ध होता हो और ये रेखाए आपस मे कहीं पर भी न कटती हों तो हरि- हरब्रह्म योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ मे हरिहरब्रह्म योग होता है वह व्यक्ति शुद्ध सांस्कृतिक जीवन व्यतीत करने वाला एवं सत्य बोलने वाला, वेद तथा संस्कृति को जानने वाला, एवं देवपूजक होता है । ऐसे व्यक्ति का समाज में विशेष सम्मान होता है । [चित्र: हरिहर ब्रह्म योग]

( २७२ ) कुसुम योग : परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य पर्वत अपने स्थान से खिसक कर शनि पर्वत में मिल गया हो तो कुसुम योग होता है। फल : कुसुम योग रखने वाला व्यक्ति विद्वान भाग्य- शाली तथा उच्च पद पर पहुंचने वाला माना गया है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में कई आकस्मिक क्षण आते हैं जबकि वह जल्दी से जल्दी उन्नति करने में समर्थ होता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार की कोई न्यूनता नहीं रहती। [चित्र: कुसुम योग] अग्नि काण्ड योग : परिभाषा : यदि मंगल पर्वत पर क्रॉस का चिह्न हो तथा इस पर्वत से एक रेखा निकलकर राहू पर्वत पर जाती हो तो अग्निकाण्ड योग होता है। फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उस व्यक्ति की मृत्यु आग से जलकर होती है। [चित्र: अग्निकाण्ड योग] मत्स्य योग : परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत विकसित हो, अंगूठा पतला, लम्बा और थोड़ा सा पीछे झुका हुआ हो, साथ ही यदि सूर्य रेखा सीढ़ीदार हो तो मत्स्य योग होता है। फल : जिस व्यक्ति के हाथ में मत्स्य योग होता है वह सही भविष्यवक्ता, समय का पाबन्द तथा सद्गुणों से युक्त होता है। ऐसा व्यक्ति अपनी बुद्धि के द्वारा उन्नति करता है तथा जीवन में क्षमावान, दयावान तथा सद्गुण विवेक- [चित्र: मत्स्य योग] युक्त माना जाता है।

( २७३ ) अग्रजघातक योग : परिभाषा : यदि हथेली मे राहू तथा हर्षल पर्वत पर त्रिकोण का चिह्न हो तो उसके जीवन में अग्रजघातक योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति अपने बड़े भाई से वैमनस्य रखता है अथवा उसकी हत्या कर देता है । अग्रजघातक कूर्म योग : परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य रेखा स्पष्ट चन्द्र पर्वत से होती हुई जीवन रेखा के मध्य मिलती हो तथा भाग्य रेखा बलवान हो तो कूर्मयोग होता है । फल : कूर्म योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति अपने कार्यों से विख्यात तथा कीर्तिवान होता है । साथ ही ऐसा व्यक्ति विपत्ति मे धैर्य धारण करने वाला, भाषण देने में होशियार, दूसरों को प्रभावित करने वाला तथा राजा के समान जीवन व्यतीत करने वाला होता है । कूर्म योग आत्मघात योग : परिभाषा : यदि मध्यमा उंगली के सबसे निचले पौर पर तारक चिन्ह हो तो आत्मघात योग होता है । फल : जिसके हाथ में आत्मघात योग होता है उसकी मृत्यु स्वयं के प्रयत्नों से होती है और वह आत्महत्या करके मरता है । आत्मघात योग

( २७४ ) देवेन्द्र योग : परिभाषा : जिसके हाथ में कमल का चिह्न हो और विशेषकर ऐसा चिह्न जीवन रेखा के पास में चन्द्र पर्वत से कुछ हटकर हो परन्तु जिससे कोई प्रसिद्ध रेखा कटती न हो तो देवेन्द्र योग होता है । फल : जिसके हाथ में देवेन्द्र योग होता है वह ध्यमित सूझ-बूझ वाला तथा चतुराई से काम करने वाला होता है । वह आकर्षक व्यक्तित्व रखता है तथा सामने वाले व्यक्तियों को पूरी तरह से प्रभावित करने की क्षमता रखता है । ऐसा व्यक्ति दीर्घायु, शासन प्रिय, सुन्दर, कुशल, तथा दक्ष होता है । (चित्र: देवेन्द्र योग) खंग योग : परिभाषा : यदि हथेली मे बुध पर्वत अपने स्थान से खिसक कर सूर्य पर्वत मे मिल गया हो और सूर्य पर्वत अपने आप मे दृढ़ एवं श्रेष्ठ हो तो खंग योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह साधारण स्थिति में भी जन्म लेकर अत्यन्त ऊंचे स्तर तक पहुंचता है । ये जो भी बातें कहते हैं उसे अन्त समय तक निभाने का प्रयत्न करते है । ऐसे व्यक्ति भविष्य कथन करने मे भी श्रेष्ठ एव सफल होते हैं । आर्थिक दृष्टि मे इनके जीवन मे किसी प्रकार (चित्र: खंग योग) की कोई न्यूनता नहीं रहती । नवलक्ष्मी योग : परिभाषा : यदि हथेली में भाग्य रेखा, सूर्य रेखा तथा, बुध रेखा तीनों ही मणिबन्ध मे निकलती हों तथा सीधी, सरल और स्पष्ट हों तो नवलक्ष्मी योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में यह योग होता है वह अटूट सम्पत्ति का स्वामी, सम्पन्न, ऐश्वर्य युक्त तथा प्रसिद्धि प्राप्त होता है । (चित्र: नव लक्ष्मी योग)

( २७५ ) ज्योतिर्विद योग : [चित्र: ज्योतिर्विद योग] परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत पर किसी प्रकार की बाधक रेखाएं न हों तथा यह पर्वत अपने आप में पुष्ट हो तो ज्योतिर्विद योग होता है । फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति सफल भविष्य वक्ता होता है । भूमि योग : परिभाषा : यदि मंगल तथा शुक्र पर्वत के बीच पर- स्पर रेखा संबन्ध हो तथा शुक्र पर्वत पर भाग्य रेखा की कोई सहायक रेखा आकर मिलती हो तो भूमि योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह भूमि सम्बन्धी कार्यों से विशेष लाभ उठाता है तथा अपने आप में भूमिपति होता है । [चित्र: भूमि योग] पुत्रतः धनाप्ति योग : [चित्र: पुत्रतः धनाप्ति योग] परिभाषा : यदि गुरु पर्वत से कोई पतली रेखा शुक्र पर्वत तक जाती हो तथा तर्जनी और मध्यमा के बीच तिल चिह्न हो तो यह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसे जीवन भर पुत्र से धन प्राप्ति होती रहती है तथा सन्तान सुख मिलता है ।

( २७६ ) कोटीश योग : परिभाषा : यदि हाथ में शनि वलय हो और वलय रेखा से छोटी-छोटी रेखाएं ऊपर की ओर उठ रही हों, साथ ही भाग्य रेखा मणिबन्ध से निकल कर शनि बिन्दु तक जाती हो तो कोटीश योग होता है । फल : जिसके हाथ में कोटीश योग होता है वह व्यक्ति जीवन में निश्चय ही करोड़पति होता है । कोटीश योग अरिष्ट योग : परिभाषा : यदि शनि पर्वत पर तारे का चिह्न हो तथा मध्यमा के सबसे ऊपरी पौर पर सफेद बिन्दु हो तो अरिष्ट योग होता है । फल : जिसके हाथ में अरिष्ट योग होता है वह जीवन में कई बार जादू, टोना, मन्त्र तंत्र, भूत प्रेत आदि से पीड़ित रहता है । अरिष्ट कलह योग : परिभाषा : यदि हथेली में चन्द्र पर्वत पर आड़ी तिरछी रेखाओं से जाल बना हो तो कलह योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में कलह योग होता है वह जीवन भर प्रत्येक से कलह करता रहता है तथा हर एक से उसका मानसिक असंतुलन बना रहता है । कलह

( २७७ ) उन्माद योग : परिभाषा : यदि चन्द्र, राहू, पर्वत का परस्पर रेखा सम्बन्ध हो या सूर्य और राहू पर्वतों का परस्पर सम्बन्ध हो तो उन्माद योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में उन्माद योग होता है वह विक्षिप्त स्वभाव का तथा उन्मादी प्रकृति का होता है । उन्माद योग विष योग : परिभाषा : यदि हाथ में बुध रेखा के नीचे कई काले बिन्दु हों तो विष योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में यह योग होता है उसे धोखे से या विश्वासघात से जहर दिया जाता है जिससे उसकी मृत्यु होती है । विष योग श्वान योग परिभाषा : यदि शनि पर्वत पर काला धब्बा या काले बिन्दु हों तो श्वान योग होता है । फल : जिसके हाथ में श्वान योग होता है वह पागल कुत्ते के काटने से पीड़ित होता है या पागल हो जाता है अथवा उसकी मृत्यु हो जाती है । श्वान योग

( २७८ ) बृहद् बीज योग : परिभाषा : यदि राहू पर्वत पर काले धब्बे या काले बिन्दु हों तो बृहद् बीज योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में यह योग होता है उसके अण्डकोष बढ़े हुए होते हैं तथा जीवन भर इस रोग से ग्रसित रहता है । बृहद् बीज विमल योग : परिभाषा : यदि दो मणिबन्धों के बीच में सफेद बिन्दु हो तो विमल योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति अत्यन्त सर्व गुण सम्पन्न समस्त प्रकार के ऐश्वर्य भोग भोगने वाला, दयालु, परोपकारी तथा सुखी होता है । विमल सरल योग : परिभाषा : यदि सभी नाखूनों पर छोटे अर्द्धचन्द्र हों तो सरल योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ मे सरल योग होता है वह व्यक्ति दीर्घायु, शिक्षित, बात के मर्म को समझने वाला तथा निरंतर उन्नति की ओर अग्रसर होने वाला व्यक्ति होता है । सरल

( २७६ ) हर्ष योग : परिभाषा : यदि हथेली के मध्य में चन्द्र पर्वत और ऊर्ध्व रेखा के बीच में तिल का चिह्न हो तो हर्ष योग होता है । फल : हर्ष योग वाला व्यक्ति भाग्यवान गुणी, चतुर, दृढ़, तथा प्रसिद्ध होता है । प्रवृज्या योग : परिभाषा : यदि आयु रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो तो प्रवृज्या योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में प्रवृज्या योग होता है वह किसी साधु से दीक्षा ले लेता है और गृहस्थ छोड़कर सन्यासी बन जाता है । टिप्पणी : विद्वानो ने निम्नलिखित योग भी प्रवृज्या योग से संबंधित माने हैं : १. यदि सूर्य रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो । २. यदि पूरा हाथ लचकदार हो । सभी उंगलियां लम्बी और सुन्दर हों तथा भाग्य रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो । ३. यदि बुध पर्वत के नीचे त्रिकोण या जाल हो । ४. यदि संतान रेखाओं एवं प्रणय रेखाओं पर जाल का चिह्न हो । शुक्र योग : परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत बलवान पुष्ट, उठा हुआ तथा सुन्दर हो एवं उस पर बाधक रेखाओं का जाल न हो तो शुक्र योग होता है । फल : शुक्र याग वाला व्यक्ति धनवान, विद्वान विख्यात तथा कीर्तिवान होता है । ऐसा व्यक्ति दीर्घायु तथा सुखी परिवार से युक्त होता है ।