बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७२ ) जिनका चन्द्र-पर्वत भली प्रकार से विकसित होता है, वे भौतिकवादी न होकर कल्पनावादी होते हैं। प्रेम तथा सौन्दर्य उनके जीवन की कमजोरी होती है परन्तु सांसा- रिक छल-प्रपंचों को न समझ पाने के कारण उनका प्रेम जीवन दुखान्त ही होता है। यदि चन्द्र पर्वत जरूरत से ज्यादा विकसित हो तो यह व्यक्ति पागल होता है। यदि चन्द्र-पर्वत मध्यम स्तर का विकसित हो तो ऐसा व्यक्ति कल्पनालोक में विचरण करने वाला तथा हवाई किले बनाने वाला होता है वे खाट पर पड़े-पड़े लाखों करोड़ों की योजनाएं बना लेते हैं पर उनमें एक भी पूरी नहीं हो पाती, या यों कहा जाय कि उनमें उन योजनाओं को पूरा करने की योग्यता अथवा साहस नहीं होता । ऐसे व्यक्ति जरूरत से ज्यादा भावुक होते हैं। छोटी-सी भी बात इनको बहुत अधिक चुभती है। छोटा-सा भी व्यंग इनके पूरे शरीर को झकझोर देता है। ऐसे लोगों में संघर्ष की भावना नहीं के बराबर होती है। विपरीत परिस्थितियों में ये पलायन कर जाते हैं और धीरे-धीरे इनमें निराशा की भावना बढ़ जाती है। यदि चन्द्र-पर्वत विकसित होकर हथेली के बाहर की ओर झुक जाता है तो ऐसे व्यक्ति में रजोगुण की प्रधानता बन जाती है। ऐसे व्यक्ति भोगी, विषयी तथा कामी हो जाते हैं एवं सुन्दर स्त्रियों के पीछे व्यर्थ के चक्कर लगाते रहते हैं। इनके जीवन का ध्येय भोग विलास एवं ऐयाशी होता है परन्तु जीवन में ये सुख भी उनको नसीब नहीं होते। यदि हथेली में यह पर्वत शुक्र की ओर झुकता हुआ अनुभव हो तो ऐसे व्यक्ति कामुक होने के साथ-साथ निर्लज्ज भी होते हैं। इनको अपने-पराये का भी भेद नहीं रहता, जिसके फलस्वरूप वे व्यक्ति समाज में बदनाम हो जाते हैं । यदि चन्द्र-पर्वत पर आड़ी-टेढ़ी रेखाएं फैली हुई दिखाई दें तो ऐसा व्यक्ति कई बार जलयात्राएं करता है। यदि चन्द्र-पर्वत पर गोल घेरा हो तो वह व्यक्ति राजनीतिक कार्य से विदेश की यात्रा करता है। यदि हाथ में चन्द्र पर्वत का अभाव हो तो वह व्यक्ति रूखा और पूर्णतः भौतिक होता है। परन्तु जिनका चन्द्र-पर्वत सामान्य रूप से उभरा हुआ होता है वे आन्तरिक दृष्टि से अत्यधिक सुन्दर एवं समझ- दार होते हैं। यदि यह पर्वत ऊपर की ओर से उभरा हुआ होता है तो उसे गठिया अथवा जुकाम जैसे रोग बने रहते हैं। यदि यह पर्वत जरूरत से ज्यादा विकसित हो तो वह अस्थिर बुद्धि का, निराश, वहमी तथा लगभग पागल-सा होता है। इसको सिर दर्द की शिकायत बराबर बनी रहती है। यदि यह पर्वत नीचे की तरफ खिसका हुआ हो तो वह व्यक्ति शक्तिहीन होता है। यदि चन्द्र-पर्वत पर शंख का चिह्न हो तो वे व्यक्ति अपने ही प्रयत्नों से सफल होते हैं परन्तु उनकी सफलता में बराबर बाधाएं और परेशानियां बनी रहती हैं। इतना होने पर भी वे जीवन को सही रूप से जीने में तथा दूसरों को सहयोग एवं सहायता देने में विश्वास रखते हैं।