बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
( ७२ ) जिनका चन्द्र-पर्वत भली प्रकार से विकसित होता है, वे भौतिकवादी न होकर कल्पनावादी होते हैं। प्रेम तथा सौन्दर्य उनके जीवन की कमजोरी होती है परन्तु सांसा- रिक छल-प्रपंचों को न समझ पाने के कारण उनका प्रेम जीवन दुखान्त ही होता है। यदि चन्द्र पर्वत जरूरत से ज्यादा विकसित हो तो यह व्यक्ति पागल होता है। यदि चन्द्र-पर्वत मध्यम स्तर का विकसित हो तो ऐसा व्यक्ति कल्पनालोक में विचरण करने वाला तथा हवाई किले बनाने वाला होता है वे खाट पर पड़े-पड़े लाखों करोड़ों की योजनाएं बना लेते हैं पर उनमें एक भी पूरी नहीं हो पाती, या यों कहा जाय कि उनमें उन योजनाओं को पूरा करने की योग्यता अथवा साहस नहीं होता । ऐसे व्यक्ति जरूरत से ज्यादा भावुक होते हैं। छोटी-सी भी बात इनको बहुत अधिक चुभती है। छोटा-सा भी व्यंग इनके पूरे शरीर को झकझोर देता है। ऐसे लोगों में संघर्ष की भावना नहीं के बराबर होती है। विपरीत परिस्थितियों में ये पलायन कर जाते हैं और धीरे-धीरे इनमें निराशा की भावना बढ़ जाती है। यदि चन्द्र-पर्वत विकसित होकर हथेली के बाहर की ओर झुक जाता है तो ऐसे व्यक्ति में रजोगुण की प्रधानता बन जाती है। ऐसे व्यक्ति भोगी, विषयी तथा कामी हो जाते हैं एवं सुन्दर स्त्रियों के पीछे व्यर्थ के चक्कर लगाते रहते हैं। इनके जीवन का ध्येय भोग विलास एवं ऐयाशी होता है परन्तु जीवन में ये सुख भी उनको नसीब नहीं होते। यदि हथेली में यह पर्वत शुक्र की ओर झुकता हुआ अनुभव हो तो ऐसे व्यक्ति कामुक होने के साथ-साथ निर्लज्ज भी होते हैं। इनको अपने-पराये का भी भेद नहीं रहता, जिसके फलस्वरूप वे व्यक्ति समाज में बदनाम हो जाते हैं । यदि चन्द्र-पर्वत पर आड़ी-टेढ़ी रेखाएं फैली हुई दिखाई दें तो ऐसा व्यक्ति कई बार जलयात्राएं करता है। यदि चन्द्र-पर्वत पर गोल घेरा हो तो वह व्यक्ति राजनीतिक कार्य से विदेश की यात्रा करता है। यदि हाथ में चन्द्र पर्वत का अभाव हो तो वह व्यक्ति रूखा और पूर्णतः भौतिक होता है। परन्तु जिनका चन्द्र-पर्वत सामान्य रूप से उभरा हुआ होता है वे आन्तरिक दृष्टि से अत्यधिक सुन्दर एवं समझ- दार होते हैं। यदि यह पर्वत ऊपर की ओर से उभरा हुआ होता है तो उसे गठिया अथवा जुकाम जैसे रोग बने रहते हैं। यदि यह पर्वत जरूरत से ज्यादा विकसित हो तो वह अस्थिर बुद्धि का, निराश, वहमी तथा लगभग पागल-सा होता है। इसको सिर दर्द की शिकायत बराबर बनी रहती है। यदि यह पर्वत नीचे की तरफ खिसका हुआ हो तो वह व्यक्ति शक्तिहीन होता है। यदि चन्द्र-पर्वत पर शंख का चिह्न हो तो वे व्यक्ति अपने ही प्रयत्नों से सफल होते हैं परन्तु उनकी सफलता में बराबर बाधाएं और परेशानियां बनी रहती हैं। इतना होने पर भी वे जीवन को सही रूप से जीने में तथा दूसरों को सहयोग एवं सहायता देने में विश्वास रखते हैं।
( ७३ ) वस्तुतः हाथ में चन्द्र-पर्वत से ही व्यक्ति कल्पनाप्रिय, सौन्दर्यप्रिय तथा भावुक हो सकता है। ८. हर्षल : यदि वास्तव में देखा जाय तो यह ग्रह दूसरे ग्रहों की अपेक्षा ज्यादा बलवान एवं समर्थ होता है। हथेली में इसका क्षेत्र हृदय तथा मस्तिष्क रेखा के बीच में होता है। सही रूप में इसका क्षेत्र भली प्रकार से यह कनिष्ठिका के नीचे, बुध पर्वत से थोड़ा-सा नीचे अनुभव किया जा सकता है। इस ग्रह का प्रभाव हृदय तथा मस्तिष्क पर विशेष रूप से होता है। जिन व्यक्तियों की हथेली में यह पर्वत बुध के नीचे तथा हृदय एवं मस्तिष्क रेखा के बीच में होता है, वह व्यक्ति विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक और गणितज्ञ बनता है। अणु, परमाणु टेलीविजन आदि जटिल यन्त्रों के निर्माण तथा रचना में ऐसे व्यक्ति पूर्णतः सफल होते हैं। यदि इस पर्वत का उभार कम होता है तो ऐसे व्यक्ति मशीनरी से सम्बन्धित कार्यों में रुचि लेते हैं तथा ऐसे ही स्थानों पर नौकरी करके संतुष्ट होते हैं। यदि इस पर्वत पर त्रिकोण या चतुर्भुज का चिह्न हो तो वह व्यक्ति आश्चर्य- जनक रूप से प्रगति करता है तथा अपने कार्यों से विश्वस्तरीय सम्मान प्राप्त करता है। समाज में उसका सम्मान होता है और उसे अपने जीवन में आशा से अधिक सफलता मिलती है। यदि हर्षल पर्वत से कोई रेखा अनामिका उंगली की ओर जाती है तो वह व्यक्ति जीवन में विश्व प्रसिद्ध होता है। यदि हर्षल पर्वत का झुकाव बुध पर्वत की ओर विशेष रूप से होता है तो ऐसा व्यक्ति अपनी प्रतिभा का दुरुपयोग करता है और एक प्रकार से वह व्यक्ति अन्तर्राष्ट्रीय ठग या लुटेरा हो जाता है। ऐसे व्यक्ति हृदय रोग से भी बराबर पीड़ित रहते हैं। यदि हर्षल पर्वत नेप्च्यून की ओर झुकता हुआ दिखाई दे तो ऐसे व्यक्ति को पूर्णतः भोगी समझना चाहिए। ऐसा व्यक्ति एक पत्नी से सन्तुष्ट न होकर भटकता फिरता है। उसका गृहस्थ जीवन एक प्रकार से बरबाद हो जाता है तथा उसे अपनी पत्नी तथा अपने पुत्रों से किसी प्रकार का कोई मोह नहीं होता। जीवन में जरूरत से ज्यादा व्यसनों में लिप्त होकर यह अपना स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य खो बैठता है। ९. नेप्च्यून : यह ग्रह पृथ्वी से बहुत अधिक दूरी पर स्थित होने के कारण इसका प्रभाव पृथ्वीवासियों पर बहुत कम पड़ता है परन्तु फिर भी इसका प्रभाव मानव जीवन पर जो भी पड़ता है, वह स्थायी होता है और अपने आप में आश्चर्यजनक परिणाम दिखाता है। हथेली में इस ग्रह का क्षेत्र मस्तक रेखा से नीचे तथा चन्द्र क्षेत्र से ऊपर होता है। यदि यह क्षेत्र अथवा यह पर्वत विशेष रूप से उभरा हुआ हो तो वह व्यक्ति श्रेष्ठ संगीतज्ञ, कवि अथवा लेखक होता है। यदि इस पर्वत पर रेखा दिखाई दे और यदि
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वह रेखा आगे चलकर भाग्य रेखा से मिल जाय तो वह व्यक्ति जीवन में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण पद पर पहुंचता है । यदि इस पर्वत का झुकाव चन्द्र क्षेत्र की तरफ विशेष हो तो उसका स्तर अपने आप में अत्यन्त घटिया होता है ऐसा व्यक्ति संकीर्ण मनोवृत्ति वाला तथा समाज विरोधी कार्य करने वाला होता है। यदि नेपच्यून पर्वत से उठकर कोई रेखा मस्तिष्क रेखा को काट लेती है तो वह व्यक्ति निश्चय ही पागल होता है तथा उसके जीवन का अधिकतर हिस्सा पागलखाने में ही व्यतीत होता है। यदि यह पर्वत जरूरत से ज्यादा उभरा हुआ हो तो ऐसे व्यक्ति का जीवन दुखमय होता है तथा उसका गृहस्थ जीवन बरबाद हो जाता है। ऐसे व्यक्ति सनकी, संशयालु तथा क्रूर प्रकृति के माने जाते हैं। यदि नेपच्यून पर्वत विकसित होकर हर्षल से मिल जाता है तो वह व्यक्ति जीवन मे निश्चय ही धन के लालच में किसी की हत्या करेगा, ऐसा समझ लेना चाहिए। ऐसे व्यक्ति अपने कार्यों के प्रति लापरवाह होते हैं, तथा कार्य हो जाने के बाद पछताते रहते हैं। यदि इस पर्वत पर क्रॉस का चिह्न हो तो उसका पूरा जीवन गरीबी तथा निर्धनता में बीतता है। ऐसे व्यक्ति अपने जीवन की आवश्यकताओं को भी भली प्रकार से पूरा नहीं कर पाते । १०. प्लूटो : अंग्रेजी में इस ग्रह को प्लूटो तथा हिन्दी में इसे 'इन्द्र' के नाम से पुकारते हैं। हथेली में इसका क्षेत्र हृदय रेखा के नीचे तथा मस्तिष्क रेखा के ऊपर होता है, और यह हर्षल तथा गुरु क्षेत्र के बीच में अवस्थित होता है। प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में इस पर्वत को स्पष्टता से देखा जा सकता है। इसका प्रभाव व्यक्ति की वृद्धावस्था में ही देखने को मिलता है। यदि यह पर्वत भली प्रकार से विकसित होता है तो उस व्यक्ति का बुढ़ापा अपने आप में अत्यन्त सुखी एवं सफल रहता है। जीवन के ४२ वें वर्ष से आगे वह जीवन में सुख अनुभव करने लगता है और मृत्यूपर्यन्त वह सभी दृष्टियों से सुखी ही रहता है। यदि प्लूटो पर्वत पर क्रॉस का चिह्न हो तो उसकी मृत्यु ४५ वर्ष से पहले-पहले दुर्घटना से हो जाती है। यदि यह पर्वत जरूरत से ज्यादा विकसित हो तो वह व्यक्ति असभ्य, मूर्ख, निरक्षर तथा अपव्ययी होता है। इसको जीवन में पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा जीवन में परिवार वालों का तथा मित्रों का किसी भी प्रकार से कोई सहयोग नही मिलता। यदि यह पर्वत अविकसित हो तो वह व्यक्ति भाग्यहीन माना जाता है। उसका स्वभाव चिड़चिड़ा तथा दुखमय हो जाता है ।
( ७५ ) ११. राहु : हथेली में इस पर्वत की स्थिति मस्तिष्क रेखा से नीचे चन्द्र, मंगल, तथा शुक्र से घिरा हुआ जो भूभाग होता है वह राहु क्षेत्र कहलाता है । भाग्य रेखा इसी पर्वत पर से होकर शनि पर्वत की ओर जाती है । राहु का क्षेत्र यदि हथेली पर अत्यन्त पुष्ट एवं उन्नत हो तो ऐसा व्यक्ति निश्चय ही भाग्यवान होता है और यदि पुष्ट पर्वत पर से होकर भाग्य रेखा स्पष्ट तथा गहरी होकर आगे बढ़ती है तो वह व्यक्ति जीवन में परोपकारी प्रतिभावान धार्मिक तथा सभी प्रकार से सुख भोगने वाला होता है । यदि हथेली पर भाग्य रेखा टूटी हुई हो पर राहु पर्वत विकसित हो तो ऐसा व्यक्ति एक बार आर्थिक दृष्टि से बहुत अधिक ऊंचा उठ जाता है और फिर उसका पतन हो जाता है । यदि यह पर्वत अपने स्थान से हटकर हथेली के मध्य की ओर सरक जाता है तो उस व्यक्ति को यौवनकाल में बहुत अधिक बुरे दिन देखने को मिलते हैं । यदि हथेली के बीच का हिस्सा गहरा हो और उस पर से भाग्य रेखा टूटी हुई आगे बढ़ती हो तो वह व्यक्ति यौवनकाल में भिखारी के समान जीवन व्यतीत करता है । यदि राहु पर्वत कम उभरा हुआ हो तो ऐसा व्यक्ति चंचल स्वभाव का तथा अपने ही हाथों अपनी सम्पत्ति का नाश करने वाला होता है । १२. केतु : हथेली में इस पर्वत का स्थान मणिबन्ध के ऊपर शुक्र और चन्द्र क्षेत्रों को बांटता हुआ भाग्य रेखा के प्रारम्भिक स्थान के समीप होता है । इस ग्रह का फल राहु के समान ही देखा गया है । इस ग्रह का प्रभाव जीवन के पांचवें वर्ष से बीसवें वर्ष तक होता है । यदि यह पर्वत स्वाभाविक रूप से उन्नत एवं पुष्ट होता है तथा भाग्य रेखा भी स्पष्ट तथा गहरी हो तो वह व्यक्ति भाग्यशाली होता है तथा अपने जीवन में समस्त प्रकार के सुखों का भोग करता है । ऐसा बालक गरीब घर में जन्म लेकर भी अमीर होता देखा गया है । यदि यह पर्वत अस्वाभाविक रूप से उठा हुआ हो और भाग्य रेखा कमजोर हो तो उसे बचपन में बहुत अधिक बुरे दिन देखने पड़ते हैं । उसके घर की आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है तथा शिक्षा के लिए भी ऐसे बालक को बहुत अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है । ऐसा बालक बचपन में रोगी भी होता है । यदि यह पर्वत अविकसित हो और भाग्य रेखा प्रबल भी हो फिर भी उसके जीवन से दरिद्रता नहीं मिटती, अतः केतु पर्वत विकसित हो और साथ ही भाग्य रेखा भी स्पष्ट और विकसित हो तभी व्यक्ति जीवन में पूर्ण उन्नति कर सकता है । इस प्रकार हम देखते हैं कि व्यक्ति की हथेली में यदि पर्वत सही रूप से विक- सित एवं पुष्ट होते हैं तभी व्यक्ति अपने जीवन में पूर्ण उन्नति कर सकता है ।
पर्वत युग्म एवं हस्त चिह्न हथेली पर पर्वतों का अध्ययन हमने पीछे के अध्याय में किया है परन्तु ऐसा देखा जाता है कि अधिकतर हाथों में एक से अधिक पर्वत विकसित होते हैं । ऐसी स्थिति में उन दोनों पर्वतों का मिश्रित फल उसके जीवन में प्राप्त होता है । पाठकों के लिए यह फल प्राप्त करना कुछ कठिन-सा होता है इसलिए मैं उनकी सुविधा के लिए नीचे पर्वत-युग्मों का फल स्पष्ट कर रहा हूँ : १. गुरु : गुरु और शनि : उत्तम भाग्यवर्द्धक । गुरु और सूर्य : श्रेष्ठ धन सम्मान, पद-प्राप्ति । गुरु और बुध : ज्योतिष ज्ञान में रुचि तथा काव्य शास्त्र आदि में विशेष सफलता । गुरु और मंगल : पराक्रम, साहस, नीति-निपुणता तथा रण-संचालन योग्यता । गुरु और नेपच्यून : श्रेष्ठ विचार, उत्तम धन-प्राप्ति । गुरु और हर्षल : विज्ञान में रुचि, परोपकार की भावना । गुरु और प्लूटो : श्रेष्ठ वक्ता, उर्वर मस्तिष्क, विलक्षण प्रतिभा । गुरु और राहू : दुष्टविचार तथा आत्म-विश्वास में कमी । गुरु और केतु : जीवन में बाधाएं, परेशानियां एवं असफलताएं । गुरु और चन्द्र : गम्भीरता तथा प्रभावपूर्ण व्यक्तित्व । गुरु और शुक्र : आकर्षक व्यक्तित्व एवं सम्मोहन की विशेष योग्यता तथा मानव को पूर्ण प्रभावित करने की क्षमता । २. शनि : शनि और सूर्य : तर्क-शक्ति, चिन्तन तथा वैज्ञानिक भावना का विकास । शनि और बुध : निर्णय, लेने की क्षमता तथा परोपकार की भावना । शनि और शुक्र : स्वार्थी, रसिक तथा प्रेम में सब कुछ लुटाने वाला । शनि और राहू : उत्तम गुणों से युक्त एवं जीवन में आकस्मिक धन लाभ करने वाला ।
( ७७ ) शनि और केतु : आजीविका की चिन्ता एवं मानसिक परेशानियां । शनि और नेपच्यून : जीवन में कई बार विदेश यात्राएं । शनि और हर्षल : एकान्त-प्रिय तथा विविध कलाओं में निपुणता । शनि और प्लूटो : चतुराई, विवेकशीलता तथा तेजस्विता । शनि और चन्द्र : रहस्यमय एवं गोपनीय व्यक्तित्व । शनि और मंगल : लड़ाकू प्रवृत्ति तथा क्रोधित होने पर सब कुछ विध्वंस कर देने की प्रवृत्ति । ३. सूर्य : सूर्य और बुध : विज्ञान में रुचि तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार करने की क्षमता । सूर्य और शुक्र : योजना बद्ध रूप से कार्य करने वाला । सूर्य और राहू : जीवन में बराबर दुख, चिन्ता एवं परेशानियां भोगने वाला । सूर्य और केतु : विदेश यात्राएं । सूर्य और हर्षल : उच्चस्तरीय प्रसिद्धि एवं ज्ञान तथा विवेक का विकास । सूर्य और नेपच्यून : सोच समझकर योजना बनाने वाला । सूर्य और प्लूटो : धीर गम्भीर व्यक्तित्व । सूर्य और चन्द्र : आडम्बर तथा कृत्रिमता में विश्वास रखने वाला । सूर्य और मंगल : आत्मोत्सर्ग की प्रबल भावना । ४. बुध : बुध और शुक्र : विपरीत सैक्स के प्रति विशेष रुझान तथा संगीत के प्रति विशेष रुचि । बुध और राहू : गुस्सा तथा चिड़चिड़ा स्वभाव । बुध और केतु : यात्रा प्रेमी तथा मानवीय दृष्टि से सफल । बुध और हर्षल : कल्पना प्रिय । बुध और नेपच्यून : परोपकारी तथा विश्व की कल्याण कामना करने वाला । बुध और प्लूटो : अन्तर्राष्ट्रीय सफलता प्राप्त करने वाला व्यापारी । बुध और चन्द्र : वैज्ञानिक प्रतिभा सम्पन्न दूरदर्शी व्यक्तित्व । बुध और मंगल : तुरन्त एवं सही निर्णय लेने वाला व्यक्ति ।
( ७८ ) ५. शुक्र : शुक्र और चन्द्र : प्रेमभावना की तीव्रता तथा कला प्रेम । शुक्र और राहू : निम्न स्तर की स्त्रियों से सम्बन्ध । शुक्र और केतु : सहृदयता एवं उच्च भावना का विकास । शुक्र और हर्षल : प्रेम में तीव्रता । शुक्र और नेपच्यून : उच्च कोटि का कला प्रेम और मनुष्य मात्र के प्रति स्नेह । शुक्र और प्लूटो : जीवन की बाधाओं को समझने वाला और उन बाधाओं को परास्त करने वाला । शुक्र और मंगल : संगीत ज्ञान में पूर्णता । ६. चन्द्र : चन्द्र और मंगल : समुद्रपारीय यात्रा । चन्द्र और राहू : मित्रों द्वारा विश्वासघात । चन्द्र और केतु : यौवनावस्था में प्रेम के द्वारा बदनामी । चन्द्र और हर्षल : मानवीय भावनाओं का विकास । चन्द्र और नेपच्यून : वैरागी भावना । चन्द्र और प्लूटो : प्रबल काम-शक्ति । ७. राहू : राहू और केतु : आजीविका के लिए कठोर प्रयत्न । राहू और हर्षल : दुखमय जीवन । राहू और नेपच्यून : विदेश में रहने वाली स्त्री से विवाह । राहू और प्लूटो : अपराधवृत्ति का विकास । ८. केतु : केतु और हर्षल : अत्याचार की भावना । केतु और नेपच्यून : ज्ञान शून्यता । केतु और प्लूटो : सम्मान वृद्धि । ६. हर्षल : हर्षल और प्लूटो : वैज्ञानिक प्रतिभा का विकास ।
( ७६ ) हर्षल और नेपच्यून : विदेश गमन, उच्च पद प्राप्ति । १०. नेपच्यून : नेपच्यून और प्लूटो : तीव्र कामांधता । हथेली पर पाये जाने वाले चिह्न : हथेली का अध्ययन करते समय उन पर अंकित चिह्नों का भी सावधानीपूर्वक अध्ययन करना चाहिए क्योंकि भविष्यफल और फलादेश में ये चिह्न बहुत अधिक सहयोग देते हैं । हथेली पर जो चिह्न पाये जाते हैं उनमें से मुख्य निम्न प्रकार से हैं : १—रेखा २ – अधिक रेखाएं ३—आपस में कटती हुई रेखाएं ४—बिन्दु ५—क्रॉस ६—नक्षत्र ७—वर्ग ८—वृत्त ६—त्रिकोण १०—जाली अब मैं पर्वतों पर पाये जाने वाले इन चिह्नों का शुभाशुभ फल स्पष्ट कर रहा हूं : १. गुरु पर्वत : एक रेखा : कार्यों में सफलता । एक से अधिक रेखाएं : भाग्योदय तथा नवीन कार्यों में रुचि । आपस में कटती हुई रेखाएं : निम्न कोटि के विचार तथा जीवन में परेशानियां । बिन्दु : सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी । क्रॉस : वैवाहिक जीवन में पूर्णता तथा घर में मांगलिक कार्य । नक्षत्र : ऊंची इच्छाएं तथा उन इच्छाओं की पूर्ति । वर्ग : कल्पना और यथार्थता का सुखद समन्वय ।
( ८० ) त्रिकोण : राजनीतिक एवं धार्मिक कार्यों में सफलता । जाली : अंधविश्वास, अशुभ घटनाएं तथा हानि । वृत्त : प्रत्येक कार्य में सफलताएं । गुरु का चिह्न : पर्वत में पाये जाने वाले गुणों का विकास । शनि का चिह्न : तंत्र विद्याओं में सफलता । सूर्य का चिह्न : ललित कलाओं में रुचि । बुध का चिह्न : प्रशासन दक्षता । शुक्र का चिह्न : उच्च घराने की महिलाओं से प्रेम । चन्द्र का चिह्न : युद्ध में निपुणता । २. शनि पर्वत : एक रेखा : भाग्योदय में वृद्धि । कई रेखाएं : जीवन में निरन्तर बाधाएं । आपस में कटती हुई रेखाएं : दुर्भाग्य तथा चिन्ताएं । बिन्दु : असम्भावित घटनाओं में वृद्धि । क्रॉस : कमजोरी तथा नपुंसकता । नक्षत्र : हत्या करने की भावना का विकास । वर्ग : अनिष्टों से बचाव । वृत्त : मांगलिक कार्यों में रुचि । त्रिकोण : रहस्यमय कार्यों में वृद्धि । जाली : भाग्यहीनता । शनि का चिह्न : धर्म, दर्शन, तथा तंत्र आदि विद्याओं में रुचि । गुरु का चिह्न : दर्शन के क्षेत्र में विश्व प्रसिद्ध सफलता । सूर्य का चिह्न : कलात्मक सौन्दर्य का विकास । बुध का चिह्न : ज्योतिष शास्त्र में रुचि । शुक्र का चिह्न : विपरीत योनि के प्रति प्रेम का आवेग एवं असफलता । मंगल का चिह्न : न्यायाधीश एवं न्यायप्रियता । ३. सूर्य पर्वत : एक रेखा : धन, सम्मान एवं प्रतिष्ठा में वृद्धि ।
( ८१ ) कई रेखाएं : कलात्मक रुचि तथा उच्च पद प्राप्ति । आपस में कटती हुई रेखाएं : नौकरी में बाधाएं । बिन्दु : अपमान एवं पराजय । क्रॉस : प्रसिद्धि में न्यूनता । नक्षत्र : धन, उच्च पद प्राप्ति । वर्ग : समाज में विशेष सम्मान । वृत्त : जीवन में कई बार विदेश यात्रा । त्रिकोण : कला के क्षेत्र में उच्च सम्मान । जाली : मान हानि । सूर्य का चिह्न : कला के माध्यम से विश्व प्रसिद्ध सम्मान तथा श्रेष्ठ धन लाभ । शनि का चिह्न : तंत्र विद्याओं में रुचि । गुरु का चिह्न : सफल राजनीतिज्ञ । बुध का चिह्न : वाक्पटु । शुक्र का चिह्न : कविता तथा कला के प्रति विशेष रुझान । चन्द्र का चिह्न : साहित्यिक कार्यों में सफलता । मंगल का चिह्न : प्रसिद्ध सैनिक अथवा सेनाध्यक्ष । ४. बुध पर्वत : एक रेखा : धनवान तथा समृद्धि। कई रेखाएं : व्यापार में असाधारण योग्यता । आपस में कटती हुई रेखाएं : सफल चिकित्सक । बिन्दु : व्यापार में असाधारण हानि । क्रॉस : दिवालिया । नक्षत्र : विदेशों में व्यापार करने वाला । वर्ग : भविष्य को पहचानने वाला । वृत्त : एक्सीडेंट तथा आकस्मिक मृत्यु । त्रिकोण : राजनीतिक सफलता । जाली : मान हानि । धब्बा : व्यापार में असफलता । बुध का चिह्न : सफल व्यापारी ।
( ८२ ) गुरु का चिन्ह : विज्ञान में असाधारण योग्यता । शनि का चिन्ह : जीवन में हर क्षेत्र में निराशा । सूर्य का चिन्ह : धार्मिक भावना का विकास एवं ज्योतिष शास्त्र में निपुणता । शुक्र का चिन्ह : धन के लालच में निन्दनीय प्रेम । चन्द्र का चिन्ह : षडयन्त्र तथा धोखा देने की प्रवृत्ति । मंगल का चिन्ह : ठगविद्या में सफलता । ५. शुक्र पर्वत : एक रेखा : तीव्र कामवासना । कई रेखाएं : अत्यधिक भोगी । आपस में कटती हुई रेखाएं : प्रेम में असफलता तथा सम्मान हानि । बिन्दु : गुप्तांगों की बीमारी । क्रॉस : असफल प्रेम तथा जीवन में निराशावादी भावना का विकास । नक्षत्र : प्रेमिका के कारण धन हानि । वर्ग : जेल यात्रा । वृत्त : दुर्घटना में शारीरिक क्षति । त्रिकोण : जीवन में कई स्त्रियों से भोग करने वाला । जाली : अस्वस्थ शरीर । शुक्र का चिन्ह : विशेष भोगी । गुरु का चिन्ह : चापलूसी करने वाला । शनि का चिन्ह : ईर्ष्या एवं अन्याय पूर्ण प्रेम भावना । सूर्य का चिन्ह : आदर्श प्रेम बुध का चिन्ह : धन के लिए प्रेम । चन्द्र का चिन्ह : वासना पूर्ण विचार । मंगल का चिन्ह : जीवन में कई बार कई स्त्रियों से बलात्कार । ६. मंगल पर्वत : एक रेखा : साहस । कई रेखाएं : हिंसात्मक प्रवृत्ति ।
( ८३ ) आपस में : युद्ध भावना तथा हिंसापूर्ण विचार । कटती हुई रेखाएं बिन्दु : युद्ध में शारीरिक क्षति । क्रॉस : युद्ध में मृत्यु । नक्षत्र : मिलिट्री में विशेष उच्च पद प्राप्ति । वर्ग : जरूरत से ज्यादा क्रोध की भावना । वृत्त : चतुर, नीति निपुण । त्रिकोण : योजनाबद्ध कार्य करने वाला । जाली : आत्म हत्या । मंगल का चिह्न : युद्ध भावना में विकास । गुरु का चिह्न : स्त्रियों को मोहित करने वाला । शनि का चिह्न : कुटिल स्वभाव । सूर्य का चिह्न : प्रदर्शन प्रियता । बुध का चिह्न : आकस्मिक धन प्राप्ति । शुक्र का चिह्न : प्रेम के क्षेत्र में उग्रता । चन्द्र का चिह्न : पागलपन । ७. चन्द्र पर्वत : एक रेखा : कल्पना की भावना का विकास । कई रेखाएं : सौन्दर्य प्रियता । आपस में : चिन्ताएं । कटती हुई रेखाएं बिन्दु : प्रेम में बार-बार असफलताएं । क्रॉस : सामाजिक सम्मान में न्यूनता । नक्षत्र : राजकीय सम्मान । वर्ग : विशेष धन प्राप्ति । वृत्त : जल में डूबने से मृत्यु । त्रिकोण : राष्ट्र व्यापी सम्मान प्राप्त करने वाला कवि ।
( ८४ ) जाली : निराशा । चन्द्र का चिह्न : मूर्ख । गुरु का चिह्न : साहस के बल पर आगे बढ़ने वाला । शनि का चिह्न : अन्धविश्वासी तथा अर्द्ध पागल । सूर्य का चिह्न : जुए की प्रवृत्ति शुक्र का चिह्न : नवीन विचारों की तरफ प्रेरणा । मंगल का चिह्न : पागलपन । ८. राहू-केतु : एक रेखा : साहस कई रेखाएं : अत्यन्त क्रोधी आपस में : उत्तरदायी भावना की कमी । कटती हुई रेखाएं बिन्दु : हर कार्य में सफलता । क्रॉस : मानहानि । नक्षत्र : युद्ध सम्बन्धी कार्यों में विशेष सफलता । वर्ग : राज्य सम्मान । वृत्त : सेना में अत्यन्त उच्च पद प्राप्ति । त्रिकोण : अतुलनीय धन प्राप्ति । जाली : दरिद्र जीवन । सूर्य का चिह्न : कमजोरी चन्द्र का चिह्न : पागलपन मंगल का चिह्न : डाकू, हत्यारा बुध का चिह्न : निम्नस्तरीय कार्यों से धन लाभ । गुरु का चिह्न : अधार्मिक । शुक्र का चिह्न : निम्नस्तरीय स्त्रियों से प्रेम संपर्क । शनि का चिह्न : प्रसिद्ध जाल साज । ६. हर्षल : एक रेखा : विशेष सम्मान ।
२. द्वितीय खण्ड: प्रधान रेखाएं (जीवन, शीर्ष, हृदय, भाग्य व सूर्य रेखा)
( ८५ ) कई रेखाएं : बार-बार विदेश यात्राएं । आपस में : वायुयान दुर्घटना में मृत्यु । कटती हुई रेखाएं बिन्दु : उच्चस्तरीय प्रसिद्धि । क्रॉस : विदेश में रहने को बाध्य होना । नक्षत्र : विदेशों में ख्याति । वर्ग : वैज्ञानिक कार्यों में रुचि । वृत्त : विशेष धन प्राप्ति । त्रिकोण : इंजीनियरिंग कार्यों में रुचि । जाली : आकस्मिक दुर्घटना से मृत्यु । सूर्य का चिह्न : विश्व प्रसिद्ध सम्मान । चन्द्र का चिह्न : जीवन में विशेष सफलता । मंगल का चिह्न : सेना में उच्च पद प्राप्ति । बुध का चिह्न : आयात-निर्यात का व्यापार करने वाला । गुरु का चिन्ह : धार्मिक काव्य की रचना करने वाला । शुक्र का चिन्ह : उच्च कोटि का प्रेम । शनि का चिन्ह : सफल राजनीतिज्ञ । १०. नेपच्यून : एक रेखा : समाज में सफलता ! कई रेखाएं : सामाजिक कार्यों के करने से सम्मान प्राप्ति । आपस में कटती हुई रेखाएं : हर कार्य में निराशा । बिन्दु : न्यायप्रियता । क्रॉस : हत्या करने की भावना का विकास । नक्षत्र : जल यात्रा । वर्ग : राष्ट्रस्तरीय सम्मान । वृत्त : मानसिक कमजोरी । त्रिकोण : विदेश में विवाह । जाली : जल से मृत्यु ।
( ८६ ) सूर्य का चिन्ह : विशेष सफलता । चन्द्र का चिन्ह : तटवर्ती स्थानों पर व्यापार से लाभ । मंगल का चिन्ह : युद्ध शस्त्र, के व्यापार से सफलता । बुध का चिन्ह : अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारी । गुरु का चिन्ह : सफल सामाजिक भावना का विकास । शुक्र का चिन्ह : सो से अधिक स्त्रियों से रमण । शनि का चिन्ह : नपुंसकता । ११. प्लूटो : एक रेखा : जीवन में पूर्ण उन्नति । कई रेखाएं : समाज में विशेष सम्मान । आपस में कटती हुई रेखाएं : सन्यास भावना का विकास । बिन्दु : हर कार्य में असफलता । क्रॉस : आत्महत्या नक्षत्र : धार्मिक कार्यों में रुचि । वर्ग : मूर्खता । वृत्त : शुभ कार्यों में रुचि । त्रिकोण : कई कलाओं में सफलता । जाली : असफल जीवन । सूर्य का चिन्ह : विशेष सम्मान । चन्द्र का चिन्ह : जल में डूबने से मृत्यु । मंगल का चिन्ह : धर्मान्धता । बुध का चिन्ह : व्यापारिक कार्यों में विशेष सफलता । गुरु का चिन्ह : समाज में सम्मानीय स्थान प्राप्त होना । शुक्र का चिन्ह : सात्विक प्रेम । शनि का चिन्ह : तंत्र विद्याओं में रुचि । संक्षेप में आगे की पंक्तियों में ऋणात्मक और घनात्मक पर्वत का विवेचन कर रहा हूं । जिन तारीखो में जन्म होता है उन तारीखों के अनुसार उसके पर्वत का फल उसके जीवन में रहता है । घनात्मक पर्वत होने पर उस पर्वत की विशेषताएं तथा ऋणात्मक पर्वत होने पर उस पर्वत से सम्बन्धित ग्रह की न्यूनताएं मिलती हैं ।
( ८७ ) जन्म तारीख ग्रह (धनात्मक) २० अप्रैल से २० मई शुक्र २१ मार्च से २१ अप्रैल मंगल २१ नवम्बर से ३० दिसम्बर गुरु २१ दिसम्बर से २० जनवरी शनि २१ जुलाई से २० अगस्त सूर्य २१ मई से २० जून बुध २१ जुलाई से २० अगस्त चन्द्र इसके साथ ही मैं ऋणात्मक पर्वत विकास को भी स्पष्ट कर रहा हूं। इस समय में जन्म लेने वाले व्यक्तियों को सम्बन्धित ग्रह पर्वत फल न्यूनतम मिलता है। ऋणात्मक पर्वत : निम्न तारीखों में जन्म लेने वाले सम्बन्धित ग्रह का ऋणा- त्मक विकास रखते हैं। जन्म तारीख ग्रह (ऋणात्मक) २१ सितम्बर से २० अक्टूबर शुक्र २१ अक्टूबर से २० नवम्बर मंगल १६ फरवरी से २० मार्च गुरु २१ जनवरी से १८ फरवरी शनि २१ मार्च से २० अप्रैल सूर्य २१ अगस्त से २० सितम्बर बुध २१ जुलाई से २० अगस्त चन्द्र वस्तुतः हथेली का अध्ययन करना अपने आप में अत्यन्त कठिन है परन्तु यदि धैर्य परिश्रम तथा लगन से हस्तरेखा ज्ञान का अध्ययन करे तो वह निश्चय ही अपने जीवन में पूर्ण एवं श्रेष्ठ सफलता प्राप्त कर सकता है ।
रेखाएं जीवन शक्ति का स्फूर्तिमय वेग हथेली के माध्यम से ही सम्पन्न होता है । और यह वेग हथेली के माध्यम से रेखाओं और पर्वतों को एक ही सूत्र में ग्रंथित करता है। जैसा कि मैं पीछे कह चुका हूं कि हथेली पर अंकित कोई भी रेखा व्यर्थ नहीं होती क्योंकि हथेली पर छोटी या बड़ी, स्थूल या सूक्ष्म जो भी रेखा होती है वह इस जीवन शक्ति के वेग को प्रवाहित करने में सहायक होती है इसलिये हस्तरेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह हथेली पर पाई जाने वाली प्रत्येक रेखा का सूक्ष्म अध्ययन करे । हथेली पर जो रेखाएं स्पष्ट गहरी एवं लंबी होती हैं वे सफलता की सूचक होती हैं इसके विपरीत टूटी हुई विरल और अस्पष्ट रेखाएं जीवनशक्ति में बाधक समझनी चाहिए। अतः स्पष्ट रेखाओं का प्रभाव ही मानव जीवन पर सही रूप में अंकित होता है। हस्तरेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह सामने वाले व्यक्ति के दोनों हाथों का सूक्ष्मतापूर्वक अध्ययन करे। साथ ही वह छोटी से छोटी रेखा का भी अवलोकन करे, क्योंकि हाथ में पाई जाने वाली प्रत्येक रेखा का अपना महत्त्व होता है और वह रेखा किसी न किसी घटना को स्पष्ट करती ही है। रेखाओं द्वारा घटनाओं का समय भी ज्ञात किया जा सकता है। जितना ही ज्यादा व्यक्ति का अभ्यास होगा उतना ही ज्यादा वह उस समय को सही रूप में अंकित कर सकता है। हाथ का अध्ययन करने से पूर्व रेखाओं का सही सही परिचय ज्ञात कर लेना आवश्यक है । प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में सात मुख्य रेखाएं होती हैं तथा बारह गौण रेखाएं या सहायक रेखाएं अथवा प्रवाहित रेखाएं होती हैं। सात मुख्य रेखाएं निम्न- लिखित हैं — मुख्य रेखाएं : १. जीवन रेखा । २. मस्तिष्क रेखा । ३. हृदय रेखा । ४. सूर्य रेखा । ५. भाग्य रेखा ।
(१८६) ६. स्वास्थ्य रेखा। ७. विवाह रेखा । इनके अतिरिक्त बारह गौण रेखाएं होती है। यद्यपि ये गौण रेखाएं कहलाती हैं परन्तु हथेली में इनका महत्त्व स्वतंत्र होता है और वह जीवन में बहुत अधिक महत्त्व रखने वाली होती हैं। गौण रेखाएं : १. गुरु वलय २. मंगल रेखा ३. शनि वलय ४. रवि वलय ५. शुक्र वलय ६. चन्द्र रेखा ७. प्रतिभा प्रभावक रेखा ८. यात्रा रेखा ९. सन्तति रेखा १०. मणिबन्ध रेखाएं ११. आकस्मिक रेखाएं १२. उच्च पद रेखाएं इन रेखाओं का अध्ययन सावधानी के साथ करना चाहिए। परन्तु रेखाओं का अध्ययन करने से पूर्व रेखा के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर लेनी उचित रहेगी। मुख्यतः चार प्रकार की रेखाएं होती हैं : १. मोटी रेखा : ये वे रेखाएं होती हैं जो अपने आप में गहरी, स्पष्ट और सामान्यतः चौड़ाई लिये हुए होती हैं। ऐसी रेखाएं धुंधल में भी स्पष्ट देखी जा सकती हैं। २. पतली रेखाएं: ये रेखाएं प्रारम्भ से लेकर अन्त तक पतली परन्तु स्पष्ट होती हैं। ऐसी रेखाएं ज्यादा प्रभावपूर्ण कही जाती हैं। ३. गहरी रेखा : ये रेखाएं सामान्यतः पतली तो होती हैं परन्तु साथ ही साथ गहरी भी होती हैं, और ऐसा प्रतीत होता है जैसे हथेली के मांस में धंसी हुई सी हों। ४. ढलवा रेखा :- ये रेखाएं प्रारम्भ में तो मोटी होती हैं परन्तु ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती है त्यों-त्यों अपेक्षाकृत पतली होती जाती हैं।
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इन रेखाओं की जानकारी के साथ-ही-साथ निम्न प्रकार की जानकारी भी पाठकों के लिए आवश्यक कही जाती है । १. रेखाएं स्पष्ट सुन्दर लालिमा लिये हुए तथा साफ-सुथरी होनी चाहिए । इनके मार्ग में न तो किसी प्रकार का चिह्न होना चाहिए, और न किसी प्रकार का द्वीप होना चाहिए । साथ ही ये रेखाएं टूटी हुई भी नहीं होनी चाहिए । २. यदि हथेली में रेखाएं किंचित् पीलापन लिये हुए हों तो ऐसी रेखाएं स्वास्थ्य में कमी और रक्त दूषितता को स्पष्ट करती है । ऐसी रेखाएं निराशावादी भावना को भी बताती हैं । ३. रक्तिम रेखाएं व्यक्ति की प्रसन्नता और स्वस्थ मनोवृत्ति को स्पष्ट करती है । इससे ऐसा ज्ञात होता है कि व्यक्ति प्रसन्नचित्त स्वस्थ और स्पष्ट वक्ता है । ४. हथेली पर काली रेखाएं पाया जाना निराशा तथा कमजोरी को सूचित करती हैं । ५. मुर्झाई हुई या कमजोर रेखाएं : भविष्य में आने वाली बाधाओ की सूचक कही जाती हैं । ६. यदि किसी रेखा के साथ-साथ कोई और रेखा आगे बढ़ती हो तो उस रेखा को विशेष बल मिलता है और उस रेखा का प्रभाव विशेष समझना चाहिए । ७. यदि किसी टूटी हुई रेखा के साथ साथ सहायक रेखा चलती हुई दिखाई दे तो उस भग्न रेखा का विपरीत फल न्यूनतम होता है । ८. जीवन रेखा के अलावा यदि कोई रेखा अपने अन्तिम सिरे पर जाकर दो भागों में विभक्त हो जाती है तो ऐसी रेखा अत्यन्त श्रेष्ठ एवं प्रभावपूर्ण मानी जाती है परन्तु यदि हृदय रेखा अन्त में जाकर दो भागों में विभक्त होती है तो ऐसे व्यक्ति की मृत्यु कम आयु में ही हार्ट एटेक से हो जाती है । ६. यदि कोई रेखा अपने अन्तिम सिरे पर जाकर कई भागों में बंट जाय तो उस रेखा का फल विपरीत समझना चाहिए । १०. यदि किसी रेखा में से कोई नई रेखा निकल कर ऊपर की ओर बढ़ती हो तो उस रेखा के फल में वृद्धि होती है । ११. यदि किसी रेखा में से कोई रेखा निकल कर नीचे की ओर झुक रही हो या नीचे के माग की ओर गतिशील हो तो उसका विपरीत फल मिलता है । १२. भोग रेखा या प्रणय रेखा में से कोई रेखा निकल कर ऊपर की ओर बढ़ रही हो तो सुन्दर पति मिलने का योग बनता है इसके विपरीत यदि उसमें से कोई रेखा निकलकर नीचे की ओर बढ़ रही हो तो उस व्यक्ति की पत्नी की मृत्यु शीघ्र ही हो जाती है ।
( ११ ) १३. यदि मस्तिष्क रेखा में से कोई रेखा ऊपर की ओर बढ़ रही हो तो वह व्यक्ति विशेष यश प्राप्त करता है। १४. जंजीरदार रेखा अशुभ मानी गई है। १५. यदि विवाह रेखा जंजीरदार हो तो उसको प्रेम में असफलता मिलती है। १६. यदि मस्तिष्क रेखा जंजीरदार दिखाई दे तो वह व्यक्ति पागल बन जाता है। १७. हथेली में लहरियादार रेखा शुभ फल देने वाली नहीं होती। १८. टूटी हुई रेखाएं अशुभ फल ही देती है। १९. यदि कोई रेखा बहुत अधिक सूक्ष्म और कमजोर हो तो उसका प्रभाव नहीं के बराबर होता है। २०. यदि किसी रेखा के मार्ग में वह द्वीप या कोई चिन्ह हो तो उसे शुभ नहीं समझना चाहिए। २१. यदि रेखा के मार्ग में वर्ग हो तो इससे उस रेखा को बल मिलता है तथा उस रेखा का शुभ फल प्राप्त होता है। २२. यदि रेखा पर कोई बिन्दु हो तो इससे उस रेखा से संबंधित कार्य की हानी होती है। २३. यदि किसी रेखा पर त्रिकोण का चिह्न दिखाई दे तो उस रेखा से संबंधित कार्य शीघ्र ही होना समझना चाहिए। २४. रेखाओं पर तिरछी रेखाएं हानिकारक मानी गई हैं। २५. यदि रेखाओं पर नक्षत्र दिखाई दे तो इससे कार्य सफलता शीघ्र प्राप्त होती है। २६. मोटी रेखाएं व्यक्ति की दुर्बलता को स्पष्ट करती है। २७. पतली रेखाएं व्यक्ति के जीवन में श्रेष्ठ फल देने में समर्थ मानी गई हैं। २८. ढ़लवा रेखाएं व्यक्ति के परिश्रम को तो स्पष्ट करती हैं परन्तु उससे श्रेष्ठ फल मिलने का योग नहीं बनता। २९. यदि कोई गहरी रेखा चलते-चलते बीच में ही रुक जाय या कमजोर पड़ जाय तो ऐसी रेखा दुर्घटना की परिचायक होती है। ३०. रेखा यदि कहीं पर पतली और कहीं पर मोटी हो तो वह शुभ नहीं है और ऐसा व्यक्ति जीवन में कई बार धोखा खायेगा ऐसा समझना चाहिए। ३१. रेखाओं के बारे में सावधानी के साथ विचार करना चाहिए और यदि कोई चिह्न दोनों ही हाथों में दिखाई दे तभी उससे संबंधित भविष्य कथन करना चाहिए।