भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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( ८० ) त्रिकोण : राजनीतिक एवं धार्मिक कार्यों में सफलता । जाली : अंधविश्वास, अशुभ घटनाएं तथा हानि । वृत्त : प्रत्येक कार्य में सफलताएं । गुरु का चिह्न : पर्वत में पाये जाने वाले गुणों का विकास । शनि का चिह्न : तंत्र विद्याओं में सफलता । सूर्य का चिह्न : ललित कलाओं में रुचि । बुध का चिह्न : प्रशासन दक्षता । शुक्र का चिह्न : उच्च घराने की महिलाओं से प्रेम । चन्द्र का चिह्न : युद्ध में निपुणता । २. शनि पर्वत : एक रेखा : भाग्योदय में वृद्धि । कई रेखाएं : जीवन में निरन्तर बाधाएं । आपस में कटती हुई रेखाएं : दुर्भाग्य तथा चिन्ताएं । बिन्दु : असम्भावित घटनाओं में वृद्धि । क्रॉस : कमजोरी तथा नपुंसकता । नक्षत्र : हत्या करने की भावना का विकास । वर्ग : अनिष्टों से बचाव । वृत्त : मांगलिक कार्यों में रुचि । त्रिकोण : रहस्यमय कार्यों में वृद्धि । जाली : भाग्यहीनता । शनि का चिह्न : धर्म, दर्शन, तथा तंत्र आदि विद्याओं में रुचि । गुरु का चिह्न : दर्शन के क्षेत्र में विश्व प्रसिद्ध सफलता । सूर्य का चिह्न : कलात्मक सौन्दर्य का विकास । बुध का चिह्न : ज्योतिष शास्त्र में रुचि । शुक्र का चिह्न : विपरीत योनि के प्रति प्रेम का आवेग एवं असफलता । मंगल का चिह्न : न्यायाधीश एवं न्यायप्रियता । ३. सूर्य पर्वत : एक रेखा : धन, सम्मान एवं प्रतिष्ठा में वृद्धि ।