भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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७० महाभाष्यम् उदाहरण, प्रत्युदाहरण, वाक्याध्याहार यह सब मिलकर व्याख्यान होता है । न जानने वाले के लिए यह ऐसा होता है । सूत्र से ही शब्दों का प्रतिपादन हो जाता है इस हेतु से भी सूत्र से ही (शब्दों का प्रतिपादन होता है) । जो सूत्रों का अतिक्रमण करके कहे वह ग्रहण नहीं किया जाता । उषा—सूत्र रूप प्रथम पक्ष का पुनरभ्युपगम करते हुए प्रस्तुत अवतरण में उससे सम्बद्ध भ्रान्तियों का निराकरण किया गया है । सूत्र को व्याकरण मानने के विरोध में जो सर्वप्रथम षष्ठ्यर्थ के अनुपपन्न होने की बात कही गई थी, वह उचित नहीं है । राहु और राहु के शिर में तात्त्विक भेद न होने पर भी जिस प्रकार से व्यपदेशिवद्भाव से सम्बन्धविवक्षा आरोपित कर ली जाती है उसी प्रकार से सूत्र और व्याकरण में भी सम्बन्ध की कल्पना करके षष्ठी विभक्ति का उपपादन किया जा सकता है । और जो सूत्र के अतिरिक्त उदाहरण, प्रत्युदाहरण आदि रूप व्याख्यान से युक्त होने पर ही शब्द-प्रतिपत्ति की बात कही गई थी, वह भी उपयुक्त नहीं है, क्योंकि यह सब प्रपञ्च व्याकरणज्ञान से हीन व्यक्ति के लिए ही है । व्याकरणज्ञ केवल चर्चित पदों से सूत्रार्थ का सम्यक् अवबोध कर सकता है । मूलम्—अथ किमर्थो वर्णानामुपदेशः ?

  • वृत्तिसमवायार्थ उपदेशः— वृत्तिसमवायार्थो वर्णानामुपदेशः— किमिदं वृत्तिसमवायार्थ इति ? वृत्तये समवायो वृत्तिसमवायः । वृत्त्यर्थो वा समवायो वृत्तिसमवायः । वृत्तिप्रयोजनो वा समवायो वृत्तिसमवायः । का पुनर्वृत्तिः ? शास्त्रप्रवृत्तिः । अथ कः समवायः ? वर्णानामानुपूव्येण सन्निवेशः । अथ क उपदेशः ? उच्चारणम् । कुत एतत् ? दिशिरुच्चारणक्रियः । उच्चार्य हि वर्णनाह—उपदिष्टा इमे वर्णा इति ।
  • अनुबन्धकरणार्थश्च— अनुबन्धकरणार्थश्च वर्णानामुपदेशः—अनुबन्धानासङ्क्ष्यामीति । न ह्यनुपदिश्य वर्णाननुबन्धाः शक्या आसङ्क्तुम् । स एष वर्णानामुपदेशो वृत्ति