भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ७१ *इष्टबुद्ध्यर्थश्च— इष्टबुद्ध्यर्थश्च वर्णानामुपदेशः—‘इष्टान्वर्णान्भोत्स्यामहे’ इति । न ह्यनुपदिश्य वर्णानिष्टा वर्णाः शक्या विज्ञातुम् । प्रदीपः—वृत्तिसमवायार्थ इति । लाघवेन शास्त्रप्रवृत्त्यर्थ इत्यर्थः । धर्मनियम- वत्समासः । वृत्त्यर्थ इति । शास्त्रप्रवृत्तिप्रत्यासन्नत्वं समवायस्य दर्शयति । इग्यण इत्यादी हि यथासंख्यशास्त्रं वर्णसंनिवेशमात्रादेवावतिष्ठते । वृत्तिप्रयोजन इति । पारंपर्येण शास्त्रप्रवृत्तावस्थातृत्वम् । सति हि समवाये इत्संज्ञा । तत आदिरन्त्येनेति [प्रत्याहार ] । ततो ङ्लोप इत्यादि शास्त्रप्रवृत्तिः । प्रत्याहारार्थमिति । प्रत्याहार- शब्देनाणादिकाः संज्ञा उच्यन्ते । इष्टबुद्ध्यर्थश्चेति । सति ह्युपदेशे कलादिदोषरहिता ये वर्णा निर्दिष्टास्तथैव प्रयोक्तव्या इत्युक्तं भवति । अनुवाद—अब वर्णों का उपदेश किसलिए है ? “वृत्तिसमवाय के लिये उपदेश है”— वर्णों का उपदेश वृत्तिसमवाय के लिए है । यह वृत्तिसमवाय क्या है ? वृत्ति के लिए समवाय वृत्तिसमवाय है। वृत्त्यर्थ (वृत्ति का हेतु) समवाय वृत्तिसमवाय है । वृत्ति का प्रयोजक समवाय वृत्तिसमवाय है । फिर वृत्ति क्या है ? शास्त्र में प्रवृत्ति (वृत्ति है) । अब समवाय क्या है ? वर्णों का पूर्वापरसन्निवेश । अब उपदेश क्या है ? उच्चारण । यह कहाँ से ? दिश् धातु उच्चारणार्थक है । (वर्णों का ) उच्चारण करते ही (श्राचार्य) कहता है—‘इन वर्णों का उपदेश कर दिया गया है ।’ “अनुबन्ध करने के लिए”— अनुबन्ध करने के लिए भी वर्णों का उपदेश है । (आचार्य की प्रतिज्ञा है कि) मैं अनुबन्धों को लगाऊँगा । वर्णों का उपदेश किये बिना अनुबन्धों को नहीं लगाया जा सकता । यह वर्णों का उपदेश वृत्तिसमवाय के लिए है और अनुबन्ध करने के लिए भी । वृत्तिसमवाय और अनुबन्धकरण प्रत्याहार के लिए है । प्रत्याहार (शास्त्र की) प्रवृत्ति के लिए है । “इष्ट बोध के लिए”—