व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 86, कुल 96 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ महाभाष्यम् वर्णों के इष्ट बोध के लिए भी वर्णों का उपदेश है।—"हम इष्ट वर्णों का बोध करेंगे।" वर्णों का उपदेश किये बिना इष्ट वर्णों का ज्ञान नहीं हो सकता। उषा—व्याकरण का उद्देश्य वर्णों के साधुत्व का प्रतिपादन करना है, परन्तु वर्णोपदेश से किसी भी शब्द का साधुत्व प्रतिपादित नहीं होता। अत एव माहेश्वर वर्णसमाम्नाय का उपदेश किसलिए किया गया यह प्रश्न उपस्थापित किया गया है। "वृत्तये समवायः" से अभिप्राय है—"लाघवेन शास्त्रप्रवृत्तये," अर्थात् लाघव से शास्त्र में प्रवृत्ति हो सके, यही वर्ण समाम्नाय का प्रयोजन है। वर्ण- समाम्नाय करने पर अच् आदि संज्ञाओं की प्राप्ति हो सकेगी। ततश्च लाघवेन शब्दानुशासन। 'इ, उ, ऋ, लृ के स्थान पर य्, व्, र्, ल् हों" ऐसा विस्तृत व्याख्यान करने के स्थान पर "इको यणचि" इतना मात्र कह देने से ही शास्त्र-प्रवृत्ति हो सकती है। अत एव द्वितीय विग्रह उपस्थित किया गया है—'वृत्त्यर्थो वा समवायः, वृत्ति- समवायः।' "इग्यणः सम्प्रसारणम्" इत्यादि स्थलों में यथासंख्य प्रतीति भी सुलभ हो पायेगी। 'ण्' आदि की इत्संज्ञा करके प्रत्याहार सिद्धि की जाती है। यह भी लाघव से शास्त्रप्रवृत्ति के लिए उपयोगी है। "वृत्तिप्रयोजनो वा समवायः" का यही अभिप्राय है। वर्णोपदेश का दूसरा प्रयोजन अनुबन्ध लगाना है। अनुबन्धों को लगाकर ही वर्णसमुदाय का उपपादन किया जा सकता है। इस प्रकार से वर्णोपदेश के दो प्रयोजन हुए—१. वृत्तिसमवाय और २. अनुबन्धकरण। वृत्तिसमवाय और अनुबन्धकरण का प्रयोजन प्रत्याहारों का निर्माण करना है। "प्रत्याह्रियन्ते वर्णा अस्मिन्" इस व्युत्पत्ति से प्रत्याहार शब्द अण् आदि का वाचक है। अणादि की सिद्धि से लाघवेन शास्त्रप्रवृत्ति सम्भव हो पाती है। अतः परम्परया वर्णों का उपदेश शास्त्रप्रवृत्ति के लिए ही है। वर्णोपदेश का एक अन्य प्रयोजन इष्ट वर्णों का बोध कराना भी है। स्पष्ट उपदेश कर देने पर कलादि दोषों से युक्त वर्णों का ग्रहण नहीं होगा, क्योंकि उच्चारण करके इनका सही स्वरूप बतला दिया गया है। शास्त्रप्रवृत्ति में सहायकभूत मात्र होने के कारण इसका शास्त्र से बहिर्भूतत्व भी सूचित होता है। अत एव "वृद्धिरादैच्" सूत्र की व्याख्या में आदि में पढ़े गये 'वृद्धि' शब्द का प्रयोजन मङ्गलार्थक सिद्ध हो सकेगा। मूलम्—* इष्टबुद्ध्यर्थश्चेति चेदुदात्तानुदात्तस्वरितानुनासिकदीर्घप्लुताना- मप्युपदेशः—