भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ७३ इष्टसिद्ध्यर्थश्चेति चेदुदात्तानुदात्तस्वरितानुनासिकदीर्घप्लुतानामप्युपदेशः कर्तव्यः । एवं गुणा अपि हि वर्णा इष्यन्ते ।

  • आकृत्युपदेशात्सिद्धम्— अवणाकृतिरुपदिष्टा सर्वमवर्णकुलं ग्रहीष्यति । तथैवणाकृतिः । तथोवर्णा- कृतिः । प्रदीपः—एकश्रुत्या हि सूत्राणां पाठात्सर्वेषामुदात्तादीनामुपदेशः कर्तव्य इत्याह—इष्टबुद्ध्यर्थश्चेति चेदिति । आकृत्युपदेशादिति । उपात्तोऽपि विशेषो नान्तरीयकतयाज्जातिप्राधान्यविवक्षायां न विवक्ष्यत इत्यर्थः । अनुवाद—"और इष्टबुद्ध्यर्थ होने पर उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, अनुनासिक, दीर्घ और प्लुतों का भी उपदेश"— (वर्णों के) इष्ट बोध (को यदि वर्णोपदेश का प्रयोजन माना जाये तो) उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, अनुनासिक, दीर्घ और प्लुतों का भी उपदेश करना चाहिए । क्योंकि इस प्रकार के भी वर्ण इष्ट हैं । "जातिपरक उपदेश से सिद्ध"— 'अ' वर्ण की आकृति का उपदेश सारे 'अ' वर्णों (उदात्त, अनुदात्त आदि) का ग्रहण करायेगा । इसी प्रकार से इत्व जाति । इसी प्रकार से उत्व जाति । उषा—प्रस्तुत अवतरण में वर्णोपदेश के 'इष्टबुद्ध्यर्थ' प्रयोजन पर आक्षेप किया गया है । पूर्वपक्षी का कहना है कि वर्णोपदेश में केवल ह्रस्व अचों का ही उपदेश किया गया है । परन्तु शास्त्रीय प्रक्रिया में इसके उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, दीर्घ, प्लुत, अनुनासिक आदि सभी रूप आवश्यक हैं । अतः इनका भी वर्णोपदेश में उपदेश किया जाना चाहिए था । परन्तु सिद्धान्ती का मत है कि वर्ण की आकृति अपने से सम्बद्ध अन्य सभी रूपों का ग्रहण करवायेगी । अवर्ण का उच्चारण उदात्तानुदात्तादि सभी रूपों का प्रतिनिधित्व करता है । अत एव जहाँ वर्ण के अन्य रूपों का ग्रहण इष्ट नहीं होता, ऐसे स्थलों के लिए "तपरस्तत्कालस्य" इत्यादि सूत्र बनाये गये हैं । मूलम्—आकृत्युपदेशात्सिद्धमिति चेत्संवृतादीनां प्रतिषेधः— आकृत्युपदेशात्सिद्धमिति चेत्संवृतादीनां प्रतिषेधो वक्तव्यः । के पुनः संवृतादयः ? संवृतः कलो ध्मात एणीकृतोऽम्बूकृतोऽर्द्धको ग्रस्तौ निरस्तः प्रगीत उपगीतः ष्विण्णो रोमश इति । अपर आह— ग्रस्तं निरस्तमवलम्बितं निर्हतमम्बूकृतं ध्मातमथो विकम्पितम् । सन्दष्टमेणीकृतमर्धकं द्रुतं विकीर्णमेताः स्वरदोषभावनाः ॥ इति ।