व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ७३ इष्टसिद्ध्यर्थश्चेति चेदुदात्तानुदात्तस्वरितानुनासिकदीर्घप्लुतानामप्युपदेशः कर्तव्यः । एवं गुणा अपि हि वर्णा इष्यन्ते ।
- आकृत्युपदेशात्सिद्धम्— अवणाकृतिरुपदिष्टा सर्वमवर्णकुलं ग्रहीष्यति । तथैवणाकृतिः । तथोवर्णा- कृतिः । प्रदीपः—एकश्रुत्या हि सूत्राणां पाठात्सर्वेषामुदात्तादीनामुपदेशः कर्तव्य इत्याह—इष्टबुद्ध्यर्थश्चेति चेदिति । आकृत्युपदेशादिति । उपात्तोऽपि विशेषो नान्तरीयकतयाज्जातिप्राधान्यविवक्षायां न विवक्ष्यत इत्यर्थः । अनुवाद—"और इष्टबुद्ध्यर्थ होने पर उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, अनुनासिक, दीर्घ और प्लुतों का भी उपदेश"— (वर्णों के) इष्ट बोध (को यदि वर्णोपदेश का प्रयोजन माना जाये तो) उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, अनुनासिक, दीर्घ और प्लुतों का भी उपदेश करना चाहिए । क्योंकि इस प्रकार के भी वर्ण इष्ट हैं । "जातिपरक उपदेश से सिद्ध"— 'अ' वर्ण की आकृति का उपदेश सारे 'अ' वर्णों (उदात्त, अनुदात्त आदि) का ग्रहण करायेगा । इसी प्रकार से इत्व जाति । इसी प्रकार से उत्व जाति । उषा—प्रस्तुत अवतरण में वर्णोपदेश के 'इष्टबुद्ध्यर्थ' प्रयोजन पर आक्षेप किया गया है । पूर्वपक्षी का कहना है कि वर्णोपदेश में केवल ह्रस्व अचों का ही उपदेश किया गया है । परन्तु शास्त्रीय प्रक्रिया में इसके उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, दीर्घ, प्लुत, अनुनासिक आदि सभी रूप आवश्यक हैं । अतः इनका भी वर्णोपदेश में उपदेश किया जाना चाहिए था । परन्तु सिद्धान्ती का मत है कि वर्ण की आकृति अपने से सम्बद्ध अन्य सभी रूपों का ग्रहण करवायेगी । अवर्ण का उच्चारण उदात्तानुदात्तादि सभी रूपों का प्रतिनिधित्व करता है । अत एव जहाँ वर्ण के अन्य रूपों का ग्रहण इष्ट नहीं होता, ऐसे स्थलों के लिए "तपरस्तत्कालस्य" इत्यादि सूत्र बनाये गये हैं । मूलम्—आकृत्युपदेशात्सिद्धमिति चेत्संवृतादीनां प्रतिषेधः— आकृत्युपदेशात्सिद्धमिति चेत्संवृतादीनां प्रतिषेधो वक्तव्यः । के पुनः संवृतादयः ? संवृतः कलो ध्मात एणीकृतोऽम्बूकृतोऽर्द्धको ग्रस्तौ निरस्तः प्रगीत उपगीतः ष्विण्णो रोमश इति । अपर आह— ग्रस्तं निरस्तमवलम्बितं निर्हतमम्बूकृतं ध्मातमथो विकम्पितम् । सन्दष्टमेणीकृतमर्धकं द्रुतं विकीर्णमेताः स्वरदोषभावनाः ॥ इति ।
७४ महाभाष्यम् अतोऽन्ये व्यञ्जनदोषाः । नैष दोषः ।
- गर्गादिबिदादिपाठात्संवृतादीनां प्रतिषेधः— गर्गादिबिदादिपाठात्संवृतादीनां निवृत्तिर्भविष्यति । प्रदीपः—संवृतादीनामिति । आकारादीनां संवृतत्वं दोषः । न त्वकारस्य संवृतगुणत्वात् । तत्र सन्ध्यक्षरेषु विवृततमेषूच्चार्येषु संवृतत्वं दोषः । कलः— स्थानान्तरनिष्पन्नः काकलिकत्वेन प्रसिद्धः । ध्मातः—श्वासभूयिष्ठतया ह्रस्वोऽपि दीर्घ इव लक्ष्यते । एणीकृतः—अविशिष्टः किमयमकारोऽथौकार इति यत्र सन्देहः । अम्बूकृतः—यो व्यक्तोऽप्यन्तर्मुखमिव श्रूयते । अर्धकः—दीर्घोऽपि ह्रस्व इव । ग्रस्तः—जिह्वामूले निगृहीतः, अव्यक्त इत्यपरे । निरस्तः—निष्ठुरः । प्रगीतः— सामवदुच्चारितः । उपगीतः—समीपवर्णान्तरगीत्यानुरक्तः । क्ष्विण्णः—कम्पमान इव । रोमशः—गम्भीरः । अवलम्बितः—वर्णान्तरसंभिन्नः । निर्हतः—रूक्षः । सन्दष्टः—वर्धित इव । विकीर्णः—वर्णान्तरे प्रसृतः, एकोऽप्यनेकनिर्भासीत्यपरे । स्वरदोषभावना इति । स्वरदोषगोत्राणि । अनन्ता हि दोषा अशक्तिप्रमादकृताः । अनुवाद—आकृत्युपदेश से ही सिद्धि हो तो संवृतादि का प्रतिषेध— आकृत्युपदेश से ही यदि (इष्ट) सिद्धि हो सके तो संवृतादि (दोषों) का प्रतिषेध करना होगा । वे संवृतादि दोष कौन से हैं ? संवृत, कल, ध्मात, एणीकृत, अम्बूकृत, अर्धक, ग्रस्त, निरस्त, प्रगीत, क्ष्विण्ण और रोमश इत्यादि । अन्य (व्यक्ति) के अनुसार (वे दोष निम्नलिखित हैं) — “ग्रस्त, निरस्त, अवलम्बित, निर्हत, अम्बूकृत, ध्मात, विकम्पित, सन्दष्ट, एणीकृत, अर्धक, द्रुत और विकीर्ण, ये स्वर के दोष हैं ।” इसके अतिरिक्त व्यञ्जनों के दोष भी हैं । यह कोई दोष नहीं है । —गर्गादि बिदादि पाठ से संवृतादि का प्रतिषेध— गर्गादि बिदादि (गण) पाठों से संवृत आदि (दोषों) की निवृत्ति हो जायेगी । उषा—अवर्ण और इवर्ण की आकृति यदि दीर्घ, प्लुत, अनुनासिक आदि सभी आकृति रूपों का ग्रहण करवा सकती है तो इससे संवृतादि दोषों का भी ग्रहण होने लगेगा । परन्तु दोषों में परिगणित होने के कारण शास्त्रीय मर्यादाओं में उनका ग्रहण नही किया जा सकता, अतः उनका प्रतिषेध करने के लिए अलग से
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ७५ सूत्र बनाने पड़ेंगे। अतः आकृति रूप से उदात्तादि वर्णों का ग्रहण नहीं किया जा सकता। प्रमुख संवृतादि दोष निम्नलिखित हैं— संवृत—अकार के संवृत गुण वाला होने के कारण यह अन्य आकारादि स्वरों में दोष के रूप में परिगणित किया जाता है। इसके उच्चारण में मुख बन्द रहता है । कल—स्वर का अपने स्थान से च्युत होकर स्थानान्तर से उच्चरित होना 'कल' कहलाता है। इसे काकली भी कहते हैं । ध्मात—श्वासों की तीव्र गति के कारण जहाँ ह्रस्व भी दीर्घ के समान उच्चरित होना प्रतीत होता है । एणीकृत—'ओ' और 'औ' में जहाँ अन्तर स्पष्ट नहीं हो पाता, इन दोनों का समान साधारण सा उच्चारण किया जाता है । अम्बूकृत—व्यक्त होता हुआ भी जो स्पष्ट श्रुतिगोचर न हो, प्रत्युत मुख के अन्दर ही उच्चरित होता हुआ सा प्रतीत हो अर्धक—जो स्वर दीर्घ होता हुआ भी शीघ्रता से उच्चरित होने के कारण ह्रस्व सा प्रतीत हो । ग्रस्त—जो जिह्वामूल में ही गृहीत होकर रह जाये । अन्य शिक्षाविदों के अनुसार किसी भी अव्यक्त उच्चारण को ग्रस्त कह सकते हैं । निरस्त—स्वर का कठोर और कर्कश उच्चारण निरस्त कहलाता है । प्रगीत—गाकर उच्चारण किया गया स्वर । उपगीत—समीपस्थित दूसरे वर्ण के गीत से अनुरक्त । क्ष्विण्ण—कम्पमान स्वर ध्वनि । रोमश—गम्भीर अथवा गहन । अवलम्बित—वर्णान्तर के आश्रित हुआ-हुआ । निर्हत—रूखा । सन्दष्ट—बढ़ाकर उच्चारण किया हुआ स्वर । द्रुत—शीघ्रता से उच्चरित । विकीर्ण—दूसरे वर्ण से मिला हुआ अथवा एक होता हुआ भी जो स्वर अनेक रूप में प्रतिभासित हो । ये सभी दोष स्वरों से सम्बद्ध हैं । इसके अतिरिक्त कुछ व्यञ्जन दोष भी हैं, जैसे मूर्धन्य 'ष' का 'ख' के रूप में उच्चारण, इत्यादि । परन्तु सिद्धान्ती के अनुसार यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि इनकी निवृत्ति गर्गादि तथा विदादि गण पाठों से हो जाती है। क्योंकि आचार्य ने इन्हें शुद्ध ही
७६ महाभाष्यम् पढ़ा है, अतः यहाँ दोषों की शून्यता प्रतीत होती है। परन्तु इससे अन्य गार्ग्य आदि दोषों की निवृत्ति नहीं हो सकेगी। नागेश कैयट के इस विचार से सहमत नहीं। उनके अनुसार गर्गादि पाठ का प्रयोजन यञ् आदि प्रत्ययों से युक्त होकर गार्ग्य आदि शब्दों का साधुत्व प्रतिपादन करना है, कलादि दोषों की निवृत्ति इनसे नहीं हो सकती। मूलम्—अस्त्यन्यद् गर्गादिबिदादिपाठे प्रयोजनम् । किम् ? समुदायानां साधुत्वं यथा स्यादिति । एवं तर्ह्यष्टादशधा भिन्नां निवृत्तकलादिकामवर्णस्य प्रत्यापत्तिं वक्ष्यामि । सा तर्हि वक्तव्या ।
- लिङ्गार्था तु प्रत्यापत्तिः— लिङ्गार्था सा तर्हि भवति । तत्तर्हि वक्तव्यम् । यद्यप्येतदुच्यते, अथवैतर्हि अनेकमनुबन्धशतं नोच्चार्यमित्संज्ञा च न वक्तव्या, लोपश्च न वक्तव्यः। यदनुबन्धैः क्रियते तत्कलादिभिः करिष्यते । सिध्यत्येवम्, अपाणिनीयं तु भवति । प्रदीपः —अस्त्यन्यदिति । गर्ग इत्यादिनेव सन्निवेशेन गर्गादीनां साधुत्वं यथा स्याद् गार्ग्य इत्यादीनां मा भूत् । ततश्च तद्गतानामेवाकारादीनां दोषनिवृत्तिः कृता स्यात्, न तु समुदायान्तरस्थानाम् । यद्यपि प्रत्ययविध्यर्थो गर्गादीनां पाठस्तथापि प्रसङ्गात्समुदायसाधुत्वार्थोऽपि भवति । निवृत्तकलादिकामिति । अकारस्य संवृत- त्वात्निवृत्तसंवृतत्वादिकामिति नोक्तम् । अकारस्य निदर्शनार्थत्वात्सर्ववर्णानां शास्त्रान्ते प्रत्यापत्तिरित्यर्थः । यदनुबन्धैरिति । यथा स्वरितत्वमधिकारार्थमेवमात्मने- पदार्थं कलादिकं प्रतिज्ञाय कलादात्मनेपदमित्यादि करिष्यते न त्वनुदात्तङित इत्यादि । ननु चानुबन्धाभावे कथमणादिकाः संज्ञा उपपद्यन्ते आदिरन्त्येनेत्यत्राविः कलैः सहेत्युक्त्वा अ उ इत्यादिकाः संज्ञा करिष्यन्ते । स्वरसन्धिश्चासन्देहाय न करिष्यत इत्यदोषः । अनुवाद—गर्गादि बिदादि पाठ का (तो) अन्य ही प्रयोजन है । क्या ? जिससे (उन-उन) समुदायों का साधुत्व ज्ञान हो । तो फिर कलादि दोष रहित, अठारह प्रकार से भिन्न अवर्ण आदि की (शास्त्र के अन्त में) प्रत्यापत्ति की जायेगी । वह फिर कहनी होगी (अर्थात् गौरव दोष हो जायेगा) । “लिङ्ग के लिए वह प्रत्यापत्ति”—
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ७७ वह प्रत्यापत्ति लिङ्ग के लिए होगी । तो वह कहनी होगी । (इससे गौरव होगा) । यद्यपि यह कहनी होगी तथापि इससे अनेक अनुबन्धों को नहीं कहना होगा, इत्संज्ञा नहीं कहनी पड़ेगी, लोप नहीं बताना पड़ेगा । जो (कार्य) अनुबन्धों से किया जाता है वह कलादि दोषों से कर लिया जायेगा । ऐसा किया तो जा सकता है, परन्तु यह अपाणिनीय होगा । उ०—पूर्वपक्षी सिद्धान्ती के इस समाधान से सहमत नहीं है कि गर्गादि बिदादि गणपाठों से संवृतादि दोषों की निवृत्ति हो जाती है । उसके अनुसार इन गणपाठों का प्रयोजन गर्ग आदि शब्दों से यञ् प्रत्यय करके निष्पन्न गार्ग्य आदि समुदायों के साधुत्व का प्रतिपादन है, अतः ये कलादि दोषों की निवृत्ति नहीं कर सकते । सिद्धान्ती इसका समाधान करता हुआ कहता है कि शास्त्र के अन्त में "अ अ" सूत्र का निर्माण करके जिस प्रकार अवर्ण से इस दोष का निवारण किया गया है, उसी प्रकार से अन्य इ, उ आदि वर्णों के दोषों की भी निवृत्ति कर दी जायेगी । कैयट के अनुसार अवर्ण यहाँ निदर्शनभूत है, अर्थात् 'अ' के समान ही अन्य वर्णों का भी ग्रहण स्वयं कर लेना चाहिए । परन्तु नागेश के अनुसार इसका अर्थ यह है कि 'अ' की जिस प्रकार से दोषनिवृत्ति की गई है, उसी प्रकार से अन्य वर्णों की भी की जायेगी । परन्तु इससे गौरव दोष आ जायेगा, अतः पूर्वपक्षी इस समाधान को स्वीकार नहीं करता । एक अन्य समाधान के रूप में पतञ्जलि ने एक नया प्रयोग करने का प्रयास किया है । उसका अभिप्राय यह है कि अब धातु आदि से जो अनुबन्ध लगाने पड़ते हैं, उनके स्थान पर कलादि को लिङ्ग रूप से समझा जा सकता है । अब जिस प्रकार से ङित् और अनुदात्तेत् की आत्मनेपद संज्ञा होती है, इसके स्थान पर 'कल' दोष वाली धातु की आत्मनेपद संज्ञा हो जायेगी । स्वरितेत् और ञित् के स्थान पर 'ध्मात' दोष से कार्य निष्पन्न किया जायेगा । इससे अनुबन्ध लगाने, उनकी इत्संज्ञा करने और उसका लोप करने की सारी शास्त्रीय प्रक्रिया की बचत हो जायेगी, अतः लाघव से शास्त्र प्रतिपादन भी हो सकेगा । परन्तु इस प्रकार से शास्त्रप्रक्रिया के सिद्ध होने पर भी यह पद्धति अपाणिनीय हो जायेगी और अपाणिनीय समाधान को स्वीकार नहीं किया जा सकता । और फिर असाधु प्रतिपादन का दोष भी इससे शास्त्र में आ जायेगा । अतः सिद्धान्ती का यह मत भी पूर्वपक्षी को अस्वीकार्य है ।
७८ महाभाष्यम् मूलम् — यथान्यासमेवास्तु । ननु चोक्तम् — "आकृत्युपदेशात्सिद्धमिति चेत्संवृतादीनां प्रतिषेध इति ।" परिहृतमेतत् — "गर्गादिबिदादिपाठात्संवृतादीनां निवृत्तिर्भविष्यतीति । ननु चान्यद् गर्गादिबिदादिपाठे प्रयोजनम् । किम् ? समुदायानां साधुत्वं यथा स्यादिति । एवं तर्ह्युभयमनेन क्रियते—पाठश्चैव विशेष्यते, कलादयश्च निवर्त्यन्ते । कथं पुनरेकेन यत्नेनोभयं लभ्यम् ? लभ्यमित्याह । कथम् ? द्विर्गता अपि हेतवो भवन्ति । तद्यथा—आम्राश्च सिक्ताः पितरश्च प्रीणिता इति । तथा वाक्यानि द्विष्ठानि भवन्ति—श्वेतो धावति, अलम्बुसानां यातेति । प्रदीपः — उभयमिति । यथाभूता गर्गादिस्था अकारादयस्तथाभूता एव सर्वत्र प्रयोक्तव्या इति प्रतिपाद्यत इत्यर्थः । द्विर्गता इति । द्वावर्थौ गताः प्रयोजनद्वय- सम्पादका इत्यर्थः । तथा वाक्यान्त्यपीति । शब्दस्याप्यर्थवद् द्विगतत्वमित्यर्थः । अनुवाद — जैसे पहले कहा था । (आकृत्युपदेशात्सिद्धमिति) (वही) हो । और (हमारी ओर से) कहा गया था कि आकृत्युपदेश से ही यदि सिद्धि मानी जाये तो संवृतादि (दोषों में) प्रतिषेध करना होगा । इसका तो परिहार कर दिया गया था कि गर्गादि बिदादि पाठ से संवृतादि की निवृत्ति हो जायेगी । और जो गर्गादि बिदादि पाठ का तो अन्य ही प्रयोजन है । क्या ? जिससे (तत्तत्) समुदायों का साधुत्व हो । तो फिर दोनों ही (कार्य) उसके द्वारा किये जाते हैं—पाठ को विशिष्ट किया जाता है और कलादि दोष निवृत्त किये जाते हैं । एक ही यत्न से दोनों प्राप्तियाँ कैसे हो सकती हैं ? हो सकती हैं, ऐसा कहते हैं । कैसे ? द्विष्ठ हेतु भी होते हैं । जैसे कि (आम्रवृक्ष के नीचे पितृतर्पण करने से) आम भी सिक्त हो जाते हैं और पितृतर्पण भी हो जाता है । इसी से वाक्य भी द्विष्ठ होते हैं—"श्वेतो धावति" = (श्वेत गुण वाला दौड़ता है, कुत्ता यहां से दौड़ता है) ।"
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ७९ “अलम्बुसानां याता” (अलम्बुस) (देश को) जाने वाला, बुसों को प्राप्त करने वाला समर्थ है। उद्वा -- अन्य सम्भावनाओं पर विचार करने के अनन्तर सिद्धान्ती पुनः अपने पूर्व निरूपित पक्ष का आश्रय लेता है। अर्थात् अवर्णादि की आकृति अपने से सम्बद्ध अन्य आकृति रूपों का भी ग्रहण करवायेगी। इससे प्रसक्त होने वाले संवृतादि दोषों की निवृत्ति गर्गादि बिदादि गणपाठों से हो जायेगी। इन गणपाठों का अतिरिक्त प्रयोजन होने पर भी सिद्धान्त पक्ष में कोई दूषण उत्पन्न नहीं होता। एक ही यत्न से दो फलों की प्राप्ति लोक में देखी जाती है। आम्रवृक्ष के मूल में पितरों को जल प्रदान करने से आम्रसिंचन भी हो जाता है और पितृतर्पण भी। अर्थ की तरह से शब्दों में भी द्व्यर्थकता देखी जाती है। “श्वेतो धावति” उदाहरण में ‘श्वेत’ पद के दो प्रकार से अर्थ किये जा सकते हैं—(१) श्वेत गुण वाला और (२) श्वा + इतः इत्यादि; उसी प्रकार इन गणपाठों से समुदायों के साधुत्व का भी प्रतिपादन हो सकेगा और कलादि दोषों की निवृत्ति भी हो जायेगी। मूलम् — अथवा इदं तावदयं प्रष्टव्यः — “क्वेमे संवृतादयः श्रूयेरन्निति ।” आगमेषु । आगमाः शुद्धाः पठ्यन्ते । विकारेषु तर्हि । विकारा अपि शुद्धाः पठ्यन्ते । प्रत्ययेषु तर्हि । प्रत्यया अपि शुद्धाः पठ्यन्ते । धातुषु तर्हि । धातवोऽपि शुद्धाः पठ्यन्ते । प्रातिपदिकेषु तर्हि । प्रातिपदिकान्यपि शुद्धानि पठ्यन्ते । यानि तर्ह्यग्रहणानि प्रातिपदिकानि । एतेषामपि स्वरवर्णानुपूर्वीज्ञानार्थ उपदेशः कर्त्तव्यः । शशः षष इति मा भूत् । पलाश इति मा भूत् । मञ्चको मञ्जक इति मा भूत् ।— आगमाश्च विकाराश्च प्रत्ययाः सह धातुभिः । उच्चार्यन्ते ततस्तेषु नेमे प्राप्ताः कलादयः ॥ (इति श्रीमद्भगवत्पतञ्जलिविरचिते महाभाष्ये प्रथमाध्यायस्य प्रथमपादे प्रथमाह्निकम्) प्रदीपः — अथवेति । केवलानां वर्णानां लोके प्रयोगाभावाद्धात्वादीनां च शुद्धानां पाठात् तत्स्थत्वाच्च वर्णानां न कश्चिद्दोषः । यानि तर्हीति । डित्थादीनि ।
८० महाभाष्यम् एतेषामपीति । शिष्टप्रयुक्तत्वेनोणादीनां पृषोदरादीनां च साधुत्वाभ्यनुज्ञानात् सर्वेषामत्र सङ्ग्रहः सिद्धः । इत्युपाध्यायजैयटपुत्रकैयटकृते महाभाष्यप्रदीपे प्रथमाध्यायस्य प्रथमपादे प्रथममाह्निकम् अनुवाद—अथवा या इससे (संवृतादि दोषों की प्रसक्ति बताने वाले से) यह पूछना चाहिए कि ये संवृत आदि कहाँ सुने जाते हैं । आगमों में । आगम तो शुद्ध पढ़े गये हैं । तो विकारों में । विकार भी शुद्ध पढ़े गये हैं । तो प्रत्ययों में । प्रत्यय भी शुद्ध पढ़े गये हैं । तो धातुओं में । धातुएँ भी शुद्ध पढ़ी गई हैं । तो प्रातिपदिकों में । प्रातिपदिक भी शुद्ध पढ़े गये हैं । तो प्रातिपदिकों का उपदेश नहीं किया गया है । इनका भी स्वर वर्णानुपूर्वी के ज्ञान के लिए उपदेश करना चाहिए (जिससे) शश (के स्थान पर) षष न हो जाये, पलाश (के स्थान पर) पलाष न हो जाये, मञ्चक (के स्थान पर) मञ्जक न हो जाये । आगम, आदेश और प्रत्ययों सहित धातुएं शुद्ध पढ़ी गई हैं, अतः (इनमें) इन कलादि (दोषों) का प्रसङ्ग नहीं है । (इस प्रकार श्रीमान् भगवान् पतञ्जलि विरचित महाकाव्य में प्रथमाध्याय के प्रथम पाद में प्रथम आह्निक का अनुवाद समाप्त हुआ) उषा—"छिन्ने मूले नैव पत्रं न शाखा ।" इस समस्त विवेचन के अनन्तर भाष्यकार ने पूर्वपक्षी के मूल सिद्धान्त पर ही प्रहार किया है ! सिद्धान्ती के अनुसार आगम, आदेश, प्रत्यय, धातु आदि सभी का शुद्ध उच्चारण किया गया है । अतः इनमें कहीं भी कलादि दोषों की प्रसक्ति प्राप्त नहीं होती । अतः इन दोषों की सम्भावना करना ही व्यर्थ है । एवं च सिद्धान्ती के द्वारा पूर्वप्रतिपादित इष्टबुद्ध्यर्थ वर्णोपदेश का पक्ष सिद्ध होता है । (इस प्रकार श्रीमान् भगवान् पतञ्जलि विरचित महाभाष्य में प्रथमाध्याय के प्रथम पाद में प्रथम आह्निक पर उषा व्याख्या समाप्त हुई)
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