याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ याज्ञवल्क्यस्मृतिः येन क्षत्रियेण चोत्पादिताः, करण्यां ब्राह्मणेन क्षत्रियेण वैश्येन चोत्पादिताः उत्तरे अनुलोमजाः । एवमन्यत्राप्यूहनीयम् । एतदधरोत्तरं पूर्ववदसत्स्रदिति बोद्धव्यम् ॥ ९६ ॥ भाषा—मूर्द्धावसिक्त आदि जातियों का सातवें या पाँचवें जन्म में (अर्थात् किसी जाति की कन्या अपनी से बड़ी जाति के पुरुष के साथ ब्याही जाय, उससे उत्पन्न कन्या भी उससे बड़ी जाति में ब्याही जाय, इस प्रकार सातवीं पीढ़ी में) जाति का उत्कर्ष होता है । आपत्काल में दूसरी निम्न जाति का कर्म स्वीकार करने पर, आपत्काल समाप्त होने पर भी जो उस वृत्ति को नहीं छोड़ता उसकी जाति पाँचवीं या सातवीं पीढ़ी में वही हो जाती है (जिसका वह कर्म करता वही होता है) इन वर्ण संकरों में निम्न प्रतिलोमज होते हैं और उत्तम अनुलोमज ॥ ९६ ॥ इति वर्णजातिविवेकप्रकरणम् । गृहस्थधर्मप्रकरणम् श्रौतस्मार्तानि कर्माणि अग्निसोध्यानि दर्शयिष्यन् कस्मिन्नग्नौ किं कर्तव्य- मित्याह— कर्म स्मार्तं विवाहाग्नौ कुर्वीतप्रत्यहं गृही । दायकालाहृते वापि श्रौतं वैतानिकाग्निषु ॥ ९७ ॥ स्मृत्युक्तं वैश्वदेवादिंकं कर्म, लौकिकं च यत्प्रतिदिनं पाकलक्षणं तदपि, गृहस्थो विवाहाग्नौ विवाहसंस्कृते कुर्वीत । दायकाले विभागकाल आहृते वा 'वैश्यकुलादग्निमानीय' इत्यादिनाक्तसंस्कारसंस्कृते । 'अपि'शब्दात्प्रेते वा गृहपता- वाहृते संस्कृते एव । ततश्च कालत्रयातिक्रमे प्रायश्चित्तीयते । श्रुत्युक्तमग्निहोत्रादिकं कर्म वैतानिकाग्निषु आहवनीयादिषु कुर्वीत ॥ ९७ ॥ भाषा—गृहस्थ प्रतिदिन (बलिवैश्वदेव आदि) स्मार्त कर्म विवाहाग्नि में या विभाजन के समय आहित अग्नि में करे तथा (अग्निहोत्र आदि) श्रौत कर्म आहवनीय आदि अग्नि में करे ॥ ९७ ॥ गृहस्थधर्मानाह— शरीरचिन्तां निर्वर्त्य कृतशौचविधिर्द्विजः । प्रातःसंध्यामुपासीत दन्तधावनपूर्वकम् ॥ ९८ ॥२ १. अहृत आहितः । २. तिक्रमेण प्राय ।