भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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६६ याज्ञवल्क्यस्मृतिः श्वक्रोष्ट्रगर्दभोल्लूक सामवाणार्तनिःस्वने । अमेध्यशव शूदdryन्त्यश्मशान पतितान्तिके ॥ १४८ ॥ श्वा कुक्कुरः, क्रोष्टा शृगालः, गर्दभो रासभः, उलूको घूकः साम सामानि, वाणो वंशः, आर्तो दुःखितः, एषां श्वादीनां निःस्वने तावत्कालमनध्यायः । एवं वीणादिनिःस्वनेऽपि । - 'वेणुवीणाभेरीमृदङ्गगन्त्र्यार्तशब्देषु' (१६।७) इति गौतमवचनात् । गन्त्री शकटम् । अमेध्यादीनां सन्निधाने तावत्कालिकोऽन- ध्यायः ॥ १४८ ॥ भाषा - कुत्ता, सियार, गदहा, उल्लू, सामगान, बांस और दुःखित व्यक्ति का स्वर सुनाई पड़ने पर तथा अपवित्र वस्तु शव, शूद्र, अन्त्यज, श्मशान या पतित व्यक्ति के निकट होने पर (उस स्थिति की अवधि तक अनध्याय होता है) ॥ १४८ ॥ देशेऽशुचावात्मनि स विद्युत्स्तनितसंप्लवे । भुक्त्वाऽर्द्रपाणिरम्भोन्तरर्धरात्रेऽतिमारुते ॥ १४९ ॥ अशुचौ देशेऽशुचावात्मनि च । तथा विद्युत्स्तनितसंप्लवे पुनः पुनर्विद्योत- मानायां विद्युति, स्तनितसंप्लवे प्रहरद्वयं पुनः पुनर्मेघघोषे तावत्कालिकोऽनध्यायः । भुक्त्वाऽर्द्रपाणिर्नाधीयीत । जलमध्ये च । अर्धरात्रे महानिशाख्ये मध्यमप्रहरद्वये, अतिमारुतेऽहन्यपि तावत्कालं नाधीयीत ॥ १४९ ॥ भाषा-अपवित्र स्थान पर, स्वयं अशुद्ध होने पर, बार-बार बिजली की चमक होने, मेघ के बार-बार गर्जन के समय, भोजन के उपरान्त, गीले हाथ रहने पर, जल के भीतर, आधी रात को और तीव्र वायु चलने पर उतने समय तक (अध्ययन नहीं करना चाहिए) ॥ १४९ ॥ १पांसुप्रवर्षे दिग्दाहे संध्यानीहारभीतिषु । धावतः पूतिगन्धे च शिष्टे च गृहमागते ॥ १५० ॥ औत्पातिके रजोवर्षे, दिग्दाहे यत्र ज्वलिता इव दिशो दृश्यन्ते । संध्ययोः, नीहारे धूमिकायां, भीतिषु चौरराजादिकृतासु तावत्कालमनध्यायः । धावतस्त्व- रितं गच्छतोऽनध्यायः । पूतिगन्धे कुत्सितगन्धे अमेध्यमद्यादिगन्धे । शिष्टे च श्रोत्रियादौ गृहं प्राप्ते तदनुज्ञावध्यनध्यायः ॥ १५० ॥ भाषा - धूल भरी आँधी उठने पर, दिशाओं के जलती हुई सी दिखाई पड़ने पर, दोनों सन्ध्याओं के समय धुंधले में और (चोर या राजा से) भय होने पर (तत्काल अनध्याय होता है)। दौड़ते समय, अपवित्र वस्तु की १. पांसुवर्षे दिशां दाहे पांसुवर्षे च दिग्दाहे । २. गृहमागते ।