भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

आचाराध्यायः १५१ (दान आदि से) सम्मान करे और विपरीत आचरण वालों को (अपराध के अनुसार) दण्ड देवे। जो घूस लेकर जीविका चलाते हैं उनका धन छीन कर उन्हें कंगाल) बनाकर) देश से निकाल देना चाहिए। श्रोत्रिय (वेदाध्यय- नरत ब्राह्मणों) को दान, सम्मान और सत्कार के साथ सदा ही (अपने राज्य में) बसाना चाहिए ॥ ३३८-३३९॥ अन्यायेन नृपो राष्ट्रात्स्वकोशं १योऽभिवर्धयेत् । सोऽचिराद्विगतश्रीको नाशमेति सबान्धवः ॥ ३४० ॥ योऽसौ राजा स्वराष्ट्रादन्यायेन द्रव्यमादाय स्वकोशं अभिवर्धयेत् सोऽचिराच्छीघ्रमेव विगतश्रीको विनष्टलक्ष्मीको बन्धुभिः सह नाशं प्राप्नोति ॥ ३४० ॥ भाषा—जो राजा अन्यायपूर्वक अपनी प्रजा से (धन लेकर) अपने कोश की वृद्धि करता है वह शीघ्र ही श्रीहीन होकर बान्धवों सहित नष्ट हो जाता है ॥ ३४० ॥ प्रजापीडनसन्तापात्समुद्भूतो हुताशनः । राज्ञः कुलं श्रियं प्राणांश्चाऽदग्ध्वा न निवर्तते ॥ ३४१ ॥ प्रजानां तस्करादिकृतपीडनेन यः सन्तापस्तस्मादुद्भूतो हुताशन इव सन्तापकारित्वादपुण्यराशिः 'हुताशन'शब्देनोच्यते । स राज्ञः कुलं श्रियं प्राणांश्चादग्ध्वा नाशमनीत्वा न निवर्तते नोपशाम्यति ॥ ३४१ ॥ भाषा—प्रजापीडन के संताप की अग्नि राजा के कुल, शोभा और प्राणों को नष्ट किये बिना शान्त नहीं होती ॥ ३४१ ॥ य एव नृपतेर्धर्मः स्वराष्ट्रपरिपालने । तमेव ३कृत्स्नमाप्नोति परराष्ट्रं वशं नयन् ॥ ३४२ ॥ न्यायतः स्वराष्ट्रपरिपालने राज्ञो यो धर्मस्तं सकलं वक्ष्यमाणन्यायेन परराष्ट्रं वशं नयन् आत्मसात्कुर्वन्नाप्नोति धर्मषड्भागं च ॥ ३४२ ॥ भाषा—न्यायपूर्वक अपने राज्य का पालन करने में राजा का जो धर्म होता है वही धर्म वह दूसरे राष्ट्र को वश में करने पर पाता है ॥ ३४२ ॥ ४यस्मिन्देशे य आचारो व्यवहारः कुलस्थितिः । तथैव परिपाल्योऽसौ यदा वशमुपागतः ॥ ३४३ ॥ १. योऽभिरक्षयेत् । २. प्राणानदग्ध्वा, प्राणाञ्चादग्ध्वा । ३. कृत्स्नू । ४. किं तु यस्मिन्य ।