याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 431, कुल 782 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यवहाराध्यायः ३७५ विप्रदुष्टां स्त्रियं चैव पुरुषघ्नीमगर्भिणीम् । सेतुभेदकरीं चाप्सु शिलां बद्ध्वा प्रवेशयेत् ॥ २७८ ॥ अपि च, विशेषेण प्रदुष्टा विप्रदुष्टा, भ्रूणघ्नी स्वगर्भपातिनी च । या च पुरुषस्य हन्त्री सेतूनां भेत्त्री च,-एता गर्भरहिताः स्त्रीर्गले शिलां बध्वा भप्सु प्रवेशयेत् यथा न प्लवन्ते ॥ २७८ ॥ भाषा-(गर्भपात करने आदि के कारण) जो स्त्री अत्यन्त दुष्टा हो, और पुरुष की हत्या करने वाली हो, जिसने सेतु (पुल या बांध) तोड़ा हो उसके गर्भवती न होने पर उसके गले में शिला बांधकर पानी में डाल देवे ॥ २७८ ॥ विषाग्निदां पतिगुरुनिजापत्यप्रमापणीम् । विकर्णकरनासौष्ठीं कृत्वा गोभिः प्रमापयेत् ॥ २७९ ॥ किंच, 'अगर्भिणीम्' इत्यनुवर्तते । या च परवधार्थमन्नपानादिषु विषं ददाति क्षिपति । या च दाहार्थं ग्रामादिष्वग्निं ददाति, तथा या च निजपति- गुरुंपत्यानि मारयति तां विच्छिन्नकर्णकरनासौष्ठीं कृत्वा भदान्तैर्दुष्टबलीवर्दैः प्रवाह्य मारयेत् । स्तेयप्रकरणे यदेतत्साहसिकस्य दण्डविधानं तत्प्रासङ्गिकमिति मन्तव्यम् ॥ २७९ ॥ भाषा-जिस स्त्री ने दूसरे को मारने के लिये अन्न में विष दिया हो, घर जलाने के लिए अग्नि दिया हो, जिसने पति, गुरु या अपनी सन्तान का वध किया हो (यदि वह गर्भिणी न हो तो) उसके कान, हाथ, नाक और ओठ काटकर उसे बैलों से मरवा डाले ॥ २७९ ॥ अविज्ञातकर्तृके हनने हन्तृज्ञानोपायमाह- अविज्ञातहतस्याशु कलहं सुतबान्धवाः । प्रष्टव्या योषितश्चास्य परपुंसि रताः पृथक् ॥ २८० ॥ ३अविज्ञातहतस्याविज्ञातपुरुषेण घातितस्य संबन्धिनः, सुताः प्रत्यासन्नबान्ध- वाश्च 'केनास्य कलहो जातः' इति कलहमाशु प्रष्टव्याः । तथा मृतस्य संबन्धिन्त्यो योषितो याश्च परपुंसि रता व्यभिचारिण्यस्ता अपि प्रष्टव्याः ॥ २८० ॥ भाषा-जिस व्यक्ति के हत्यारे का पता न हो उसके पुत्रों और बान्धवों से उसके कलह के विषय में पूछना चाहिए (अर्थात् इस प्रकार पूछना चाहिए कि इस मृत व्यक्ति का किसके साथ बैर था); उसकी व्यभिचारिणी स्त्रियों से भी अलग-अलग पूछना चाहिए ॥ २८० ॥ १. भ्रूणपुरुष । २. प्रवासयेत् । ३. अविज्ञातपुरुषेण ।