याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 524, कुल 782 में से
संदर्भ में पढ़ें४६८ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
भाषा—जो वह पुरोडाश आदि द्रव्य को देवताओं के निमित्त अर्पित करने पर उत्तम (सम्पूर्ण जगत् के जन्म का बीज होने से उत्कृष्टतम) उत्पन्न होता है वह रस देवताओं को तृप्त करके और अभिलषित फल से यजमान को युक्त करके, वायु द्वारा प्रेरित हो कर चन्द्रमण्डल में पहुँचता है; वहाँ से वह सूर्य के मण्डल में पहुँचता है, जो, ऋक्, यजुस् और साम तीन वेदों का ही रूप होता है। यह सूर्य अपने मण्डल से उत्तम अमृत (वृष्टि) छोड़ता है, जो सम्पूर्ण चर और अचर भूतों के जन्म का कारण होता है। उस वृष्टि से उत्पन्न अन्न द्वारा पुनः यज्ञ होता है; पुनः अन्न होता है और तब फिर यज्ञ होता है, इस प्रकार यह अनादि और अनन्त चक्र घूमता रहता है ॥ १२१-१२४ ॥
ननु यद्यात्मनः संसरणमनाद्यन्तं तर्ह्यनिर्मुक्तिप्रसङ्ग इत्यत आह— अनादिरात्मा संभूतिर्विद्यते नान्तरात्मनः । समवायी तु पुरुषो मोहेच्छाद्वेषकर्मजः ॥ १२५ ॥ यद्यप्यात्मनोऽनादित्वात्सम्भूतिर्न विद्यते अन्तरात्मनः शरीरव्यापिनः तथापि पुरुषः शरीरेण समवायी भवति भोगायतने सुखदुःखात्मकं भोग्यजात- मुपभुङ्क्ते इत्येवंभूतेन संबन्धेन संबन्धी भवत्येव । स च समवायो मोहेच्छा- द्वेषजनितकर्मनिर्मेयो नतु निसर्गजातः । तस्य कार्यत्वेन विनाशोपपत्तेर्न निर्मुक्तिः ॥ १२५ ॥
भाषा—यद्यपि आत्मा के अनादि होने से शरीरव्यापी अन्तरात्मा की उत्पत्ति नहीं होती, तथापि पुरुष (आत्मा) शरीर से समवायी होता है (सुख-दुःख आदि का भोग करता है) और यह समवाय मोह, इच्छा और द्वेष जनित कर्मों से उत्पन्न होता है (नैसर्गिक नहीं होता) ॥ १२५ ॥
आत्मनो जगज्जन्मेत्युक्तं तत्प्रपञ्चयितुमाह— सहस्रात्मा मया यो व आदिदेव उदाहृतः । मुखबाहूरुपज्जाः स्युस्तस्य वर्णा यथाक्रमम् ॥ १२६ ॥ पृथिवी पादतस्तस्य शिरसो¹ द्यौरजायत । नस्तः प्राणा दिशः श्रोत्रात्स्पर्शाद्वायुर्मुखाच्छिखी ॥ १२७॥ मनसश्चन्द्रमा जातश्चक्षुषश्च दिवाकरः । जघनादन्तरिक्षं च जगच्च सचराचरम् ॥ १२८ ॥ योऽसौ सकलजीवात्मकतया प्रपञ्चात्मकतया च सहस्रात्मा बहुरूपस्तथा सकलजगद्धेतुतया आदिदेवो मया युष्माकमुदाहृतः तस्य वदनभुजसक्थिचरण-
१. शिरस्तो ।