भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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भाषा—जिस प्रकार एक ही दीपक में तेल से भींगी हुई अनेक बत्तियों से कई लौ एक साथ निकलती हैं और वायु का प्रबल झोंका उन सबको एक साथ ही बुझा देता है उसी प्रकार अकाल में भी अनेक मनुष्यों का एक साथ ही प्राण-नाश हो जाता है ॥ १६५ ॥ मोक्षमार्गमाह— अनन्ता रश्मयस्तस्य दीपवद्यः स्थितो हृदि । सितासिताः कंबुरूपाः कपिला नीललोहिताः ॥ १६६ ॥ ऊर्ध्वमेकः स्थितस्तेषां यो भित्त्वा सूर्यमण्डलम् । ब्रह्मलोकमतिक्रम्य तेन याति परां गतिम् ॥ १६७ ॥ योऽसौ हृदि प्रदीपवत्स्थितो जीवस्तस्यानन्ता रश्मयो नाड्यः सुखदुःख- हेतुभूताः 'द्वासप्ततिसहस्राणि' ( प्रा० १०८ ) इत्यादिनाक्ताः सितासितकर्बु- रादिरूपाः सर्वतः स्थितास्तेषामेको रश्मिरूर्ध्वं व्यवस्थितः योऽसौ मार्तण्डमण्डलं निर्भिद्य हिरण्यगर्भनिलयं चातिक्रम्य वर्तते तेन जीवः परां गतिमपुनरावृत्ति- लक्षणां प्राप्नोति ॥ १६६-१६७ ॥ भाषा—हृदय में दीपक के रूप में स्थित जीव की अनन्त रश्मियाँ ( सुख-दुःख की हेतुभूत नाडियाँ ) श्वेत, कृष्ण, कबरी, कपिला, नीली और लाल वर्ण की होती हैं। उनमें एक नाड़ी ऊपर की ओर स्थित है जो सूर्यमण्डल को भेदकर ब्रह्मलोक के भी पार पहुँचती है; इसके द्वारा ही जीव परम गति प्राप्त करता है ॥ १६६-१६७ ॥ स्वर्गमार्गमाह— यदस्यान्यद्रश्मिशतमूर्ध्वमेव व्यवस्थितम् । तेन देवशरीराणि सधामानि प्रपद्यते ॥ १६८ ॥ यदस्यात्मनो मुक्तिमार्गभूताद्रश्मेरन्यद्रश्मिशतमूर्ध्वाकारमेव व्यवस्थितं तेन सुरशरीराणि तैजसानि सुखैकभोगाधिकरणानि सधामानि कनकरजत- :रत्नरचितामरपुरसहितानि प्रपद्यते ॥ १६८ ॥ भाषा—इस आत्मा के मुक्ति का मार्गभूत नाड़ियों से भिन्न ऊपर की ओर जाने वाली सौ नाड़ियाँ हैं; उनके द्वारा ही देवताओं के लोक और शरीर प्राप्त होते हैं ॥ १६८ ॥ संसरणमार्गमाह— येऽनेकरूपाश्चाधस्ताद्रश्मयोऽस्य मृदुप्रभाः । इह कर्मोपभोगाय तैः संसरति सोऽवशः ॥ १६९ ॥ १. कर्बुनीलाः कपिलाः पीतलोहिताः । बभ्रुनीलाः । २. रश्मयश्च । ३. मितप्रभाः ।