याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 568, कुल 782 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] ५१२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
पातकमेव च । प्रासङ्गिकं चोपपापमित्येवं पञ्चको गणः ॥' इति ॥ ननूपपातका- दीनां कथं पातकत्वं ? पतनहेतुत्वाभावात् । यदि तेषामपि पतनहेतुत्वं तर्हि 'मातृपितृयोनिसंबद्धाङ्गः' इत्यादिपरिगणनममर्थकम् । अथैवमुच्येत—यद्यपि महापातकतत्समेष्विव सद्यःपातित्यहेतुत्वं नास्ति, तथाप्यभ्यासापेक्षया पातित्य- हेतुत्वमविरुद्धम् ; 'निन्दितकर्माभ्यासी' ( २।११ ) इति गौतमवचनादिति । मैवम् ; अभ्यासस्यानिरूप्यमाणत्वात् द्विः शतकृत्वो वेति तत्राविशेषेऽङ्गीक्रिय- माणे योऽपि द्विर्दिवा स्वपिति, यः शतकृत्वो वा गोवधं करोति, तयोरविशेषेण पातित्यं स्यात् । अत्रोच्यते, यत्रार्थवादे प्रत्यवायविशेषः श्रूयते, प्रायश्चित्तबहुत्वं वा तस्मिन्निन्दितकर्मणि यावत्यभ्यस्यमाने महापातकतुल्यत्वं भवति-तावान- भ्यासः पातित्यहेतुः । दिवास्वप्नादौ तु सहस्रकृत्वोऽप्यभ्यस्यमाने न महापातक- तुल्यत्वं भवतीति न तत्र पातित्यम् , अतो युक्तमुपपातकादेरभ्यासापेक्षया पत- नहेतुत्वम् ॥ २३४-२४२ ॥
भाषा—गौ का वध, व्रात्यता (पतितसावित्री), स्तेय (चोरी), ऋण न लौटाना, (अधिकारी होने पर भी) अग्निहोत्र न करना, न बेचने योग्य वस्तु (नमक आदि) बेचना, सहोदर जेठे भाई के अविवाहित रहते स्वयं विवाह करना, वेतन लेने वाले अध्यापक से पढ़ना तथा वेतन लेकर पढ़ाना, परस्त्री का भोग, सहोदर छोटे भाई के विवाहित होने पर स्वयं अविवाहित रहना, नमक बनाना, वार्धुष्य (निषिद्ध व्याज लेना), स्त्री (ब्राह्मणी और रजस्वला के अतिरिक्त) का वध, शूद्र का वध, (अदीक्षित) वैश्य और क्षत्रिय का वध, निषिद्ध धन का उपार्जन, नास्तिकता, व्रतलोप (ब्रह्मचारी होकर स्त्रीप्रसङ्ग आदि), पुत्रों को बेचना, (व्रीहि आदि) धान्य, (कांसा, सीसा आदि) कुप्य और पशुओं की चोरी, (जाति और कर्म से दूषित शूद्र और व्रात्य जैसे) अयाज्य व्यक्तियों के यहाँ यज्ञ कराना, निर्दोष पिता, माता, पुत्र का त्याग करना, तालाब और उद्यान, उपवन आदि बेचना, किसी कन्या का संदूषण (अङ्गुली से उसकी योनि का विदारण), परिविन्दक (जिसने सहोदर जेठे भाई के अविवाहित रहते अपना विवाह किया हो) का यज्ञ कराना, (गुरु के अतिरिक्त अन्य के साथ) कुटिलता, व्रत (स्नातक व्रत) का लोप, केवल अपने ही लिए भोजन आदि बनाना, सुरा पीने वाली स्त्री का उपभोग, स्वाध्याय का त्याग, (श्रौत, स्मार्त) अग्नियों का त्याग पुत्र का त्याग (संस्कार न करना), चाचा, मामा आदि बान्धवों का त्याग, (धन होते हुए भी उनका पालन न करना), भोजनार्थ ईंधन के लिए (अग्निहोत्र के लिए नहीं) हरे वृक्ष को काटना, स्त्री की हिंसा और औषध से जीविका