भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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६५६ याज्ञवल्क्यस्मृतिः ब्राह्मविवाह का परिष्कृत लक्षण वीरमित्रोदय में इस प्रकार दिया गया है— “निरुपाधिककन्यादानपूर्वकः सवर्णपरिणयो ब्राह्मो विवाहः । उपाध्ययश्च- ऋत्विक्स्वद्रव्यग्रहणसमयबन्धादयः” । श्लो० ५९—ऋत्विजे—दक्षिणासु दीयमानासु कन्यादानम्—ऐसा शूल- पाणि का परिष्कार है । गोद्वयम्—यह उपलक्षण है । अत एव मनु ने कहा है:— एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः । कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः स उच्यते ॥ श्लो० ६०—धर्ममिति—अत्र धर्मशब्दः अर्थकामयोरप्युपलक्षणम् स्मृ- त्यन्तरानुरोधात्—यह बालम्भट्टीकार का मत है । श्लो० ६१—युद्धहरणात्—अत एव मनु का कथन है— हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च क्रोशन्तीं रुदतीं गृहात् । प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते ॥ कन्यकाच्छलात्—इसका स्पष्टीकरण मनु में हुआ है :— सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति । स पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ इन अष्टविध विवाहों के विषय में जात्यनुकूल व्यवस्था का निर्देश मनु ने इस प्रकार किया है :— षडानुपूर्व्या विप्रस्य क्षत्रस्य चतुरोऽवरान् । विट्शूद्रयोस्तु तानेव विद्याद्धर्म्यानराक्षसान् ॥ ब्राह्मण के लिए ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर एवं गान्धर्व; क्षत्रिय के लिए, आसुर, गान्धर्व, राक्षस तथा पैशाच; वैश्य एवं शूद्र के लिए आसुर, गान्धर्व और पैशाच विवाह धर्म्य हैं । विशेष विवरण के लिए निम्न-लिखित मनु-वचन द्रष्टव्य है :— चतुरो ब्राह्मणस्याद्यान् प्रशस्तान् कवयो विदुः । राक्षसं क्षत्रियस्यैकमासुरं वैश्यशूद्रयोः ॥ इत्यादि ॥ श्लो० ६२—क्षत्रिया शरम् = ब्राह्मणवरहस्तधृत शर । प्रतोद = वर- हस्तस्थ यष्टि । शूद्रा के विषय में मनु का कथन है— वसनस्य दशा ग्राह्या शूद्रयोत्कृष्ट-वेदने ॥ किन्तु स्वयं याज्ञवल्क्य ने शूद्रा के विषय में कुछ नहीं कहा है, कारण शूद्रा-ग्रहण ब्राह्मण के लिए याज्ञवल्क्य का कथमपि सम्मत नहीं है— यदुच्यते द्विजातीनां शूद्राद्दारोपसंग्रहः । नैतन्मम मतं यस्मात्तत्रायं जायते स्वयम् ॥ या० स्मृ० १।५६॥