भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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टिप्पणी (नोट्स) ६५७ श्लो० ६४—कन्या कुर्यात् स्वयंवरम्—यह अधिकार तीन ऋतुकाल के अतिक्रमण के बाद ही होता, ऐसा विष्णु का कथन है— ऋतुत्रयमतीत्यैव कन्या कुर्यात् स्वयंवरम् । ऋतुत्रये व्यतीते तु प्रभुः कन्या स्वयंवरे ॥ परन्तु यदि पिता आदि के जीवित रहने पर भी कन्या का अभिभावक प्रमादादि के कारण उचित समय पर कन्यादान नहीं करे, वैसी स्थिति में बौधायन का सिद्धान्त निम्न-लिखित है— त्रीणि वर्षाण्यृतुमती कांक्षेत पितृशासनम् । ततश्चतुर्थे वर्षे तु विन्देत सदृशं पतिम् ॥ अविद्यमाने सदृशे गुणहीनमपि श्रयेत् ॥ इस प्रसङ्ग में नारद का निम्न-निर्दिष्ट वचन भी ध्येय है— यदा तु नैव कश्चित् स्यात् कन्या राजानमाव्रजेत् । अनुज्ञया वरं तस्य परीक्ष्य वरयेत् स्वयम् ॥ श्लो० ६५—सकृत्प्रदीयते कन्या—यही मनु का भी मत है— सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते । सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् ॥ श्लो० ६६—यदि वर भी अपना दोष पहले स्पष्ट नहीं कर देता है तो उसे भी दण्ड मिलना चाहिए । वर-दण्ड की व्यवस्था नारद के अनुसार निम्न-लिखित है— गूह्यित्वाऽऽत्मनो दोषान् विन्दन्नन्ययमर्हति । वरस्य दत्त-नाशश्च भवेत् स्त्री च निवर्त्तते ॥ अन्यय = दण्ड । कहीं-कहीं द्वितीय पाद में “विन्दते द्विगुणो दमः” पाठान्तर है । श्लो० ६८-६९—यहाँ मनुस्मृति में विधवा के लिए विशेष बतलाया गया है— विधवायां नियुक्तस्तु घृताक्तो वाग्यतो निशि । एकमुत्पादयेत्पुत्रं न द्वितीयं कथञ्चन ॥ श्लो० ७०--याज्ञवल्क्य का यह कथन सवर्ण-व्यभिचारिणी के लिए है । हीनवर्ण-व्यभिचारिणी के लिए बृहस्पति ने निम्नलिखित व्यवस्था की है— हीनवर्णोपभुक्ता या त्याज्या वध्या च सा भवेत् ॥