याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६५८ याज्ञवल्क्यस्मृतिः श्लो० ७१—इस प्रसंग में बृहस्पति का वचन अवधेय है— रोमोद्गवे शशी भुङ्क्ते गन्धर्वः कुचदर्शने । अनलस्तु रजोयोगे स्त्रियो भुङ्क्ते तु नान्यथा ॥ श्लो० ७३—यहाँ द्वितीय विवाह की अवधि का निरूपण मनु ने इस प्रकार किया है— बन्ध्याऽष्टमेऽधिवेद्याब्दे दशमे तु मृत-प्रजा । एकादशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ॥ अप्रियवादिनी के साथ अपुत्रा का अध्याहार करना आवश्यक है । श्लो० ७९—युग्मासु संविशेत्—युग्मरात्रिगमन से पुत्र होता है—ऐसा मनु का कथन है :— युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु । तस्माद् युग्मासु पुत्रार्थी संविशेदार्त्तवे स्त्रियम् ॥ आद्याश्चतस्रस्तु वर्जयेत्—यद्यपि शंख ने पति के लिए चतुर्थ दिन में ही पत्नी की शुद्धि मानी है— शुद्धा भर्तुश्चतुर्थेऽह्नि अशुद्धा दैवपित्र्ययोः । तथापि यह शुद्धि सेवा के लिए न कि सम्भोग के लिए भी । अतएव मनु का भी कथन है— “तासामाद्याश्चतस्रस्तु निन्दिताः” । श्लो० ८९—यह नियम सवर्णा स्त्री के विषय में है । अत एव मनु का कथन है— एवं वृत्तां सवर्णां स्त्रीं द्विजातिः पूर्वमारिणीम् । दाहयेदग्निहोत्रेण यज्ञपात्रैश्च धर्मवित् । अत एव निम्नलिखित वचन को असवर्णा स्त्री के विषय में समझना चाहिए— यो दहेदग्निहोत्रेण स्वेन भार्यां कथञ्चन । स स्त्री सम्पद्यते तेन भार्या चास्य पुमान् भवेत् ॥ श्लो० ९१—पारशवोऽपि वा—पारशव की व्युत्पत्ति मनु ने निम्न निर्दिष्ट पद्य में की है— यं ब्राह्मणस्तु शूद्रायां कामादुत्पादयेत् सुतम् । स पारयन्नेव शवस्तस्मात् पारशवः स्मृतः ॥