याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६६० याज्ञवल्क्यस्मृतिः सायमपि—अतिथि को सायंकाल में भोजन नहीं देने पर पाप का निदर्शन विष्णुपुराण में किया गया है— दिवाऽतिथौ तु विमुखे गते यत्पातकं नृप । तदेवाष्ट-गुणं प्रोक्तं सूर्योढे विमुखे गते ॥ यदि ब्राह्मण के गृह में क्षत्रिय आदि उपस्थित हों तो उनके विषय में मनु के निम्नलिखित वचन ध्येय हैं :— न ब्राह्मणस्य त्वतिथिर्गृहे राजन्य उच्यते । वैश्यशूद्रौ सखा चैव ज्ञातयो गुरुरेव च ॥ यदि त्वतिथिधर्मेण क्षत्रियो गृहमाव्रजेत् । भुक्तवत्सु च विप्रेषु कामं तमपि भोजयेत् ॥ वैश्यशूद्रावपि प्राप्तौ कुटुम्बेऽतिथिधर्मिणौ । भोजयेत्सह भृत्यैस्तानानुशंस्यं प्रयोजयन् ॥ इतरानपि सख्यादीन् सम्प्रीत्या गृहमागतान् । प्रकुर्यान्नं यथाशक्ति भोजयेत्सह भार्यया ॥ श्लो० ११०—अर्ध्याः—अर्घ्यपद मधुपर्क का उपलक्षक है । अत एव मनु का कथन है— राजर्त्विक्-स्नातक-गुरून् प्रियश्वशुरमातुलान् । अर्हयेन्मधुपर्केण परिसम्वत्सरात्पुनः ॥ परिसम्वत्सरात् = सम्वत्सर बीतने के बाद । ऋत्विजः—यह पद पूज्यमात्र का उपलक्षण है। एवञ्च तात्पर्य यह है कि एक वर्ष के बीतने के बाद स्ना- तक आदि का मधुपर्क से पूजन करना चाहिये । यदि सम्वत्सर-मध्य में ही यज्ञ उपस्थित हो तो सम्वत्सर-मध्य में भी वे सम्मानाहं हैं । परन्तु यदि सम्वत्सर के बीच कोई यज्ञ नहीं उपस्थित हो तो सम्वत्सर के बीत जाने के बाद यज्ञ उपस्थित हो या नहीं हो, उनका सम्मान अवश्य हीं करना चाहिये । यहाँ मनु ने राजा तथा स्नातक के पूजन में विशेष बतलाया है कि यदि सम्वत्सर-मध्य में यज्ञ की उपस्थिति नहीं होती है, तो सम्वत्सर के बीत जाने पर भी राजा तथा स्नातक की पूजा यज्ञ में ही करनी चाहिए न कि केवल सम्वत्सर के अतिक्रमण से ही— राजा च श्रोत्रियश्चैव यज्ञकर्मण्युपस्थितौ । मधुपर्केण सम्पूज्यौ न त्वयज्ञ इति स्थितिः ॥ अतः राजा तथा स्नातक का यज्ञ में और शेष का सम्वत्सर-मध्य में यज्ञ- काल में, सम्वत्सर के बीतने पर यज्ञाऽयज्ञा-साधारण पूजन करना चाहिए ।