भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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टिप्पणी (नोट्स) ६६१ श्लो० ११२—अति-भोजनम्—अत एव मनु ने कहा है— अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चाति-भोजनम् । अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात् तत्परिवर्जयेत् ॥ श्लो० ११३—आसीमान्तम्—यहाँ अपरार्कव्याख्या में तीन प्रकार की सीमा बतलाई गई है—सीमा त्रिविधा—वास्तु-सीमा, ग्राम-सीमा, क्षेत्र-सीमा च; सा चानुवजनीयगुणापेक्षया व्यवस्थापनीया। श्लो० ११६—वार्धके—मनु का कथन है—शूद्रोपि दशमीं गतः । ९० वर्ष की अवस्था के बाद शूद्र भी प्रतिष्ठित होता है। परन्तु गौतम ने ८० वर्ष को ही परमावधि मानी है । श्लो० १२७—कुशूलेति—द्वादशदिनोचित-धान्याधारा कोषी कुशूलः, षडिनोचित-धान्याधारा कुम्भी—शूलपाणिः । श्लो० १३९—प्रेतधूमम्—बालम्भट्टीकार ने प्रेतधूम का अर्थ बालातप किया है। इन्होंने अपने मत के समर्थन में निम्न लिखित मनु के वचन को ध्यान में रक्खा था—ऐसा प्रतीत होता है— बालातपः प्रेतधूमो वर्ज्यं भिन्नं तथाऽऽसनम् । परन्तु यहाँ बालातप एवम् प्रेतधूम मे उद्देश्य-विधेय-भाव की कल्पना करना अमूलक है। यहाँ तो बालातप एवं प्रेतधूम दोनो हीं स्वतन्त्र पदार्थ हैं जिनको मनु ने वर्ज्य माना है। अतः प्रेतधूम का अर्थ दह्यमान-शव-धूम हीं करना चाहिए । श्लो० १४०—न राज्ञः प्रतिगृह्णीयात्—इस प्रसङ्ग में मनु के निम्न- लिखित वचनों को देखना चाहिए— यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति लुब्धस्योच्छास्त्रवर्त्तिनः । स पर्यायेण यातीमान् नरकानेक-विंशतिम् ॥ तामिस्रमन्धतामिस्रं महारौरवरौरवौ । नरकं कालसूत्रं च महानरकमेव च ॥ सञ्जीवनं महावीचिं तपनं संप्रतापनम् । संघातं च सकाकोलं कुड्मलं प्रतिमूर्तकम् ॥ लोहशङ्कुमृषीजं च पन्थानं शाल्मलिंनदीम् । असिपत्रवनं चैव लोहदारकमेव च ॥ एतद्विदन्तो विद्वांसो ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः । न राज्ञः प्रतिगृह्णन्ति प्रेत्य श्रेयोऽभिकांक्षिणः ॥