भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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६७६ याज्ञवल्क्यस्मृतिः बद्ध्वा स्वगृह्मानीय ताडनाद्यैरुपक्रमैः । ऋणिको दाप्यते यत्र बलात्कारः प्रकीर्तितः ॥ ( बलं = भोजननिषेधादिना पीडनम्—अपरार्कः ) पूर्व-पूर्व उपाय के अभाव में उत्तरोत्तर का अनुसरण करना चाहिए । श्लो० ४३—अत एव बृहस्पति का भी मत है :— ऋणिनं निर्धनं कर्म गृह्मानीय कारयेत् । शौण्डिकाद्यम् , ब्राह्मणस्तु दापनीयः शनैः शनैः ॥ किन्तु यदि उत्तमर्ण अधमर्ण से पूर्वानुक्त अनुचितकर्म करवाता है तो अधमर्ण ऋणमुक्त हो जाता है और उत्तमर्ण दण्ड्य हो जाता है । अत एव कात्यायन का कथन है :— यदि ह्याद्भावनाविष्टमशुभं कर्म कारयेत् । प्राप्नुयात्साहसं पूर्वमृणान्मुच्येत चर्णिकः ॥ श्लो० ४४—वर्धते न ततः परम्—अत एव संवर्त्त का वचन है :— न वृद्धिः स्त्रीधने लाभे निक्षेपे च तथा स्थिते । सन्दिग्धे प्रातिभाव्ये च यदि न स्यात् स्वयङ्कृता ॥ स्थिते = मध्यस्थ के यहाँ जमा किये हुए धन की । यदि न स्यात् स्वयङ्कृता का तात्पर्य है कि यदि अधमर्ण वृद्धि की प्रतिज्ञा नहीं की हो तो वृद्धि नहीं होती, अन्यथा उपर्युक्त धन में भी वृद्धि होती है । श्लो० ४५—अत एव नारद का भी वचन है :— पितृव्येणाविभक्तेन भ्रात्रा वा यदृणं कृतम् । मात्रा वा यत्कुटुम्बार्थे दद्युः तत्सर्वमृक्थिनः ॥ श्लो० ४६—न पुत्रेण कृतं पिता—इसका अपवाद बृहस्पति ने बत- लाया है :— ऋणं पुत्रकृतं पित्रा शोध्यं यदनुमोदितम् । सुतस्नेहेन वा दद्याद् नान्यथा दातुमर्हति ॥ यहाँ पुत्र पद उपलक्षण है योषिदादि का भी । अतः भार्या आदि के द्वारा कृत ऋण भी स्वानुमोदित होने पर समाधेय है । श्लो० ४७—तथैव—यह प्रातिभाव्य तथा क्रोधकृत ऋण का भी उपलक्षण है । प्रातिभाव्य का निर्देश मनु ने किया है :— प्रातिभाव्यं वृथा दानमाक्षिकं सौरिकं च यत् ।