याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८० याज्ञवल्क्यस्मृतिः
श्लो० ९९—इस प्रसङ्ग में बृहस्पति के निम्नलिखित वचन अव- धेय हैं :— संख्या रश्मिरजोमूला मनुना समुदाहृता । कार्षापणान्ता सा दिव्ये नियोज्या विनयेत्तथा ॥ विषं सहस्रेऽपहृते पादोने तु हुताशनः । त्रिपादोने च सलिलमर्धे देयो घटः सदा ॥ चतुःशताभियोगे च दातव्यस्तप्तमाषकः । त्रिंशते तण्डुला देयाः कोशश्चैव तदर्थके ॥ शते हृतेऽपहृते च दातव्यं धर्मशोधनम् । गोचौरस्य प्रदातव्यः सभ्यैः फालः प्रयत्नतः ॥ एका संख्या निकृष्टानां मध्यानां द्विगुणा स्मृता । चतुर्गुणोत्तमानां च कल्पनीया परीक्षकैः ॥ निकृष्टानां = जाति, गुण तथा कर्म से निकृष्ट । श्लो० १००—१०२—प्रतिमानसमीभूतो रेखां कृत्वाऽवतारितः । इसका तात्पर्य है कि दिव्यकर्त्ता के तोलने के समय तुला की रज्जु की लम्बाई जितनी रहे उसको परीक्षा के समय यथावत् समझने के लिए रज्जु की उस बिन्दु (जहाँ तुला संलग्न रहे) पर रेखा डाल देनी चाहिए । यह विधि अधिवास के दिन की है । अधिवास के दिन एक बार दिव्यकर्त्ता को तौलना चाहिए । और तौलने के बाद दिव्यकर्त्ता तुला से उतर कर तुला को अभिमन्त्रित करे । अतः 'रेखां कृत्वाऽवतारितः' से लेकर 'तुलामित्यभिमन्त्रयेत्' तक का कार्य अधिवास के दिन का है—यह ध्यान रखना चाहिए । इसके बाद पर दिन में अभिमन्त्रित तुला पर दिव्यकर्त्ता को तौलना चाहिए । तौलने के बाद निर्णय के प्रकार का निर्देश निम्न-लिखित श्लोक में किया गया है :— तुलितो यदि वर्धेत विशुद्धः स्यान्न संशयः । समो वा हीयमानो वा न विशुद्धो भवेन्नरः ॥ यद्यपि मिताक्षरा में यह श्लोक पितामह के नाम से उद्धृत है तथापि वीरमित्रोदयकार के अनुसार यह मूल याज्ञवल्क्य-स्मृति का ही माना जाता है । विचार करने पर यही उचित भी लगता है कि यह मूल-ग्रन्थ का है । यदि इसे मूल श्लोक नहीं माना जाय तो मूल-में न्यूनता रह जाती है, क्योंकि तुला-परीक्षा के निर्णय का प्रकार अस्पष्ट ही रह जाता है । अतः इस श्लोक को मूल-ग्रन्थ का ही अङ्ग मानना उचित है। भूमिकान्तर्गत