याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंटिप्पणी (नोट्स) ६८१ श्लोक संख्या विवरण के प्रसङ्ग में इस का सङ्केत नहीं हो सका । अतः पाठक से क्षमा-याचना अपेक्षित है । श्लो० १०३—अश्वत्थपत्राणि—यहाँ अपरार्क में उद्धृत निम्न-लिखित स्मृति पर ध्यान देना अपेक्षित है :— पितामहः— सप्त पिप्पलपत्राणि शमीपत्राण्यथाक्षतान् । हस्तयोर्निक्षिपेत्तत्र तन्तुसूत्रस्य सप्त वै ॥ वीरमित्रोदय में कुछ और भी विशेष बात बतलाई गई है :— “अत्र, “शम्यक्षतन्तथा दूर्वां दत्त्वा पत्रेषु विन्यसेत्” इति विशेषः स्मृत्य- न्तरेऽभिहितः” । श्लो० १०६—मण्डलानि—गोमय के द्वारा निर्मित होना चाहिए । श्लो० १०७—मुक्त्वाग्निम्—यहाँ शूलपाणि का कथन अवश्य- ध्येय है :— “गत्वा तत्तु तृणे क्षिपेत्” इति कालिकापुराणवचनात् । अग्निवर्णं लोहपिण्डं तृणचये क्षिप्त्वा...... ॥ अदग्धः—करभिन्ने अङ्गे दग्धोऽपि शुद्ध एव ( वीरमित्रोदयः ) श्लो० ११४—इच्छया—यह केवल पिता के द्वारा अर्जित धन में ही, यदि पितामह आदि का अर्जित हो तो पिता की अनिच्छा से भी विभाग हो सकता है । अतएव बृहस्पति का कथन है :— क्रमागते गृहक्षेत्रे पितापुत्राः समांशिनः ॥ श्लो० ११५—पत्न्यः = पुत्रशून्याः—शूलपाणिः । श्लो० ११६—अनीहमानस्य—यः पुत्रः धनार्जनसमर्थतया पितृधनं नेच्छति, यो वा धनार्जनसमर्थोऽपि शठतया धनस्यार्जनरक्षणानुकूलां चेष्टां न कुरुते तस्मै किञ्चिदसारं दत्त्वा पित्रा पृथक् क्रिया कार्या—(अपरार्कः) यह नियम पिता की सम्पत्ति के विभाजन में नहीं होता अपि तु सभी भाई जो कृषि आदि के द्वारा धनार्जन करते हैं उस धन में आलस्यवशात् कार्यविमुख भ्राता अंशहर नहीं हो सकता है । इसी प्रकार विद्या आदि से स्वतन्त्र धन को अर्जित करने की शक्ति से सम्पन्न भ्राता को भी पहले ही पृथक् कर देना चाहिए । इसका कारण यह है कि जो विद्या से अर्जित धन होता है उसमें दूसरे का अंश नहीं होता है एवञ्च यदि सभी साथ रहें तो विद्या से अर्जन करने वाले को समूह में कृषि के द्वारा अर्जित धन में अंश मिल जाता है