भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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६८८ याज्ञवल्क्यस्मृतिः श्लो० २३९–साक्षिणाम्—जो व्यक्ति विरोध का समाधान करने में समर्थ होकर भी ईर्ष्या-द्वेषादि के कारण समाधान नहीं करता है अपि तु पिता-पुत्र के विवाद में साक्षित्व को स्वीकार करता है, उस वर्ग के लोगों के लिए ‘त्रिपणो दमः’ कहा गया है । यह नियम भी मध्यम अपराध के लिए है । यदि अपराध अधिक हो तो निम्न-लिखित विष्णु के वचन के अनुसार दण्ड करना चाहिए :— पितृ-पुत्र-विरोधसाक्षिणां दशपणो दण्डः । यस्तयोरन्तरे तस्योत्तमसाहसो दण्डः ॥ श्लो० २४१—नाणकपरीक्षी = टङ्कक-परीक्षक । यहाँ निम्न-निर्दिष्ट बृहस्पति-वचन को देखना चाहिए :— अल्पमूल्यं तु संस्कृत्य नयन्ति बहुमूल्यताम् । स्त्रीबालकान् वञ्चयन्ति दण्ड्यास्तेऽर्थानुरूपतः ॥ हेम-मुक्ता-प्रवालाद्यं कृत्रिमं कुर्वते तु ये । क्रेत्रे मूल्यं प्रदाप्यास्ते राज्ञा तद्द्विगुणं दमम् ॥ श्लो० २४२–तिर्यक्षु = गो आदि पशुओं के विषय में । श्लो० २४९–कारुः = तन्तुवाय । सम्भूय = राजा की अनुमति के विना ही अपने वर्ग में मिलकर । श्लो० २५२–सद्यः—इससे यह स्पष्ट है कि विलम्ब होने पर यह नियम नहीं है । इसी का प्रपञ्च अग्रिम श्लोक में किया गया है, जिससे अव्यवस्था नहीं हो जाय । श्लो० २५४—विष्णु के अनुसार विक्रीयासम्प्रदान में दण्ड भी निर्दिष्ट है :— गृहीतमूल्यं यः पण्यं क्रेतुनैव दद्यात् तस्यासौ सोदयं दाप्यः राज्ञा च पणशतं दण्ड्यः ॥ श्लो० २५५–अत एव नारद का भी कथन है :— दीयमानं न गृह्णाति क्रीतं पण्यं च यः क्रयी । स एवास्य भवेद्दोषो विक्रेतुर्योऽप्रयच्छतः ॥ श्लो० २५९–यहाँ समवाय मे प्रतिषिद्ध तथा विहित व्यक्तियों का निर्देश बृहस्पति ने किया है :— अशक्तालसरोगातंमन्दभाग्य-निराश्रयैः । वाणिज्याद्याः सहैतैस्तुः न कर्त्तव्या बुधैः क्रियाः ॥