भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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टिप्पणी (नोट्स) ६४५ "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति••••••आनन्दा- द्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते••••••" इत्यादि ॥ श्लो० १२६-१२८-इन श्लोकों में पुरुषसूक्त के अर्थ का ही संग्रथन किया गया है। श्लो० २१५-श्वित्री = श्वेतकुष्ठवान् । श्लो० २१८-कर्म-विपाक का विवरण मनुस्मृति के बाहरवें अध्याय में भी देखना चाहिए। श्लो० २२६-व्यवहार्यस्तु-यहाँ मनु का मत निम्न-लिखित है :- अकामतः कृते पापे प्रायश्चित्तं विदुर्बुधाः । कामकारकृतेऽप्याहुरेके श्रुतिनिदर्शनात् ॥ श्लो० २२८-इनमें से वेदनिन्दा, सुहृद्वध तथा अधीतनाशन को मनु ने सुरापान-सम माना है :- ब्रह्मोझता वेदनिन्दा कौटसाक्ष्यं सुहृद्वधः । गर्हितानाद्ययोर्जग्धिः सुरापानसमानि षट् ॥ श्लो० २२९-जैह्म्यमुत्कर्षे च वचोऽनृतम्-इन दोनों को मनु ने ब्रह्महत्या-सम माना है :- अनृतं च समुत्कर्षे राजगामि च पैशुनम् । गुरोश्थालीकनिर्वन्धः समानि ब्रह्महत्यया ॥ श्लो० २३४-२४२-इनका निर्देश मनुस्मृति के अध्याय-११, श्लोक- ५९-६६ तक किया गया है। श्लो० २५३-यह प्रायश्चित्त कामकार कृत सुरापान के लिए है। अत एव बृहस्पति का कथन है :- सुरापाने कामकृते ज्वलन्तीं तां विनिःक्षिपेत् । मुखे तया स निर्दग्धो मृतः शुद्धिमवाप्नुयात् ॥ श्लो० २५४-यह प्रायश्चित्त अबुद्धिपूर्वक सुरापान के लिए है, पूर्व प्रायश्चित्त का विकल्प नहीं है। इसका कारण यह है कि तुल्यता रहने पर ही विकल्प हो सकता है। यहाँ पर पूर्वोक्त प्रायश्चित्त तथा इस प्रायश्चित्त में तुल्यता नहीं है अतः विषय-भेद मानना आवश्यक है। श्लो० २५५-पुनः संस्कारम्-इसका मूल निम्न-लिखित मनु-वचन में देखना चाहिए :- यस्य कायगतं ब्रह्म मद्येनाप्लाव्यते सकृत् । तस्य व्यपैति ब्राह्मण्यं शूद्रत्वं च स गच्छति ॥