याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 80, कुल 782 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीन, दो और एक पत्नियां होती हैं । शूद्र की अपनी ही ( जाति की ) एक भार्या होती है ॥ ५७ ॥ विवाहानाह— ब्राह्मो विवाह आहूय दीयते शक्त्यलंकृतः । तज्जः पुनात्युभयतः पुरुषानैकविंशतिम् ॥ ५८ ॥ स ब्राह्माभिधानो विवाहः यस्मिन्नुक्तलक्षणाय वरायाहूय यथाशक्त्यलंकृता कन्या दीयते उदकपूर्वकं, तस्यां जातः पुत्र उभयतः पित्रादीन्दश पुत्रादींश्च दश, आत्मानं चैकविंशं पुनाति सद्वृत्तश्चेत् ॥ ५८ ॥ भाषा—ब्राह्मविवाह वह होता है जिसमें ( वर को ) बुलाकर (उसे) यथाशक्ति आभूषणादि से अलंकृत कन्या प्रदान की जाती है; ऐसे विवाह से उत्पन्न पुत्र ( अपने पूर्वकी दस; आगे आने वालो दस तथा अपनी पीढ़ी को मिलाकर ) इक्कीस पीढ़ियों को पवित्र करता है ॥ ५८ ॥ दैवार्षविवाहौ— यज्ञस्थ ऋत्विजे दैव आदायार्षस्तु गोद्वयम् । चतुर्दश प्रथमजः, पुनात्युत्तरजश्च षट् ॥ ५९ ॥ स दैवो विवाहो यस्मिन्यज्ञानुष्ठाने वितते ऋत्विजे यथाशक्त्यलंकृता कन्या दीयते । यत्र पुनर्गोमिथुनमादाय कन्या दीयते स आर्षः । प्रथमजो दैवविवाह- जश्चतुर्दश पुनाति सप्तावरान् सप्त परान् । उत्तरज आर्षविवाहजः षट् पुनाति त्रीन्पूर्वान् त्रीन्परान् ॥ ५९ ॥ भाषा—यज्ञानुष्ठान के समय ऋत्विज को (यथाशक्ति अलंकृत करके) कन्या दी जाय तो वह दैव विवाह होता है; जब दो गायें लेकर कन्या दी जाती है तब वह आर्षविवाह होता है । इनमें दैवविवाह से उत्पन्न पुत्र ( सात पहले की और सात बाद की इस प्रकार ) चौदह पीढ़ियों को और आर्ष विवाह से उत्पन्न पुत्र ( तीन पहले और तीन बाद की ) छः पीढ़ियों को पवित्र करता है ॥ ५९ ॥ प्राजापत्यविवाहलक्षणम्— इत्युक्त्वा चरतां १धर्मं सह या दीयतेर्थिने । स कायः पावयेत्तज्जः षंट् षड्वंश्यान्सहात्मना३ ॥ ६० ॥ सह धर्मं चरताम्' इति परिभाष्य कन्यादानं स प्राजापत्यः । तज्जः षट् पूर्वान्षट् परान् आत्मना सहेत्येवं त्रयोदश पुनाति ॥ ६० ॥ १. सहोभौ । २. धर्ममित्युक्त्वा । ३. सह चात्मनः ।