याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 81, कुल 782 में से
संदर्भ में पढ़ेंआचाराध्यायः २५ भाषा—साथ रहकर धर्म का आचरण करो, ऐसा कहकर जब कन्या विवाहेच्छु पुरुष को प्रदान की जाती है तब कायविवाह होता है; इससे उत्पन्न पुत्र अपनी पीढ़ी को और छः पहले एवं छः बाद की पीढ़ियों को पवित्र करता है ॥ ६० ॥ आसुरगान्धर्वादि विवाहलक्षणानि— आसुरो द्रविणादानाद्गान्धर्वः समयान्मिथः । राक्षसो युद्धहरणात्पैशाचः १कन्यकाछलात् ॥ ६१ ॥ आसुरः पुनर्द्रविणादानात् । गान्धर्वस्तु परस्परातुरागेण भवति । राक्षसो युद्धेनापहरणात् । पैशाचस्तु कन्यकाछलात् छलेन छलना स्वापाद्यवस्थास्व- २पहरणात् ॥ ६१ ॥ भाषा—अधिक धन लेकर कन्या प्रदान की जाय तो वह आसुर विवाह होता है, परस्पर प्रेम होने पर जो विवाह होता है वह गान्धर्व कहलाता है। युद्ध में हरी गई कन्या से विवाह राक्षसविवाह होता है और कन्या को छलपूर्वक फुसलाकर किया गया विवाह पैशांच होता है ॥ ६१ ॥ सवर्णादिपरिणयेन विशेषमाह— पाणिर्ग्राह्यः सवर्णासु गृह्णीयात्क्षत्रिया शरम् । वैश्या प्रतोदमादद्याद्वेदने ३त्वग्रजन्मनः ॥ ६२ ॥ सवर्णासु विवाहे स्वगृहोक्तविधिना पाणिरेव ग्राह्यः । क्षत्रियकन्या तु शरं गृह्णीयात् । वैश्या प्रतोदमादद्यात् । उत्कृष्टवेदने शूद्रा पुनर्वसनस्य दशाम् । यथाह मनुः (३।४४)—'वसनस्य दशा ग्राह्या शूद्रयोत्कृष्टवेदने इति ॥ ६२ ॥ भाषा—अपनी जाति की कन्या से विवाह करते समय उसका हाथ पकड़ना चाहिए; ब्राह्मण क्षत्रिया से विवाह करे तो क्षत्रिया बाण पकड़े, वैश्या प्रतोद या पैना पकडे ॥ ६२ ॥ कन्यादातृक्रममाह— पिता पितामहो भ्राता सकुल्यो जननी तथा । कन्याप्रदः पूर्वनाशे प्रकृतिस्थः परः परः ॥ ६३ ॥ अप्रयच्छन्समाप्नोति भ्रूणहत्यामृतावृतौ । गम्यं त्वभावे दातॄणां कन्या कुर्यात्स्वयंवरम् ॥ ६४ ॥ १. कन्यकां छुलात् । २. द्यवस्थासु हरणात् । ३. त्वग्रयजन्मनः ।