यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध बारहवां अध्याय हे अग्नि! आप हमें पुनः ऊर्जस्वी और आयुष्मान बनाइए. आप हमें पुनः पाप से बचाइए. (४०) सह रय्या निवर्त्तस्वाग्ने पिन्वस्व धारया. विश्वप्सन्या विश्वतस्परि.. (४१) हे अग्नि! आप हमें पुनः धन के साथ प्राप्त होइए. आप वर्षा की धारा से पृथ्वी पर सारी वनस्पति को बढ़ाने की कृपा करें. (४१) बोधा मे अस्य वचसो यविष्ठ म ँ४ हिष्ठस्य प्रभृतस्य स्वधावः. पीयति त्वो अनु त्वो गृणाति वन्दारुष्टे तन्वं वन्दे अग्ने.. (४२) हे अग्नि! आप हमारे इन वचनों को सुनिए. प्रसन्न व्यक्ति आप की और रुष्ट व्यक्ति आप को कोसते हैं. हम आप के तन का वंदन करते हैं. (४२) स बोधि सूरिर्मघवा वसुपते वसुदावन्. युयोध्यस्मद् द्वेषा ँ४ सि विश्वकर्मणे स्वाहा.. (४३) हे अग्नि! आप धन के स्वामी और धनदाता हैं. आप हमारे द्वेषियों को दूर करने की कृपा कीजिए. सर्वकर्मा अग्नि के लिए स्वाहा. (४३) पुनस्त्वादित्या रुद्रा वसवः समिन्धतां पुनर्ब्रह्माणो वसुनीथ यज्ञैः. घृतेन त्वं तन्वं वर्धयस्व सत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः.. (४४) हे अग्नि! आप को आदित्य, रुद्र, वसु पुनः प्रज्वलित करने की कृपा करें. अग्नि धन के नेता हैं. वे यज्ञ से यजमान आप को बारबार प्रज्वलित करने की कृपा करें. वे घी से आप अपने शरीर की बढ़ोतरी करने और अपने यजमान की कामनाएं पूरी करने की कृपा करें. (४४) अपेत वीत वि च सर्पतातो येत्र स्थ पुराणा ये च नूतनाः. अदाद्यमोवसानं पृथिव्या ऽ अक्रन्निमं पितरो लोकमस्मै.. (४५) नए पुराने जो भी यमदूत यहां हों वे दूर, बहुत दूर चले जाएं. बहुत दूर हट जाएं. पृथ्वी का यह स्थान यमराज ने स्वयं यज्ञ हेतु हमारे पूर्वजों को देने की कृपा की है. (४५) संज्ञानमसि कामधरणं मयि ते कामधरणं भूयात्. अग्नेर्भस्मास्यग्नेः पुरीषमसि चित स्थ परिचित ऽ ऊर्ध्वचितः श्रयध्वम्.. (४६) हे उषा! आप सम्यक् ज्ञान हैं. आप कामनाएं धारण करती हैं. आप हमारे लिए भी कामना धारण करने वाली हों. आप भस्म और अग्नि की पूरक हैं. धरती पर बालू की पतली रेखाएं बिछाई गई हैं. आप चारों ओर तथा ऊपर की ओर स्थापित होने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ को श्रेयस्कर बनाइए. (४६) यजुर्वेद - १४७