भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 421 में से

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पृष्ठ 176

पूर्वार्ध चौदहवां अध्याय हमारे मन को जिताइए. आत्मा का योग कीजिए. ज्योति प्रदान कीजिए. ( १७ ) मा छन्दः प्रमा छन्दः प्रतिमा छन्दो ऽस्त्रीवयश्छन्दः पङ्क्तिश्छन्द ऽ उष्णिक् छन्दो बृहती छन्दोनुष्टुप् छन्दो विराट् छन्दो गायत्री छन्दस्त्रिष्टुप् छन्दो जगती छन्दः.. ( १८ ) हम मन, छंद, प्रमा छंद, प्रतिमा, अस्त्रीवय, पंक्ति, उष्णिक्, बृहती, अनुष्टुप्, विराट्, गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती से इष्टका की स्थापना करते हैं. ( १८ ) पृथिवी छन्दोन्तरिक्षं छन्दो द्यौश्छन्दः समाश्छन्दो नक्षत्राणि छन्दो वाक् छन्दो मनश्छन्दः कृषिश्चन्दो हिरण्यं छन्दो गौश्छन्दोजाश्छन्दोऽश्वश्छन्दः.. ( १९ ) हे इष्टका! हम पृथ्वी, अंतरिक्ष, नक्षत्र, वाक्मन, कृषि, हिरण्य, गौ, अजा, अश्व से संबंधित छंद का मनन करते हैं. ( १९ ) अग्निर्देवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रमा देवता वसवो देवता रुद्रा देवतादित्या देवता मरुतो देवता विश्वेदेवा देवता बृहस्पतिर्देवतेन्द्रो देवता वरुणो देवता.. ( २० ) हम अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्र, वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत्, विश्वे देवा, बृहस्पति, इंद्र देव व हम वरुण देव को स्मरण कर के इष्टका की स्थापना करते हैं. ( २० ) मूर्धासि राड् ध्रुवासि धरुणा धर्त्र्यसि धरणी. आयुषे त्वा वर्चसे त्वा कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा.. ( २१ ) हे इष्टका! आप मूर्धन्य स्थिर व धारिका हैं. हम आयु, वर्चस्व, कृषि व कुशलक्षेम के लिए आप की स्थापना करते हैं. ( २१ ) यन्त्री राड् यन्त्र्यसि यमनी ध्रुवासि धरित्री. इषे त्वोर्जे त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा लोकं ता इन्द्रम्.. ( २२ ) इष्टका धरा के समान स्थिर व यांत्रिक रूप से गतिशील है. आप नियम पालक हैं. हम ऊर्जा, धन, पोषण के लिए आप की उपासना करते हैं. इंद्र देव इस लोक का रक्षण करने की कृपा करें. ( २२ ) आशुस्त्रिवृद्धान्तः पञ्चदशो व्योमा सप्तदशो धरुण ऽ एकवि १७ शः प्रत्तूर्त्तिरष्टादशस्तपो नवदशोभीवर्तः सवि १७ शो वर्चो द्वावि १७ शः सम्भरणस्त्रयोवि १७ शो योनिश्चतुर्वि १७ शो गर्भाः पञ्चवि १७श ऽ ओजस्त्रिणवः क्रतुरेकत्रि १७शः प्रतिष्ठा त्रयस्त्रि १७शो ब्रध्नस्य विष्टपं चतुस्त्रि १७ शो नाकः षट्त्रि १७ शो विवर्त्तोष्टाचत्वारि १७ शो धर्त्रं चतुष्टोमः.. ( २३ ) हे इष्टका! हम आप को त्रिवृत स्तोम से व्याप्त स्थान पर अधिष्ठित करते हैं. हम पंद्रह दिन वाली चंद्रमा की ज्योति का मनन कर के आप की स्थापना करते हैं. हम सप्तदश स्तोम स्वरूप प्रजापति का ध्यान कर के आप की स्थापना करते हैं. हम इक्कीस स्तोम स्वरूप का मनन कर के आप की स्थापना करते हैं. हम अठारह स्तोम १७६ – यजुर्वेद 632/11