यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 227, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध अठारहवां अध्याय यज्ञ कर्म से खनिज, मिट्टी, पहाड़ों, पर्वतों, रेत, वनस्पतियों में बढ़ोतरी हो. यज्ञ कर्म से सोने, लोहे, कांसे, सीसे व टिन में बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमारे लिए सर्वविध फलीभूत हो. ( १३ ) अग्निश्च म ऽ आपश्च मे वीरुधश्च म ऽ ओषधयश्च मे कृष्टपच्याश्च मेऽकृष्टपच्याश्च मे ग्राम्याश्च मे पशव ऽ आरण्याश्च मे वित्तं च मे वित्तिश्च मे भूतं च मे भूतिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( १४) इस यज्ञ से अग्नि, जल, पौधे, ओषधियां, कष्ट से पचने वाली ओषधियां हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. इस यज्ञ से आसानी से पचने वाली ओषधियां, गांव के पशु, जंगल के पशु, वित्त, संपत्ति, अतीत व भविष्य की बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमें सर्वविध फलीभूत हों. ( १४ ) वसु च मे वसतिश्च मे कर्म च मे शक्तिश्च मेर्थश्च म ऽ एमश्च म ऽ इत्या च मे गतिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. ( १५) यज्ञ से देवगण हमें धन, संपत्ति, कर्म सामर्थ्य, अर्थ, इष्ट साधन व गति प्रदान करें. यह यज्ञ सर्वविध हमारे लिए फलीभूत हो. ( १५ ) अग्निश्च म ऽ इन्द्रश्च मे सोमश्च म ऽ इन्द्रश्च मे सविता च म ऽ इन्द्रश्च मे सरस्वती च म ऽ इन्द्रश्च मे पूषा च म ऽ इन्द्रश्च मे बृहस्पतिश्च म ऽ इन्द्रश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (१६) यज्ञ से अग्नि, इंद्र देव, सोम और इंद्र देव, सविता देव और इंद्र देव, सरस्वती देवी और इंद्र देव व पूषा देव और इंद्र देव की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से बृहस्पति देव और इंद्र देव की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यज्ञ हमारे लिए सर्वविध फलीभूत हो. ( १६ ) मित्रश्च म ऽ इन्द्रश्च मे वरुणश्च म ऽ इन्द्रश्च मे धाता च म ऽ इन्द्रश्च मे त्वष्टा च म ऽ इन्द्रश्च मे मरुतश्च म ऽइन्द्रश्च मे विश्वे च मे देवा ऽ इन्द्रश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (१७) यज्ञ से मित्र देव और इंद्र देव, वरुण देव और इंद्र देव, धाता देव और इंद्र देव, त्वष्टा और इंद्र देव व मरुत् और इंद्र देव की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से विश्व देव और इंद्र देव की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यह यज्ञ हमारे लिए सर्वविध फलीभूत हो. ( १७ ) पृथिवी च म ऽ इन्द्रश्च मेन्तरिक्षं च म ऽ इन्द्रश्च मे द्यौश्च म ऽ इन्द्रश्च मे समाश्च म ऽ इन्द्रश्च मे नक्षत्राणि च म ऽ इन्द्रश्च मे दिशश्च म ऽ इन्द्रश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (१८) इस यज्ञ से हमारे लिए पृथ्वी देव इंद्र, अंतरिक्ष देव इंद्र, स्वर्गलोक के देव, यजुर्वेद - २२७