यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 228, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध अठारहवां अध्याय वृष्टि देव इंद्र, नक्षत्र देव इंद्र व दिशा देव इंद्र की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यह यज्ञ सर्वविध हमारे लिए फलीभूत हो. ( १८ ) अ ᳵ शुश्च मे रश्मिश्च मेदाभ्यश्च मेधिपतिश्च म ऽ उपा ᳵ शुश्च मेन्तर्यामश्च म ऽ ऐन्द्रवायवश्च मे मैत्रावरुणश्च म ऽ आश्विनश्च मे प्रतिप्रस्थानश्च मे शुक्रश्च मे मन्थी च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (१९) इस यज्ञ से अंशुग्रह, रश्मिग्रह, अदाभ्यग्रह, उपांशुग्रह, अंतर्याम, इंद्र देव और वायु, मित्र देव और वरुण देव, आश्विनग्रह व प्रतिस्थानग्रह अधिपति होने की कृपा करें. इस यज्ञ से शुक्रग्रह अधिपति होने की कृपा करें. इस यज्ञ से मंधीग्रह अधिपति होने की कृपा करें. यह यज्ञ हमारे लिए सर्वविध फलीभूत हो. ( १९ ) आग्रयणश्च मे वैश्वदेवश्च मे ध्रुवश्च मे वैश्वानरश्च म ऽ ऐन्द्राग्नश्च मे महावैश्वदेवश्च मे मरुत्वतीयाश्च मे निष्केवल्यश्च मे सावित्रश्च मे सारस्वतश्च मे पात्नीवतश्च मे हारियोजनश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२०) इस यज्ञ से आग्रयण, विश्व, ध्रुव देव, वैश्वानर, इंद्र देव और अग्नि, महावैश्व देव, मरुत्वतीय देव, निष्केवल्य देव, सावित्र देव, सारस्वत देव हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. इस यज्ञ से पालीवत व हारियोजन हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. यज्ञ सर्वविध हमारे लिए फलीभूत हो. ( २० ) सुचश्च मे चमसाश्च मे वायव्यानि च मे द्रोणकलशश्च मे ग्रावाणश्च मेधिषवणे च मे पूतभृच्च म ऽ आधवनीयश्च मे वेदिश्च मे बर्हिश्च मेवभृथश्च मे स्वगाकारश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२१) यज्ञ से सुक ( घी डालने का पात्र ), चमस, वायव्य, द्रोणकलश, पत्थर, अधिषवण ( सोम कूटने वाला पत्थर ) हमारे अनुकूल हो. यज्ञ से पूतभृत ( सोम रखने का पात्र ) आह्वनीय पात्र, वेदिका, कुशा, अवभृथ स्नान व शम्युवाक हमारे अनुकूल हो. यज्ञ सर्वविध फलीभूत होने की कृपा करे. ( २१ ) अग्निश्च मे घर्मश्च मेर्कश्च मे सूर्यश्च मे प्राणश्च मेश्वमेधश्च मे पृथिवी च मेदितिश्च मे दितिश्च मे द्यौश्च मेङ्गुलयः शक्वरयो दिशश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२२) यज्ञ से अग्नि, गर्मी, अर्क, सूर्य, प्राण, अश्वमेध, पृथ्वी, अदिति व दिति हमारे अनुकूल होने की कृपा करे. यज्ञ से स्वर्गलोक विराट् पुरुष की अंगुलियां, शक्ति व दिशाएं हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. यह यज्ञ सर्वविध फलीभूत होने की कृपा करे. ( २२ ) व्रतं च म ऽ ऋतवश्च मे तपश्च मे संवत्सरश्च मेहोरात्रे ऊर्ध्वष्ठीवे बृहद्रथन्तरे च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्.. (२३) २२८ - यजुर्वेद