भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 421 में से

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पृष्ठ 244

पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले अन्न के भक्षण से वर्षा होती है. वाग्सूक्त से आशीष प्राप्त होता है. संयम से पतिपत्नी संबंध में प्रेम प्राप्त होता है. इष्ट यज्ञ से संस्थिति ( उत्तम स्थिति ) प्राप्त होती है. ( २९ ) व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्. दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते.. (३०) व्रत से दीक्षा प्राप्त होती है. दीक्षा से दक्षिणा प्राप्त होती है. दक्षिणा से श्रद्धा प्राप्त होती है. श्रद्धा से सत्य प्राप्त किया जाता है. ( ३० ) एतावद्रूपं यज्ञस्य यद्देवैर्ब्राह्मणा कृतम्. तदेतत्सर्वमाप्नोति यज्ञे सौत्रामणी सुते.. (३१) ब्राह्मणों ने यज्ञ के इतने ही रूप का वर्णन किया है. यज्ञ में वह सब प्राप्त किया जाता है. सौत्रामणि यज्ञ में सोम की आहुति से यह सब प्राप्त किया जाता है. ( ३१ ) सुरावन्तं बर्हिषद १४ सुवीरं यज्ञ १४ हिन्वन्ति महिषा नमोभिः. दधानाः सोमं दिवि देवतासु मदेमेन्द्रं यजमानाः स्वर्काः.. (३२) हम सुरावान, कुश के आसन पर स्थित व श्रेष्ठवीर को नमस्कारों से मनाते हैं. हम महिमाशाली यज्ञ को नमस्कारों से विस्तृत करते हैं. स्वर्गलोक में विद्यमान देवताओं के लिए सोम धारण करते हुए यजमान इंद्र देव को आनंदित करते और अत्यंत प्रसन्न होते हैं. ( ३२ ) यस्ते रसः सम्भृत ऽ ओषधीषु सोमस्य शुष्मः सुरया सुतस्य. तेन जिन्व यजमानं मदेन सरस्वटीमश्विनाविन्द्रमग्निम्.. (३३) ओषधियों में जो इकट्ठा किया गया सोम का रस है, वह तीक्ष्ण और सारवान है. उस सोम रस से यजमान को सरस्वती देवी, अश्विनीकुमारों व अग्नि को आनंदित करना चाहिए. ( ३३ ) यमश्विना नमुचेरासुरादधि सरस्वत्यसुनोदिन्द्रियाय. इमं त १४ शुक्रं मधुमन्तमिन्दु १४ सोम १४ राजानमिह भक्षयामि.. (३४) अश्विनीकुमारों ने असुर नमुचि से सोम को पाया. सरस्वती देवी ने इंद्र देव के लिए सोम को निचोड़ा. सोम राजा, चमकीला व मधुर है. हम उस का पान करते हैं. ( ३४ ) यदत्र रिप्त १४ रसिनः सुतस्य यदिन्द्रो अपिबच्छचीभिः. अहं तदस्य मनसा शिवेन सोम १४ राजानमिह भक्षयामि.. (३५) २४४ - यजुर्वेद